आक्रोश. शाहपुरबिगहा के लोगों ने दी आंदोलन की चेतावनी
कहा, सिर्फ वोट के लिए किया जाता है इस्तेमाल
औरंगाबाद : केंद्र व राज्य में सत्ता परिवर्तन हुई. लेकिन, महादलितों की जिंदगी में क्या परिवर्तन हुआ यह औरंगाबाद शहर के शाहपुरबिगहा मुहल्ले को देखने से ही स्पष्ट होता है. इस मुहल्ले में 500 से अधिक आबादी है और 350 से अधिक वोटर. गांव या मुहल्ला भी आजादी के पूर्व से बसा है. गांव के पुराने मकान से स्थिति का पता चलता है. वैसे कई बुजुर्ग है जो बदहाली की कहानी सुनाते हैं. इस मुहल्ले के लोगों के जीवन में बदलाव तो आया.
लेकिन, गांव की बदहाली नहीं दूर हुई. लोकसभा, विधानसभा और नगर निकाय के चुनाव में सिर्फ यहां के लोग अब तक वोट बैंक की तरह इस्तेमाल किये गये. गांव में सरकारी चापाकल भी नहीं है. शाहपुरबिगहा से होकर गुजरे रास्ते बयां करते हैं कि यह सड़क का रूप है. लेकिन, बरसात के मौसम में सड़क का रूप बेरंग सा हो जाता है.
आखिर कब तक सुविधाओं का इंतजार लोग करते. आक्रोश की ज्वाला इनके बीच धधक रही है. गांव के लोगों ने अब गांव की दशा और दिशा सुधारने के लिए आंदोलन करने का निर्णय लिया है और इसकी शुरुआत भी कर दी है. मंगलवार की शाम मुहल्ले के महिलाओं और पुरुषों ने सरकार व जनप्रतिनिधियों के विरुद्ध आवाज को बुलंद किया. कीचड़ से सने सड़क पर जम कर नारेबाजी की. काफी देर तक लोगों ने अपने आक्रोश का इजहार किया.
लेकिन, इनकी आवाज न तो जनप्रतिनिधियों के कान तक पहुंची और न संबंधित सरकारी विभाग के अधिकारियों तक . मुहल्लावासी अंजू देवी, सत्या देवी, श्रीमती देवी, प्रिंस कुमार, राम कुमार, सुजीत, रामाधार राम, शिवशंकर, राजकुमार व बिरजू राम ने बताया कि औरंगाबाद के सबसे पुराने इस मुहल्ले पर किसी भी जनप्रतिनिधियों ने कभी ध्यान नहीं दिया. वार्ड पार्षद भी अंजान बने रहते हैं. बगल के मुहल्लों में विकास के काम हुए.
लेकिन, अनुसूचित जाति होने का हमलोग दंश झेल रहे हैं. बिजली की व्यवस्था भी हमलोगों ने चंदे से की. निजी चापाकल के भरोसे हमारी जिंदगी चल रही है. सरकार दावा करती है कि दलित-महादलित की स्थिति सुधर रही है. लेकिन, हमलोगों की स्थिति देख कर सरकार के दावे चकनाचूर हो जायेंगे.
