हरितालिका तीज और गणेश चतुर्थी एक ही दिन, 15 को सुबह 7.30 से पहले पारण, जानें क्यों बना ऐसा संयोग

इस वर्ष हरितालिका तीज और विनायक चतुर्थी का व्रत 14 सितंबर को मनाया जाएगा। जानें पूजा का शुभ समय, पारण की विधि और व्रत से जुड़ी महत्वपूर्ण धार्मिक जानकारियां।

बेतिया न्यूज: इस बार पर्व-त्योहारों के कैलेंडर में खास संयोग देखने को मिलेगा. हरितालिका तीज और विनायक चतुर्थी का पर्व 14 सितंबर, सोमवार को एक ही दिन मनाया जाएगा. वहीं तीज व्रत रखने वाली महिलाएं 15 सितंबर की सुबह पारण करेंगी. पंचांग गणना के अनुसार इस बार तृतीया और चतुर्थी तिथि का ऐसा संयोग बन रहा है, जिसके कारण दोनों पर्व एक ही दिन पड़ रहे हैं.


अखंड सौभाग्य के लिए सुहागिनें करती हैं व्रत: आचार्य पं. उमेश त्रिपाठी

आचार्य पं. उमेश त्रिपाठी के अनुसार हरितालिका तीज अखंड सौभाग्य, पति की दीर्घायु और सुखी दांपत्य जीवन की कामना के लिए किया जाने वाला महत्वपूर्ण व्रत है. सुहागिन महिलाओं के साथ कुंवारी कन्याएं भी इस व्रत को करती हैं. मान्यता है कि माता पार्वती ने भगवान शिव को पति के रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तप किया था. इसी श्रद्धा से महिलाएं तीज पर शिव-पार्वती की पूजा और व्रत करती हैं.


13 को तृतीया, 14 को तीज का व्रत

धार्मिक गणना के अनुसार 13 सितंबर को द्वितीया युक्त तृतीया पड़ रही है, जिसे व्रत के लिए उपयुक्त नहीं माना गया है. इसके बाद 14 सितंबर को तृतीया के साथ चतुर्थी का संयोग बन रहा है. इसी वजह से हरितालिका तीज का व्रत 14 सितंबर को करना शास्त्रसम्मत बताया गया है. इस दिन महिलाएं शिव-पार्वती की पूजा करेंगी और तीज व्रत की कथा सुनेंगी. स्थानीय परंपरा के अनुसार पूजा शाम के समय भी की जाएगी.


इसी दिन विराजेंगे गणपति बप्पा

14 सितंबर को ही भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्थी होने से विनायक चतुर्थी यानी गणेश चतुर्थी भी मनाई जाएगी. पंचांग के अनुसार चतुर्थी तिथि 14 सितंबर की सुबह शुरू होकर 15 सितंबर की सुबह तक रहेगी. चतुर्थी का मध्याह्न काल 14 सितंबर को ही मिलने के कारण गणेशजी की स्थापना और पूजा इसी दिन करना उचित माना गया है.


15 सितंबर को पारण, इस बात का रखें ध्यान

तीज व्रत रखने वाली महिलाओं के लिए अगले दिन पारण का विशेष महत्व रहेगा. आचार्य के अनुसार 15 सितंबर को सुबह 7:50 बजे से पहले पारण करने की बात बतायी गयी है. तीज और ऋषि पंचमी दोनों व्रत करने वाली महिलाओं के लिए पारण की परंपरा में विशेष सावधानी बतायी जाती है. ऐसी स्थिति में भोजन थाली में निकालकर उसे केवल सूंघने के बाद छोड़ने, फिर फलाहार और जल ग्रहण करने की परंपरा बतायी गयी है. सूंघे हुए भोजन को गाय को खिलाने और पराया अन्न ग्रहण नहीं करने की सलाह दी जाती है.

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लेखक के बारे में

By अवध किशोर तिवारी

अवध किशोर तिवारी तीन दशक से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं. इन्होंने हिंदी दैनिक राष्ट्रीय सहारा के दिल्ली संस्करण से करियर की शुरुआत की. वर्तमान में वर्ष 2018 से प्रभात खबर के बेतिया ब्यूरो कार्यालय से जुड़े हैं. सामाजिक, अपराध, राजनीतिक एवं जनसरोकार से जुड़ी खबरों पर उनकी मजबूत पकड़ मानी जाती है

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