बेतिया में गोपाल सिंह नेपाली की 115वीं जयंती पर साहित्यकारों ने किया नमन, विरासत संरक्षण पर जोर

कविवर गोपाल सिंह नेपाली की 115वीं जयंती पर बेतिया का साहित्यिक समाज भाव-विभोर हो गया. साहित्यकारों ने उनकी प्रतिमा पर पुष्प अर्पित कर उनके बहुआयामी व्यक्तित्व और साहित्यिक योगदान को याद किया. विरासत संरक्षण पर विशेष जोर दिया गया.

Bettiah News: 'गीतों के राजकुमार' कविवर गोपाल सिंह नेपाली की 115वीं जयंती पर मंगलवार को बेतिया का साहित्यिक समाज भाव-विभोर नजर आया. नगर के कविवर नेपाली चौक स्थित उनकी आदमकद प्रतिमा के समक्ष श्रद्धांजलि समारोह आयोजित किया गया. पश्चिम चंपारण के साहित्यकारों एवं साहित्यप्रेमियों ने प्रतिमा पर पुष्प अर्पित कर महान कवि, गीतकार और पत्रकार को श्रद्धापूर्वक नमन किया.

कविवर नेपाली के व्यक्तित्व और कृतित्व को किया याद

कार्यक्रम की शुरुआत कविवर गोपाल सिंह नेपाली की प्रतिमा पर माल्यार्पण से हुई. इसके बाद उपस्थित साहित्यकारों ने पुष्पांजलि अर्पित कर उनके व्यक्तित्व और साहित्यिक योगदान को याद किया.

वक्ताओं ने कहा कि नेपाली के गीतों में प्रेम और प्रकृति की कोमल संवेदनाओं के साथ राष्ट्रबोध, सामाजिक चेतना, स्वाभिमान और व्यवस्था के प्रति निर्भीक प्रतिरोध भी देखने को मिलता है. यही वजह है कि उनके गीत आज भी जनमानस में अपनी खास जगह बनाए हुए हैं.

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साहित्य समाज और समय से संवाद का माध्यम : डॉ. गोरख प्रसाद मस्ताना

अपने अध्यक्षीय संबोधन में जिला एवं बिहार के वरीय कवि डॉ. गोरख प्रसाद मस्ताना ने गोपाल सिंह नेपाली के बहुआयामी व्यक्तित्व और साहित्यिक योगदान पर विस्तार से प्रकाश डाला.

उन्होंने कहा कि नेपाली का साहित्य केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह समाज और समय से संवाद करने वाला सशक्त माध्यम है. उनकी रचनाओं में मानवीय संवेदना के साथ सामाजिक एवं राष्ट्रीय चेतना भी दिखाई देती है.

नेपाली के गीतों की लोकप्रियता पर चर्चा

एमजेके कॉलेज के सेवानिवृत्त प्राचार्य प्रो. (डॉ.) सुरेंद्र प्रसाद केसरी ने नेपाली के गीतों की लोकप्रियता और उनकी काव्यात्मक विशिष्टता पर प्रकाश डाला. उन्होंने कहा कि नेपाली की रचनाओं ने हिंदी साहित्य और गीत विधा को समृद्ध करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया.

साहित्यिक विरासत की उपेक्षा पर उठे सवाल

समारोह के दौरान साहित्यकारों ने कविवर नेपाली की स्मृति और साहित्यिक विरासत के प्रति शासन एवं समाज की उदासीनता पर भी सवाल उठाए.

वक्ताओं ने कहा कि चंपारण और बिहार की सांस्कृतिक पहचान को राष्ट्रीय साहित्यिक क्षितिज पर स्थापित करने वाले कविवर नेपाली को वह सम्मान और संरक्षण अब तक नहीं मिल सका, जिसके वे वास्तविक अधिकारी हैं.

नई पीढ़ी तक पहुंचाने की जरूरत

साहित्यकारों ने कहा कि गोपाल सिंह नेपाली की जयंती महज पुष्पांजलि का अवसर नहीं होना चाहिए. इसे उनकी रचनाओं को नई पीढ़ी तक पहुंचाने और साहित्यिक धरोहर को संरक्षित करने के संकल्प दिवस के रूप में मनाया जाना चाहिए.

समारोह में अखिलेश्वर मिश्र, जयकिशोर जय, डॉ. जगमोहन कुमार, डॉ. ज्ञानेश्वर गुंजन, डॉ. दिवाकर राय, राम कुमार, अविरल निलेश और अनुज कुमार सहित अनेक साहित्यकार एवं साहित्यप्रेमी मौजूद रहे.

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लेखक के बारे में

By रवि 'रंक'

90 के दशक में विद्यार्थी जीवन से ही रवि 'रंक' के आलेख, निबंध, संस्मरण और कविताएं क्षेत्रीय पत्र पत्रिकाओं के लिए लिखते रहे हैं. हिंदी विषय में स्नातकोत्तर योग्यताधारी रवि 'रंक' ने दैनिक हिंदुस्तान के पटना से प्रकाशित उत्तर बिहार संस्करण के साथ जनवरी 2001 से अपनी पत्रकारिता शुरु की. फरवरी 2020 में हिंदुस्तान से अलग होकर प्रभात खबर के पश्चिम चंपारण संस्करण में बतौर जिला मुख्यालय संवाददाता के रूप में पदस्थापित हैं.

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