औरंगाबाद: कुटुंबा प्रखंड के गांवों से लुप्त हुई सदियों पुरानी इंद्र पूजा की परंपरा, बुजुर्गों ने जताई चिंता

कभी आषाढ़-सावन में अच्छी वर्षा और फसल के लिए देवराज इंद्र की पूजा की जाती थी. सामूहिक खीर भोज का आयोजन होता था. अब यह सदियों पुरानी परंपरा आधुनिकता की भेंट चढ़ गई है, जिससे ग्रामीण संस्कृति पर चिंता जताई जा रही है.

Aurangabad News: एक समय था जब औरंगाबाद जिले के ग्रामीण क्षेत्रों में आषाढ़ और सावन महीने की शुरुआत के साथ ही अच्छी वर्षा और भरपूर फसल की कामना को लेकर इंद्र पूजा की अटूट परंपरा निभाई जाती थी. गांवों के खेतिहर किसान सामूहिक रूप से देवराज इंद्र की विशेष आराधना कर समय पर मूसलाधार वर्षा होने की प्रार्थना करते थे. पुरानी धार्मिक मान्यता थी कि इंद्र देव की कृपा से खेतों को पर्याप्त पानी मिलेगा, जिससे धान सहित सभी खरीफ फसलों की बेहतर पैदावार होगी. लेकिन बदलते समय और आधुनिक जीवनशैली के प्रभाव के कारण यह सदियों पुरानी परंपरा अब लगभग पूरी तरह लुप्त हो चुकी है.

सामूहिक खीर भोज का होता था आयोजन

औरंगाबाद के कुटुंबा प्रखंड अंतर्गत रामपुर गांव के कपिलदेव पांडेय, कुटुंबा के रामलखन तिवारी और रसलपुर गांव के शिवनाथ पांडेय आदि बुजुर्गों ने पुरानी यादों को साझा करते हुए बताया कि पहले गांव के पंडित-पुजारी वैदिक विधि-विधान और मंत्रोचार के साथ इंद्र पूजा संपन्न कराते थे. क्षेत्र के तमाम किसान पूरे उत्साह और श्रद्धा के साथ इस अनुष्ठान में भाग लेते थे. पूजा की समाप्ति के बाद पूरे गांव में सुख-समृद्धि और अच्छी वर्षा की सामूहिक कामना की जाती थी. इस दौरान पूरे गांव के लिए सामूहिक रूप से खीर के भोज का भव्य आयोजन होता था.

सिंचाई के आधुनिक साधनों से खत्म हुई परंपरा

बुजुर्गों का कहना है कि यह धार्मिक अनुष्ठान केवल आस्था का विषय नहीं था, बल्कि किसानों को आपस में एकजुट करने और प्रकृति के प्रति सम्मान व्यक्त करने का एक सशक्त माध्यम भी था. समय के साथ वैज्ञानिक खेती के विस्तार, सटीक मौसम पूर्वानुमान, सिंचाई के आधुनिक साधनों की उपलब्धता और बदलती सामाजिक सोच के कारण यह अनूठी परंपरा धीरे-धीरे समाप्त होती चली गई. आज के समय में कुटुंबा के किसी भी गांव में न तो इंद्र पूजा का आयोजन दिखाई देता है और न ही नई पीढ़ी इसके पौराणिक विधान और सामाजिक महत्व से परिचित है.

पूजा कराने वाले आचार्यों की भी कमी

बदलते दौर में अब कई स्थानों पर ऐसे पंडित-पुजारी भी नहीं बचे हैं, जिन्हें इंद्र पूजा की प्राचीन वैदिक विधि का संपूर्ण ज्ञान हो. इधर, धार्मिक मामलों के जानकार आचार्य राधेकृष्ण पांडेय, रजनीश पांडेय और शंभू नाथ मिश्र बताते हैं कि शास्त्रों के अनुसार इंद्र पूजा से मेघपति प्रसन्न होकर अच्छी वर्षा का आशीष देते हैं. लोक संस्कृति के जानकारों का भी मानना है कि इंद्र पूजा भारतीय ग्रामीण परंपरा और कृषि संस्कृति की एक बेहद महत्वपूर्ण धरोहर रही है.

सांस्कृतिक विरासत को बचाने की जरूरत

विशेषज्ञों के अनुसार, इस परंपरा का संरक्षण केवल धार्मिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि स्थानीय लोक परंपराओं और अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को जीवित रखने के लिए भी अत्यंत आवश्यक है. आज के इस आधुनिक युग में भी नई पीढ़ी को ऐसी प्राचीन और प्रकृति से जुड़ी परंपराओं से जोड़ने के प्रयास किए जाने चाहिए, ताकि औरंगाबाद की ग्रामीण संस्कृति की यह अमूल्य और ऐतिहासिक विरासत पूरी तरह विलुप्त होने से बच सके.


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Author: Ambuj kumar

Published by: Vikash Jha

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