Sugarcane Farming: नरकटियागंज चीनी मिल क्षेत्र में गन्ना खेती को आधुनिक बनाने की दिशा में बड़ी पहल शुरू की गई है. प्रेगमैटिक कंपनी और नरकटियागंज चीनी मिल के संयुक्त सहयोग से अगले सत्र में 10 हजार एकड़ भूमि पर पूरी तरह मशीनीकृत गन्ना खेती कराने की योजना तैयार की गई है. इसके लिए 150 किसानों को कृषि तकनीकी सेवा प्रदाता (एटीपीएस) के रूप में विकसित किया जा रहा है.
मिल प्रबंधन का मानना है कि आधुनिक तकनीक से गन्ने की गुणवत्ता और उत्पादन, दोनों में उल्लेखनीय बढ़ोतरी होगी.
150 किसान बनेंगे तकनीकी मार्गदर्शक
योजना के तहत चयनित प्रत्येक किसान अपने गांव के 10-10 किसानों का समूह तैयार करेगा. ये किसान आधुनिक कृषि यंत्रों और नई तकनीकों के जरिए गन्ना उत्पादन की उन्नत विधियां अपनाने के लिए अन्य किसानों का मार्गदर्शन करेंगे.
इसी के साथ शरदकालीन बुवाई को लेकर भी चीनी मिल ने अपना मास्टर प्लान तैयार कर लिया है.
गहरी जुताई से बढ़ेगा उत्पादन
चीनी मिल के कार्यपालक अध्यक्ष रविन्द्र कुमार तिवारी ने बताया कि किसानों को डिस्क प्लाउ से गहरी जुताई, ऑटोमैटिक प्लांटर मशीन से बुवाई और मशीन से कटाई जैसी सुविधाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं.
उन्होंने कहा कि गहरी जुताई से खेत की उत्पादकता बढ़ेगी और भविष्य में एक गन्ने का औसत वजन दो से ढाई किलोग्राम तक पहुंचने की संभावना है.
50 लाख क्विंटल उत्पादन का लक्ष्य
मिल प्रबंधन के अनुसार, 10 हजार एकड़ में मशीनीकृत खेती के जरिए करीब 50 लाख क्विंटल गन्ना उत्पादन का लक्ष्य निर्धारित किया गया है.
किसानों का अनुमान है कि आधुनिक तकनीक अपनाने से प्रति एकड़ 500 से 600 क्विंटल तक गन्ना उत्पादन संभव हो सकेगा.
किसानों ने साझा किए अनुभव
बैराठवा के वशिष्ठ चौरसिया, महेश्वर प्रसाद, पड़रौन के अजीत यादव, पिपरिया के तारिक बारी, मथुरा के अमृतदास बाबा और पिपरा के त्रिभुवन पटेल समेत कई प्रगतिशील किसानों ने बताया कि चीनी मिल के कार्यपालक अध्यक्ष रविन्द्र तिवारी, ईवीपी राजीव त्यागी, गन्ना महाप्रबंधक के.एस. ढाका, गन्ना उपप्रबंधक प्रेम सिंह, प्रेगमैटिक कंपनी के निदेशक डॉ. दुष्यंत बादल और गन्ना विशेषज्ञ बलवीर सिंह के मार्गदर्शन में उन्होंने चार फीट की दूरी और गहरी जुताई की तकनीक अपनाई है.
किसानों ने बताया कि वर्तमान में उनके खेतों में तैयार होने वाले एक गन्ने का वजन एक से डेढ़ किलोग्राम तक पहुंच चुका है. उनका विश्वास है कि मशीनीकृत खेती और वैज्ञानिक तकनीकों के बेहतर उपयोग से यह वजन आगे चलकर ढाई किलोग्राम तक पहुंच सकता है, जिससे किसानों की आय में भी उल्लेखनीय वृद्धि होगी.
