(औरंगाबाद से सुजीत कुमार सिंह की रिपोर्ट)
Aurangabad News: औरंगाबाद जिले का नाम बदलने की मांग को लेकर अब खुलकर गुटबाजी सामने आने लगी है. एक पक्ष जिले का नाम “देव” रखने की मांग कर रहा है, जबकि दूसरा पक्ष “आदित्य नगर” के नाम पर जोर दे रहा है. दोनों समूह लगातार बैठकें कर रहे हैं, समर्थन जुटा रहे हैं और अपने-अपने तर्कों के साथ जनप्रतिनिधियों तथा आम लोगों को जोड़ने की कोशिश में लगे हैं. ऐसे में जिले में नामकरण का मुद्दा चर्चा का प्रमुख विषय बन गया है.
इतिहास से नहीं लिया सबक, पहले भी विवाद में अटकी थी पहल
हालांकि इतिहास बताता है कि जब किसी जनहित के मुद्दे पर व्यापक सहमति नहीं बन पाती, तो उसका परिणाम अक्सर अधूरा ही रह जाता है. जिले में रमेश चौक पर राजा नारायण सिंह की आदमकद प्रतिमा स्थापित करने को लेकर भी कभी दो गुट आमने-सामने आ गए थे। विवाद और खींचतान के कारण वह पहल अपेक्षित सफलता हासिल नहीं कर सकी और उस दौर में स्थापित दूसरी प्रतिमा आज भी उपेक्षा का शिकार बनी हुई है.
पदयात्रा और ज्ञापन के जरिए समर्थन जुटाने की होड़
अब एक बार फिर वैसी ही स्थिति बनती दिखाई दे रही है. “देव” नाम के समर्थक लगातार पदयात्रा निकालकर जनसमर्थन जुटाने में लगे हैं, जबकि “आदित्य नगर” की मांग करने वाले विभिन्न जनप्रतिनिधियों से मुलाकात कर ज्ञापन सौंप रहे हैं.
दोनों पक्ष अपने-अपने अभियान को तेज कर रहे हैं, लेकिन किसी साझा मंच या सर्वसम्मति की दिशा में अभी तक कोई ठोस पहल दिखाई नहीं दे रही है.
बुद्धिजीवियों ने दी सहमति बनाने की सलाह
इस बीच जिले के समाजसेवी, बुद्धिजीवी और शिक्षाविद भी असमंजस की स्थिति में हैं. उनका मानना है कि नाम चाहे “देव” हो या “आदित्य नगर”, सबसे महत्वपूर्ण बात जिले की ऐतिहासिक पहचान, सांस्कृतिक विरासत और जनभावनाओं का सम्मान है. इसके लिए किसी भी निर्णय से पहले व्यापक सहमति बनना आवश्यक है.
जनता की नजरें आंदोलन के भविष्य पर
फिलहाल आम जनता यह देख रही है कि औरंगाबाद के नाम परिवर्तन को लेकर वास्तविक जनआंदोलन खड़ा हो रहा है या फिर यह मुद्दा केवल राजनीतिक और गुटीय प्रतिस्पर्धा तक सीमित रह जाएगा.
यदि सभी पक्ष समय रहते एकमत नहीं हुए, तो आशंका है कि “देव” और “आदित्य नगर” दोनों ही नाम बैठकों, नारों और ज्ञापनों तक सिमटकर रह जाएं और नाम परिवर्तन की मांग अपने लक्ष्य तक न पहुंच सके.
