Aurangabad News: औरंगाबाद जिले में करीब 59 वर्षों से चले आ रहे एक ऐतिहासिक दीवानी मामले (भूमि विवाद) में आखिरकार व्यवहार न्यायालय द्वारा फैसला सुना दिया गया है. सब जज-अष्टम सह एसीजेएम-7 संदीप कुमार सिंह की अदालत ने स्वत्व वाद संख्या-96/67, 78/24 में सुनवाई पूरी करते हुए वादी के पक्ष में फैसला सुनाया और लंबे समय से चले आ रहे जमीन विवाद का हमेशा के लिए पटाक्षेप कर दिया.
1967 में तत्कालीन गया जिला न्यायालय में दर्ज हुआ था मुकदमा
पैनल अधिवक्ता सतीश स्नेही ने बताया कि यह मुकदमा 'जगनरायण यादव बनाम मुंगेश्वर यादव' (ग्राम खखड़ा टोले नेपवा) के नाम से 10 अगस्त 1967 को तत्कालीन गया जिला न्यायालय में दर्ज कराया गया था. प्रतिवादी 9 दिसंबर 1967 को कोर्ट में उपस्थित हुआ था. वर्ष 1971 में विवादित भूमि का मूल्य 100 रुपये से बढ़ाकर 300 रुपये निर्धारित किया गया और 22 मई 1972 से गवाही की प्रक्रिया शुरू हुई. मुकदमा लंबित रहने के दौरान 5 बार वाद बिंदुओं का निर्धारण हुआ, जिसमें वादी पक्ष से 12 और प्रतिवादी पक्ष से 6 गवाहों की गवाही कराई गई.
छह दशकों में दिवंगत हो गए अधिकांश मूल पक्षकार
यह वाद विवादित भूमि पर वादी पक्ष को रैयत घोषित करने की मांग को लेकर दायर किया गया था. दोनों पक्षों ने रानी सैयदा खातून की जमींदारी सेटलमेंट को स्वीकार किया था, हालांकि दोनों के दस्तावेज और तिथियां अलग-अलग थीं. विस्तृत सुनवाई के बाद अदालत ने साक्ष्यों के आधार पर वादी के पक्ष में फैसला सुनाया. लगभग छह दशक तक चली इस कानूनी लड़ाई के दौरान दोनों पक्षों के अधिकांश मूल पक्षकारों का निधन हो चुका है.
3 कट्ठा जमीन के लिए तीन पीढ़ियों ने लड़ी लड़ाई: वादी
वर्तमान वादी संख्या-4 सूबेदार यादव ने बताया कि खाता संख्या-31, प्लॉट संख्या-1488, रकबा 3 कट्ठा भूमि को लेकर यह पूरा विवाद चल रहा था. उन्होंने भावुक होकर कहा कि उन्हें न्यायपालिका पर पूरा भरोसा था कि देर से ही सही, न्याय जरूर मिलेगा और आज वह विश्वास सच साबित हुआ है.
