35 साल बाद भी बांका में नहीं बना समर्पित खेल मैदान, नये युग में पिछड़ रही युवाओं की प्रतिभा

Banka News : वर्ष 1991 में जिला बनने के बाद भी बांका को आज तक एक समर्पित खेल मैदान और आधुनिक खेल सुविधाएं नहीं मिल सकी हैं. खेल प्रेमियों और खिलाड़ियों का कहना है कि आधारभूत संरचना के अभाव में जिले की प्रतिभाएं आगे बढ़ने से पहले ही पिछड़ रही हैं.

बांका से मदन कुमार की रिपोर्ट

Banka News : जिला गठन के 35 वर्ष बाद भी बांका में खेल सुविधाओं का अभाव गंभीर चिंता का विषय बना हुआ है. जिले के युवा खिलाड़ी और खेल प्रेमी लंबे समय से आधुनिक खेल मैदान, प्रशिक्षण केंद्र और आवश्यक संसाधनों की मांग कर रहे हैं, लेकिन आज तक उनकी उम्मीदें पूरी नहीं हो सकी हैं. युवा खेल चिंतक राज आर्यन उर्फ सुधांशु ने जिले की खेल व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए कहा कि बांका में अब तक ऐसा कोई समर्पित खेल मैदान नहीं बन पाया है, जहां विभिन्न खेलों का नियमित प्रशिक्षण और प्रतियोगिताएं आयोजित की जा सकें.

आरएमके मैदान ही बना एकमात्र सहारा

जिले में फिलहाल आरएमके स्कूल का मैदान ही खेल गतिविधियों का प्रमुख केंद्र बना हुआ है. हालांकि खिलाड़ियों का आरोप है कि यह मैदान खेलों से अधिक अन्य आयोजनों के लिए इस्तेमाल किया जाता है. ऐसे में नियमित अभ्यास और प्रतियोगिताओं के लिए खिलाड़ियों को पर्याप्त अवसर नहीं मिल पाते.

राजनीतिक और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का केंद्र बना मैदान

खिलाड़ियों और स्थानीय लोगों का कहना है कि आरएमके मैदान में अक्सर राजनीतिक सभाएं, बड़े नेताओं के कार्यक्रम, डांडिया उत्सव, सांस्कृतिक आयोजन, रोजगार मेले, खादी मेले, विभिन्न संगठनों के कार्यक्रम, सामूहिक भोज और हेलीपैड निर्माण जैसे आयोजन होते रहते हैं. इससे मैदान की मूल पहचान प्रभावित हो रही है. खेल प्रेमियों की मांग है कि खेल मैदान को केवल खेल गतिविधियों के लिए प्राथमिकता दी जानी चाहिए.

खराब हाई-मास्ट लाइट से शाम का अभ्यास प्रभावित

मैदान में स्थापित दो हाई-मास्ट लाइटों का रखरखाव भी संतोषजनक नहीं है. अधिकांश समय लाइटें खराब रहने के कारण शाम के समय अभ्यास करने वाले खिलाड़ियों को परेशानी का सामना करना पड़ता है. खिलाड़ियों का कहना है कि बेहतर प्रकाश व्यवस्था के बिना नियमित प्रशिक्षण संभव नहीं हो पाता.

कंक्रीट पिच और टर्फ विकेट की योजना फाइलों में कैद

राज आर्यन ने बताया कि क्रिकेट खिलाड़ियों के लिए दो कंक्रीट पिच और एक टर्फ विकेट निर्माण की योजना वर्षों पहले बनाई गई थी, लेकिन आज तक इसे धरातल पर नहीं उतारा जा सका. इससे जिले के क्रिकेट खिलाड़ियों को बेहतर अभ्यास सुविधाएं नहीं मिल पा रही हैं और उन्हें दूसरे जिलों का रुख करना पड़ता है.

खेल नीति और जमीनी हकीकत में बड़ा अंतर

एक ओर राज्य और केंद्र सरकार खिलाड़ियों को प्रोत्साहित करने के लिए “मेडल लाओ, नौकरी पाओ ” जैसी योजनाओं का प्रचार कर रही हैं, वहीं दूसरी ओर बांका जैसे जिले में बुनियादी खेल सुविधाओं का अभाव गंभीर सवाल खड़े करता है. खिलाड़ियों का कहना है कि केवल योजनाओं की घोषणा से खेल प्रतिभाएं नहीं निखरेंगी, इसके लिए जमीनी स्तर पर सुविधाएं विकसित करनी होंगी.

खिलाड़ियों को चाहिए मैदान, वादे नहीं

खेल प्रेमियों और युवाओं का मानना है कि जब तक गुणवत्तापूर्ण खेल मैदान, आधुनिक प्रशिक्षण सुविधाएं और आवश्यक संसाधन उपलब्ध नहीं कराए जाएंगे, तब तक जिले के खिलाड़ी राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी प्रतिभा का पूरा प्रदर्शन नहीं कर पाएंगे. उन्होंने प्रशासन और जनप्रतिनिधियों से खेल बुनियादी ढांचे के विकास को प्राथमिकता देने की मांग की है.

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लेखक के बारे में

Author: AMIT KUMAR SINH

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