बेगूसराय में इंसानियत की मिसाल बना ‘साईं की रसोई’,5 रुपये में भरपेट भोजन

Begusarai News: बेगूसराय जिले को औद्योगिक नगरी के रूप में पहचान रखने वाले बेगूसराय में रोजी-रोटी की तलाश में बड़ी संख्या में मजदूर अन्य जिलों से पहुंचते हैं.वहीं सदर अस्पताल में इलाज कराने आने वाले गरीब मरीजों के परिजन,रिक्शा चालक, भिखारी और दिहाड़ी मजदूर अक्सर आर्थिक तंगी के कारण दो वक्त की रोटी के लिए संघर्ष करते नजर आते हैं.

Begusarai News: (विकाश मिश्रा) बेगूसराय जिले को औद्योगिक नगरी के रूप में पहचान रखने वाले बेगूसराय में रोजी-रोटी की तलाश में बड़ी संख्या में मजदूर अन्य जिलों से पहुंचते हैं.वहीं सदर अस्पताल में इलाज कराने आने वाले गरीब मरीजों के परिजन,रिक्शा चालक, भिखारी और दिहाड़ी मजदूर अक्सर आर्थिक तंगी के कारण दो वक्त की रोटी के लिए संघर्ष करते नजर आते हैं.

ऐसे जरूरतमंद लोगों की भूख मिटाने का जिम्मा शहर के कुछ युवाओं ने अपने कंधों पर उठाया है.शहर के युवाओं द्वारा संचालित ‘साईं की रसोई’ आज जरूरतमंदों के लिए उम्मीद और सहारे का केंद्र बन चुकी है.यहां हर दिन सैकड़ों लोगों को बेहद कम कीमत पर भोजन कराया जाता है,जबकि जिनके पास पैसे नहीं होते,उन्हें भी बिना किसी भेदभाव के भोजन उपलब्ध कराया जाता है.

पांच युवाओं ने मिलकर शुरू की अनोखी पहल

साईं की रसोई की शुरुआत 29 अगस्त 2019 को बेगूसराय के पांच युवाओं रौनक अग्रवाल,किशन गुप्ता,अमित जायसवाल,नितेश रंजन,निखिल और पंकज ने मिलकर की थी.सदर अस्पताल के सामने शुरू हुई यह पहल आज लगातार जरूरतमंदों तक भोजन पहुंचा रही है.

संस्थापक सदस्य रौनक अग्रवाल ने बताया कि दिल्ली में संचालित “दादी की रसोई” से प्रेरणा लेकर उन्होंने बेगूसराय में इस अभियान की नींव रखी.शुरुआत में कुछ लोगों के सहयोग से काम शुरू हुआ और धीरे-धीरे कारवां बढ़ता गया.वर्तमान में करीब 30 युवा इस सेवा कार्य से जुड़े हुए हैं.

सिर्फ 5 रुपये में भरपेट भोजन

साईं की रसोई में टोकन राशि के रूप में मात्र 5 रुपये लिए जाते हैं.कैश काउंटर संभाल रहे निखिल राज बताते हैं कि जिन लोगों के पास पैसे नहीं होते,उन्हें भी बिना किसी हिचकिचाहट के भोजन कराया जाता है.किसी जरूरतमंद को भूखा लौटने नहीं दिया जाता.

हर दिन शाम 8 बजे से 9 बजे तक चलने वाली इस रसोई में दाल-चावल,सब्जी, मिठाई समेत स्वादिष्ट और पौष्टिक भोजन परोसा जाता है. यहां रोजाना 200 से अधिक लोग भोजन करते हैं,जिनमें भिखारी,मजदूर,रिक्शा चालक और मरीजों के परिजन शामिल रहते हैं.

चंदा और सहयोग से चलता है अभियान

संस्थापक सदस्य नितेश रंजन ने बताया कि इस रसोई को शुरू करने से पहले टीम ने करीब एक साल तक इसकी योजना बनाई.शुरुआत के तीन महीनों के खर्च की व्यवस्था पहले ही चंदा जुटाकर कर ली गई थी।.वर्तमान में रसोई को संचालित करने में हर महीने लगभग 75 से 80 हजार रुपये खर्च होते हैं,जो टीम की जमा पूंजी और समाजसेवियों के सहयोग से जुटाए जाते हैं.

उन्होंने कहा कि टीम का उद्देश्य केवल भोजन कराना नहीं,बल्कि हर जरूरतमंद के साथ खड़े रहना है.यही वजह है कि बाढ़,कोरोना महामारी जैसी आपदाओं के दौरान भी टीम ने राहत कार्य किया.इसके अलावा पुस्तक दान,गरीब परिवार की बेटियों की शादी और अन्य सामाजिक कार्यों में भी साईं की रसोई की टीम सक्रिय रहती है.

जरूरतमंदों के लिए उम्मीद की किरण

साईं की रसोई आज केवल एक भोजन केंद्र नहीं,बल्कि मानवता और सामाजिक जिम्मेदारी की मिसाल बन चुकी है.युवाओं की यह पहल समाज को यह संदेश दे रही है कि अगर सोच सकारात्मक हो तो छोटे प्रयास भी सैकड़ों लोगों के चेहरे पर मुस्कान ला सकते हैं.

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Published by: Vivek Singh

Vivek Singh is a contributor at Prabhat Khabar.

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