तिरंगे की खातिर जान देने से नहीं डरे सात छात्र, बाराहाट के सपूत सतीश चंद्र झा की शहादत आज भी करती है भावुक

आजादी की लड़ाई में हजारों गुमनाम नायकों का बलिदान था, जिनमें से एक थे बिहार के सतीश चंद्र झा. किशोरावस्था में तिरंगे के लिए सर्वोच्च बलिदान देकर उन्होंने देश के प्रति अगाध प्रेम दर्शाया. यह कहानी उन युवा वीरों की है जिन्होंने मातृभूमि के लिए प्राण न्योछावर कर दिए।

आजादी की लड़ाई का इतिहास केवल महात्मा गांधी, सुभाष चंद्र बोस, भगत सिंह और चंद्रशेखर आजाद जैसे महान सेनानियों के संघर्ष तक सीमित नहीं है. इस इतिहास में उन हजारों गुमनाम और अल्पज्ञात युवाओं का बलिदान भी दर्ज है, जिन्होंने अंग्रेजी हुकूमत के सामने झुकने के बजाय मातृभूमि के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए. बिहार के बाराहाट की धरती भी ऐसे ही अमर सपूत की जन्मभूमि है. नाम था सतीश चंद्र झा, जिन्होंने महज किशोरावस्था में अंग्रेजी सत्ता को चुनौती देते हुए तिरंगे के लिए अपना जीवन बलिदान कर दिया.

खड़हरा की मिट्टी से निकला आजादी का दीवाना

बाराहाट प्रखंड के खड़हरा गांव से जुड़े सतीश चंद्र झा का जन्म करीब 1925 के आसपास बताया जाता है. स्थानीय इतिहासकारों के अनुसार उनके पिता का नाम जगदीश चंद्र झा था. बचपन से ही सतीश पढ़ाई में मेधावी और देश की परिस्थितियों के प्रति जागरूक थे. आगे की शिक्षा के लिए वे पटना पहुंचे और पटना कॉलेजिएट स्कूल में पढ़ाई के दौरान स्वतंत्रता आंदोलन की गतिविधियों से प्रभावित हुए.

उस दौर में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ देशभर में आंदोलन तेज हो रहा था. छात्र और युवा भी आजादी की लड़ाई में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेने लगे थे. सतीश चंद्र झा इसी युवा चेतना का हिस्सा बने और कम उम्र में ही देश के लिए कुछ कर गुजरने का संकल्प ले लिया.

भारत छोड़ो आंदोलन ने जगाया क्रांति का ज्वार

साल 1942 में महात्मा गांधी के नेतृत्व में भारत छोड़ो आंदोलन शुरू हुआ. गांधीजी के 'करो या मरो' के आह्वान ने युवाओं में आजादी का जुनून भर दिया. बिहार में भी आंदोलन तेजी से फैलने लगा. अंग्रेजी सरकार ने आंदोलन को दबाने के लिए बड़े नेताओं को गिरफ्तार कर लिया, लेकिन इसके बाद छात्र और आम लोग खुद आंदोलन की अगली कतार में आ गए.

पटना सचिवालय अंग्रेजी शासन का महत्वपूर्ण प्रशासनिक केंद्र था. ऐसे में वहां तिरंगा फहराना अंग्रेजी सत्ता को खुली चुनौती देने के समान था.

11 अगस्त को तिरंगे के लिए निकला छात्रों का जुलूस

11 अगस्त 1942 को छात्रों का जत्था पटना सचिवालय की ओर बढ़ा. उनका लक्ष्य सचिवालय भवन पर राष्ट्रीय ध्वज फहराना था. जुलूस सचिवालय के पूर्वी द्वार तक पहुंचा तो पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को रोकने का प्रयास किया. स्थिति बिगड़ने पर अंग्रेजी पुलिस ने निहत्थे छात्रों पर गोली चला दी.

इस गोलीकांड में सात छात्र शहीद हुए. इनमें उमाकांत प्रसाद सिन्हा, रामानंद सिंह, सतीश प्रसाद झा, जगपति कुमार, देवीपद चौधरी, राजेंद्र सिंह और रामगोविंद सिंह शामिल थे.

गोलियां चलीं, लेकिन तिरंगे की राह नहीं रुकी

अंग्रेजी पुलिस की बंदूकों के सामने छात्रों के पास कोई हथियार नहीं था. उनके हाथों में केवल तिरंगा और दिल में आजादी का संकल्प था. गोलियों की बौछार के बीच कई छात्र जमीन पर गिर पड़े, लेकिन तिरंगे को आगे ले जाने का प्रयास नहीं रुका.

इसी संघर्ष में बाराहाट के सपूत सतीश चंद्र झा भी शहीद हो गए. जिस उम्र में एक युवा अपने जीवन और भविष्य के सपने संजोता है, उस उम्र में सतीश ने देश की आजादी के लिए सर्वोच्च बलिदान दे दिया.

पटना का शहीद स्मारक आज भी सुनाता है बलिदान की कहानी

सात शहीद छात्रों की याद में पटना के पुराने सचिवालय के सामने शहीद स्मारक बनाया गया है. स्मारक में सात युवाओं को तिरंगा लेकर आगे बढ़ते हुए दर्शाया गया है. यह स्मारक आज भी उस दौर की याद दिलाता है, जब बिहार के किशोर और युवा अंग्रेजी हुकूमत की गोलियों के सामने सीना तानकर खड़े हो गए थे.

सतीश चंद्र झा की शहादत बाराहाट के लिए केवल इतिहास का एक अध्याय नहीं, बल्कि स्थानीय गौरव और देशभक्ति की ऐसी विरासत है, जिसे नई पीढ़ी तक पहुंचाना जरूरी है. 11 अगस्त आते ही उनकी कुर्बानी एक बार फिर याद दिलाती है कि देश की आजादी हजारों ज्ञात-अज्ञात वीरों के बलिदान से मिली थी.

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लेखक के बारे में

By अजय कुमार झा

अजय कुमार झा प्रिंट माध्यम में 14 वर्षों से और डिजिटल माध्यम में पिछले 4 वर्षों से पत्रकारिता में एक्टिव हैं. बाराहाट (बांका) क्षेत्र में काम कर रहे हैं. सामाजिक गतिविधि, खेल, इतिहास और राजनीतिक गतिविधियों की खबरों में रुचि रखते हैं.

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