तीन पीढ़ियों से सुरों की विरासत संभाल रहा रामकोल का शर्मा परिवार, हारमोनियम में फिर भर देते हैं मधुरता
Banka News : जब दुनिया डिजिटल संगीत और आधुनिक वाद्ययंत्रों की ओर बढ़ रही है, तब बांका के एक छोटे से गांव में एक परिवार आज भी पारंपरिक सुरों की विरासत को जीवित रखे हुए है. तीन पीढ़ियों से हारमोनियम बनाने और उसकी मरम्मत करने का यह सफर अब लोगों के लिए प्रेरणा बन चुका है.
पंजवारा बांका से गौरव कश्यप की रिपोर्ट
Banka News : बांका जिले के रामकोल गांव में रहने वाले संजय शर्मा उन चुनिंदा कारीगरों में शामिल हैं, जिन्होंने बदलते समय के बावजूद पारंपरिक संगीत वाद्ययंत्र हारमोनियम की पहचान को जीवित रखा है. उनके परिवार में हारमोनियम निर्माण और मरम्मत का यह हुनर पीढ़ी दर पीढ़ी चला आ रहा है. आज भी दूर-दराज से संगीत प्रेमी और कलाकार अपने हारमोनियम को ठीक कराने उनके पास पहुंचते हैं.
दादा-पिता से मिली कला को आगे बढ़ा रहे संजय शर्मा
संजय शर्मा बताते हैं कि हारमोनियम बनाना और उसकी मरम्मत करना उनके परिवार की पुरानी पहचान है. यह कला उन्हें अपने दादा और पिता से विरासत में मिली है. उन्होंने न केवल इस परंपरा को आगे बढ़ाया, बल्कि इसे अपनी आजीविका का प्रमुख साधन भी बनाया. उनके लिए यह केवल एक पेशा नहीं, बल्कि संगीत की सेवा है.
तीसरी पीढ़ी तक पहुंची सुरों की विरासत
शर्मा परिवार की यह कला अब तीसरी पीढ़ी तक पहुंच चुकी है. परिवार के युवा सदस्य भी इस पारंपरिक हुनर को सीख रहे हैं और उसे आगे बढ़ाने का प्रयास कर रहे हैं. इससे उम्मीद जगी है कि आने वाले समय में भी यह दुर्लभ कला जीवित रहेगी.
दूर-दूर से पहुंचते हैं संगीत प्रेमी
हारमोनियम मरम्मत के कुशल कारीगरों की संख्या लगातार कम होती जा रही है. ऐसे में रामकोल के संजय शर्मा की पहचान आसपास के जिलों तक बन चुकी है. स्थानीय क्षेत्र के अलावा पड़ोसी जिलों और ग्रामीण इलाकों से भी गायक, भजन मंडली, कीर्तन समूह और संगीत प्रेमी अपने हारमोनियम को ठीक कराने उनके पास पहुंचते हैं.
पुराने हारमोनियम में फिर भर देते हैं मधुरता
लोगों का कहना है कि संजय शर्मा के हाथों से गुजरने के बाद पुराने और बेसुरे हारमोनियम में भी नई जान आ जाती है. उनकी बारीक समझ और अनुभव के कारण खराब वाद्ययंत्र फिर से मधुर सुर बिखेरने लगते हैं. यही वजह है कि संगीत जगत में उनकी अलग पहचान बन चुकी है.
डिजिटल दौर में भी बनी हुई है हारमोनियम की मांग
संजय शर्मा का कहना है कि भले ही बाजार में आज कीबोर्ड और इलेक्ट्रॉनिक वाद्ययंत्रों की भरमार हो गई हो, लेकिन शास्त्रीय संगीत, भजन-कीर्तन और लोकगीतों में हारमोनियम का महत्व आज भी बरकरार है. उनके अनुसार हारमोनियम के सुरों में जो आत्मीयता और गहराई होती है, वह आधुनिक मशीनों में महसूस नहीं होती.
ग्रामीण युवाओं के लिए प्रेरणा बना यह हुनर
ग्रामीण परिवेश में पारंपरिक कला को रोजगार से जोड़ने का यह उदाहरण लोगों को प्रेरित कर रहा है. संजय शर्मा का मानना है कि यदि युवा अपनी पारंपरिक कला और हुनर को अपनाएं तो यह न केवल सांस्कृतिक विरासत को बचाएगा, बल्कि रोजगार का मजबूत माध्यम भी बन सकता है.
”जब तक संगीत रहेगा, हारमोनियम भी रहेगा”
संजय शर्मा पूरे विश्वास के साथ कहते हैं कि समय चाहे कितना भी बदल जाए, संगीत की दुनिया में हारमोनियम का स्थान हमेशा बना रहेगा. उनका मानना है कि जब तक संगीत और सुरों की साधना जीवित है, तब तक हारमोनियम की पहचान भी कायम रहेगी और उनकी पारिवारिक विरासत आगे बढ़ती रहेगी.