पहली बार में लड़का हो गया, टेंशन खत्म- बधाई के नाम पर बेटियों के खिलाफ जिंदा है भेदभाव की मानसिकता

जन्म के बाद बेटे या बेटी पर अलग प्रतिक्रिया समाज की गहरी जड़ें जमा चुकी लैंगिक असमानता को उजागर करती है. चिकित्सा विशेषज्ञों का मानना है कि यह सोच बदलनी जरूरी है. आइए जानें कैसे.

औरंगाबाद ग्रामीण बच्चे का जन्म किसी भी परिवार के लिए सबसे बड़ा उत्सव और खुशियों का अवसर होता है, लेकिन इस खुशी के बीच अक्सर कुछ ऐसे शब्द सुनने को मिलते हैं, जो अनजाने में समाज की गहरी जड़ें जमा चुकी लैंगिक असमानता को उजागर कर देते हैं. पहली बार में लड़का हो गया, चलो टेंशन खत्म या कोई बात नहीं, लक्ष्मी आई है, अगली बार लड़का हो जाएगा जैसे वाक्य आज भी आम हैं. चिकित्सा विशेषज्ञों का मानना है कि यह केवल एक सामान्य टिप्पणी नहीं, बल्कि बेटियों के प्रति समाज की भेदभावपूर्ण मानसिकता का परिचायक है. विशेषज्ञों का कहना है कि प्रसव के दौरान मां जिस असहनीय पीड़ा, मानसिक तनाव और शारीरिक संघर्ष से गुजरती है, वह बच्चे के लिंग के आधार पर कभी अलग नहीं होता. ऐसे में बेटे और बेटी के जन्म पर अलग-अलग प्रतिक्रिया देना न केवल एक मां की भावनाओं को ठेस पहुंचाता है, बल्कि समाज में लैंगिक असमानता को भी बढ़ावा देता है.

मां की पीड़ा का सम्मान जरूरी, लिंग का नहीं

स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञ डॉ. कंचन कुमारी ने कहा कि समाज में सबसे पहले बदले जाने की जरूरत सोच की है. उन्होंने कहा कि एक मां पूरे नौ महीने तक अपने गर्भ में बच्चे को पालती है और प्रसव के समय जीवन का सबसे कठिन दर्द सहती है. यह दर्द बेटे और बेटी के लिए अलग नहीं होता. इसके बावजूद यदि बच्चे के जन्म के बाद परिवार और समाज बेटे के जन्म पर राहत और बेटी के जन्म पर सांत्वना व्यक्त करता है, तो यह एक मां के संघर्ष और ममता का अपमान है. उन्होंने कहा कि बच्चे को भगवान का रूप मानकर बिना किसी भेदभाव के स्वीकार करना ही सच्ची मानवता है.

बेटा-बेटी दोनों समान, यही हो असली बधाई

चिकित्सक डॉ. अमृत कुमार ने कहा कि नवजात शिशु चाहे बेटा हो या बेटी, दोनों समान रूप से परिवार और समाज की अमूल्य धरोहर हैं. जन्म के पहले दिन से ही यदि बच्चों के साथ मानसिक भेदभाव शुरू हो जाए तो समानता का सपना कभी पूरा नहीं हो सकता. उन्होंने कहा कि बच्चे के जन्म पर सबसे बड़ी बधाई मां के सुरक्षित होने और शिशु के स्वस्थ होने की होनी चाहिए, न कि उसके लिंग की.

बदलती सोच ही बनाएगी बेहतर समाज

वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. अभिषेक कुमार सिंह ने कहा कि आज विज्ञान, शिक्षा और हर क्षेत्र में बेटियां अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा रही हैं. इसके बावजूद यदि समाज अब भी बेटे को टेंशन खत्म और बेटी को अगली बार लड़का हो जाएगा जैसी सोच से देखता है, तो यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है. उन्होंने कहा कि सामाजिक बदलाव की शुरुआत परिवार से होती है और हर व्यक्ति को अपनी भाषा और सोच दोनों बदलनी होगी.

बेटी और बेटा दोनों हैं समान अधिकार के हकदार

चिकित्सकों ने कहा कि बच्चे का जन्म किसी परिवार के लिए सौभाग्य का अवसर होता है. ऐसे समय में मां को तानों, तुलना और सामाजिक दबाव से नहीं, बल्कि सम्मान, प्रेम और सहयोग की आवश्यकता होती है. यदि समाज सचमुच बेटा-बेटी में समानता चाहता है, तो इसकी शुरुआत जन्म के पहले दिन से ही करनी होगी. पहली बार में लड़का हो गया, टेंशन खत्म जैसी सोच को त्यागकर मां और बच्चा दोनों स्वस्थ हैं, यही सबसे बड़ी खुशी है जैसी संवेदनशील सोच अपनानी होगी. यही एक समतामूलक और जागरूक समाज की पहचान होगी.


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By Manish raj singham

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