Aurangabad News : दाउदनगर में 1895 पांडुलिपियों के डिजिटाइजेशन की बड़ी पहल

Aurangabad News:विरासत संरक्षण की पहल, 350 वर्ष पुराना गुरु ग्रंथ साहिब भी संरक्षण सूची में

दाउदनगर. भारत सरकार के ज्ञान भारतम् मिशन के तहत समृद्ध ज्ञान परंपरा और ऐतिहासिक दस्तावेजों के संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाये जा रहे हैं. इस पहल का मुख्य उद्देश्य प्राचीन पांडुलिपियों, हस्तलिखित ग्रंथों और ऐतिहासिक दस्तावेजों को डिजिटाइज कर आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखना है, ताकि उनमें निहित ज्ञान को वैश्विक स्तर पर साझा किया जा सके. जिला कला एवं संस्कृति पदाधिकारी कुमार पप्पू राज के नेतृत्व में दाउदनगर और आसपास के क्षेत्रों में संरक्षित दुर्लभ पांडुलिपियों का निरीक्षण किया गया. इस क्रम में कई ऐतिहासिक दस्तावेजों की पहचान कर उनके संरक्षण और डिजिटाइजेशन की प्रक्रिया तेज कर दी गयी है. अधिकारियों के अनुसार, इस मिशन में उन सभी दस्तावेजों को शामिल किया जा रहा है जो कम से कम 75 वर्ष पुराने हैं और कागज, भोजपत्र, ताड़पत्र, कपड़ा या धातु जैसे पारंपरिक माध्यमों पर लिखे गये हैं. निरीक्षण के दौरान बाबा बिहारी दास की संगत में संरक्षित लगभग 350 वर्ष पुराने हस्तलिखित गुरु ग्रंथ साहिब का विशेष अध्ययन किया गया. यह पांडुलिपि धार्मिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है. इसके साथ ही 94 वर्ष पुरानी हस्तलिखित पुस्तक किताब अनीशुल क्लुब (दर्पण) का भी निरीक्षण किया गया, जिसे पत्रकार सैयद सबा कादरी द्वारा प्रस्तुत किया गया. इसके लेखक पीर सैयद अनीस अहमद कादरी हैं और यह पुस्तक आध्यात्मिक विषयों पर आधारित एक महत्वपूर्ण दस्तावेज है.

दाउदनगर महाविद्यालय के पुराने अभिलेखों को भी किया गया शामिल

इसके अतिरिक्त दाउदनगर महाविद्यालय के पुराने अभिलेखों को भी इस परियोजना में शामिल किया गया है. प्रशासन के अनुसार जिले में अब तक 1895 हस्तलिखित दस्तावेजों की पहचान की जा चुकी है, जिन्हें एक विशेष एप के माध्यम से डिजिटल रूप में परिवर्तित किया जा रहा है. यह प्रक्रिया न केवल दस्तावेजों को सुरक्षित रखने में सहायक होगी, बल्कि शोध, अनुवाद और प्रकाशन के लिए भी नयी संभावनाएं खोलेगी. औरंगाबाद जिला प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि सभी पांडुलिपियां उनके मूल स्वामियों के पास ही सुरक्षित रहेंगी. डिजिटाइजेशन का उद्देश्य केवल डिजिटल प्रतिलिपि तैयार करना है, ताकि मूल दस्तावेजों को किसी प्रकार का नुकसान न पहुंचे.

पांडुलिपियों के संरक्षण पर विशेष फोकस

कई पुराने दस्तावेज समय, नमी और प्राकृतिक कारणों से नष्ट होने की कगार पर हैं. ऐसे में इनके संरक्षण के लिए आवश्यक उपाय किये जा रहे हैं, ताकि अमूल्य धरोहरों को लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सके.

दाउदनगर की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहर

दाउदनगर की सांस्कृतिक विरासत में बाबा बिहारी दास की संगत का विशेष महत्व है, जिसकी स्थापना लगभग 350 वर्ष पूर्व मानी जाती है. मान्यता है कि टेकारी महाराज और तिलौथू स्टेट द्वारा हिंदू धर्म और संस्कृति की रक्षा के लिए 360 संगतों की स्थापना की गई थी, जिनमें यह संगत भी शामिल है. यहां बाबा बालक दास की समाधि स्थित है और ऐतिहासिक रूप से यहां गुरु ग्रंथ साहिब की पूजा तथा नानकशाही परंपरा का पालन होता रहा है. यह स्थल आज भी धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक पहचान का केंद्र बना हुआ है.

94 वर्ष पुरानी पुस्तक भी संरक्षण सूची में

पुराना शहर स्थित खानकाह आलिया कादरिया भी दाउदनगर के प्रमुख ऐतिहासिक स्थलों में शामिल है, जिसका इतिहास लगभग 302 वर्षों पुराना बताया जाता है. यहां संरक्षित 94 वर्ष पुरानी हस्तलिखित पुस्तक अनीशुल क्लुब को तत्कालीन गद्दीनशीं पीर अनीस अहमद कादरी ने लिखा था, जो आध्यात्मिक ज्ञान का महत्वपूर्ण स्रोत है.

वैश्विक स्तर पर ज्ञान साझा करने की दिशा में कदम

ज्ञान भारतम् मिशन के तहत यह अभियान भारत की समृद्ध बौद्धिक परंपरा को संरक्षित करने और उसे वैश्विक मंच पर स्थापित करने का प्रयास है. डिजिटाइजेशन से ये दस्तावेज अब शोधकर्ताओं, इतिहासकारों और आम लोगों के लिए आसानी से उपलब्ध हो सकेंगे. इस पहल से उम्मीद है कि आने वाले समय में दाउदनगर और औरंगाबाद जिले की ऐतिहासिक पहचान और अधिक मजबूत होगी तथा भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा नई पीढ़ी तक प्रभावी रूप से पहुंच सकेगी.

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