Aurangabad News : पीड़ितों की आंखों में आज भी दहशत

Aurangabad News : मियांपुर नरसंहार : 25 वर्ष बाद भी इंसाफ का इंतजार, खोखले साबित हुए नरसंहार के बाद किये गये सभी वादे

औरंगाबाद/गोह . 16 जून 2000. वह दिन था जब औरंगाबाद जिले के माथे पर नरसंहार का एक बदनुमा दाग लगा था. 33 लोगों की हत्या कर दी गयी थी. आज उस नरसंहार को 25 वर्ष पूरे हो गये है. आज भी नरसंहार की टीस हर घर में दिखती है. हम बात कर रहे है औरंगाबाद जिले के उपहारा थाना क्षेत्र के मियांपुर गांव की. नरसंहार का जख्म आज भी लोगों के दिलों में ताजा है. गांव के लगभग 175 घरों में 1000 से अधिक लोग रहते हैं, जिनमें लगभग 725 वोटर हैं. उस खौफनाक रात को मारे गये लोगों के परिजनों की पीड़ा आज भी कम नहीं हुई है. 25 साल बाद भी उस रात की चीखें हवा में गूंजती हैं. यह गांव आज भी अंधेरे से डरता है. यूं कहे कि आज भी गांव वालों को इंसाफ नहीं मिलने का अफसोस है. प्रभात खबर की टीम ने मियांपुर गांव का जायजा लिया और लोगों से बातचीत की तो पता चला कि नरसंहार के बाद जो उनके साथ वादे किये गये थे वह सब खोखले साबित हुए.

मैं बच गयी थी, पर जी नहीं सकी : देवमतिया कुंवर

“मेरे गाल में छेद है… खाना खाती हूं तो वहीं से पानी निकलता है. लोग कहते हैं मवाद है. उन्हें क्या पता, वह मेरी किस्मत थी जो उस रात जल कर राख हो गयी थी. यह कहना है देवमतिया कुंवर का. मियांपुर नरसंहार की एकमात्र जीवित पीड़ित महिलाओं में यह एक हैं. उस रात उनके चेहरे को भेदती हुई एक गोली आरपार हो गयी थी. आज, दो दशक से अधिक समय बीत जाने के बाद भी न उनकी जिंदगी सामान्य हो सकी, न समाज की नजरें. चेहरे पर जख्म रह गये, लेकिन सबसे गहरा घाव समाज की बेरुखी ने दिया.

सीता कुंवर : बेटा मारा गया, पति सदमे में चल बसे, बहू मायके चली गयी

नरसंहार में सबकुछ गंवा चुकी सीता कुंवर की जिंदगी नर्क से कम नहीं है. हर वर्ष 16 जून को एक दिया जलाती हैं, और फिर सारी रात चुपचाप बैठी रहती है. शायद उस उजाले में उन चेहरों को ढूंढ़ती हैं जो कभी उनके संसार थे. सरकारें आयीं, वादे हुए, पर न सड़क बनी, न न्याय मिला. नरसंहार में सीता कुंवर का बेटा मारा गया. पति सदमे में चल बसा. बहू भी साथ छोड़ गयी. अब सिर्फ और सिर्फ अकेले जीवन गुजार रही हैं.

हमें दुश्मनों ने नहीं मारा, हमारे ही लोगों ने लूटा : आंधी सिंह

नरसंहार को अपनी आंखों से देखने वाले आंधी सिंह यादव कहते है कि हमें दुश्मनों ने नहीं मारा, हमारे ही लोगों ने लूटा. सरकार हमारी थी, पर न्याय नहीं मिला. जो सड़क बनी, वो गांव तक आयी ही नहीं. आंखों में गुस्सा नहीं, टूटा हुआ विश्वास झलकता है. उन्होंने कहा कि गोह के एक नेता ने तत्कालीन मुख्यमंत्री राबड़ी देवी को झूठी रिपोर्ट दी कि मियांपुर में सबकुछ बेहतर हो गया है, जबकि हकीकत यह है कि सरकारी वादे पूरे ही नहीं किये गये.

गोपाल यादव : एक साथ दो मासूम खोने का दर्द

घटना के वक्त गोपाल यादव अपने चार वर्षीय पुत्र कुनकुन और तीन वर्षीय भतीजे पप्पू को लेकर छीपे थे. अचानक हुई अंधाधुंध फायरिंग में दोनों मासूमों की मौके पर मौत हो गयी. गोपाल यादव के सीने में भी गोली लगी जो आर-पार हो गयी. उन्हें मात्र 11 हजार रुपये सहायता, इलाज के लिए 20 हजार और एक लाख मुआवजा मिला. उनकी पत्नी मीणा देवी बताती हैं कि गोलीबारी के वक्त उसके पति ने उसे भागने का इशारा किया, तब जाकर उसकी जान बची.

तेतरी देवी : दरवाजे पर खड़ी थी मौत

80 वर्षीय तेतरी देवी बताती है कि वह घटना के दिन अपने घर के दरवाजे पर खड़ी थी, तभी गोलियों की बौछार शुरू हो गयी. पूरा गांव चीख-पुकार से भर गया. वह किसी तरह घर में छिपकर अपनी जान बचायी.

कागजों में सिमटी अस्पताल व पोस्ट आफिस बनाने की घोषणा

मियांपुर गांव के लोगों ने बताया कि घटना के अगले दिन तत्कालीन मुख्यमंत्री राबड़ी देवी व लालू प्रसाद गांव पहुंचे और छह बेड का अस्पताल बनाने की घोषणा की. आज तक घोषणा कागजों में ही सिमटी रही. तत्कालीन केंद्रीय मंत्री राम विलास पासवान ने पोस्ट ऑफिस बनाने का वादा किया था, लेकिन सिर्फ एक लेटर बॉक्स टांग दिया गया. शिवानंद तिवारी, श्यामा सिन्हा सहित कई नेता आये, लेकिन बुनियादी सुविधाएं आज भी बहाल नहीं हुई. गांव में बिजली की हालत बेहद खराब है. कई जगहों पर बिजली बांस-बल्लों के सहारे खींची गई है.

नरसंहार में इनकी हुई थी हत्या

मियांपुर नरसंहार में लालदेव यादव, देवनंदन यादव, कृत यादव, बलिराम यादव, राम बच्चन कुमार, अखिलेश कुमार, सुबोध कुमार, धीरेंद्र कुमार, पप्पू कुमार, कुनकुन कुमार, शिवांजन यादव, अर्जुन मिस्त्री, सुगिया देवी, देव कालिया देवी, उर्मिला देवी, दिलवा देवी, ललिता देवी, रीता देवी, शिवकुमारी देवी, गीता देवी, उर्मिला देवी, सुगनवा देवी, गीता कुमारी, जानती कुमारी, मुन्ना कुमारी, बृजवंती कुमारी, राम भजन पासवान, दुलारी देवी, फुलिया देवी, रीता देवी, कांति कुमारी, आशा कुमारी की हत्या हुई थी.

आरोपित हो गये बरी

मियांपुर नरसंहार मामले में 10 आरोपितों को सजा सुनायी गयी थी. बाद में नौ लोगों को बरी कर दिया गया था. वर्षों तक कोर्ट में मामला चला. हाइकोर्ट ने राज्य सरकार को पीड़ितों के आश्रितों को उचित मुआवजा देने का आदेश जारी किया था. वैसे औरंगाबाद सिविल कोर्ट के एससीएसटी न्यायालय के विशेष न्यायाधीश ने 20 सितंबर 2007 को 10 आरोपियों को उम्रकैद की सजा के साथ ही पांच-पांच हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनायी थी.जुर्माना नहीं देने पर तीन वर्ष के अतिरिक्त सजा सुनायी गयी थी.ट्रायल के दौरान अभियोजन की ओर से 69 गवाहों ने गवाही दी थी, जिसमें नौ चिकित्सक, दो न्यायिक दंडाधिकारी व चार पुलिसकर्मी शामिल हैं. अंतत: हाईकोर्ट ने साक्ष्य के अभाव में नौ लोगों को बरी कर दिया था. प्राथमिकी मियांपुर गांव के राजाराम यादव ने दर्ज करायी थी.

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