बूढ़ापे का सहारा है पेंशन औरंगाबाद (कोर्ट) पेंशनर्स एसोसिएशन की जिला शाखा द्वारा बुधवार को पेंशन दिवस मनाया गया. इस अवसर आयोजित कार्यक्रम की अध्यक्षता ललन प्रसाद ने की. क्लब रोड स्थित महासंघ भवन कार्यालय में इस दौरान वक्ताओं ने कहा कि पेंशन की गयी सेवा की मजदूरी है. यह एक सामाजिक कल्याण का काम है, जो बुरे दिनों में सामाजिक आर्थिक सहायता के रूप में बुजुर्गो को मिलती है. उन्होंने कहा कि पेंशन बुढ़ापे का सहारा है. पेंशन की योजना ब्रिटिश काल से प्रारंभ है. औपनिवेशक शासकों द्वारा राजसी सेवा की ओर से बुद्धिमान लोगों को आकर्षित करने के लिए 1920 में पेंशन की स्क ीम की शुरुआत हुई थी. राजकीय आयोग ने अनेकों सिफारिशों के बाद पेंशन योजना को बेहतर बनाया और तब भारत सरकार ने 1935 में इसे वैधानिक ताकत प्रदान की. सर्वोचय न्यायालय ने 1982 में 17 दिसंबर को ही एक ऐतिहासिक फैसला में पेंशन का यह कहते हुए सैद्धांतिक स्वरूप प्रदान किया था कि पेंशन तो नियोक्ता की इच्छा से दिया जाने वाला उपहार है और न ही कृपा. यह बीते समय में की गयी सेवा का भुगतान है. पेंशन अतीत में स्वामी भक्त सेवा के लिए न केवल एक क्षतिपूर्ति है, बल्कि सामाजिक आर्थिक न्याय के रूप में भी इसका व्यापक महत्व है. यही कारण है कि 17 दिसंबर को प्रत्येक वर्ष पेंशन दिवस के रूप में मनाया जाता है. इस मौके पर संघ के सचिव भोला शर्मा, रामनरेश मिश्र, गया सिन्हा, अहमद कादरी, राजेश्वर पाठक, कलाम अहमद सहित अन्य उपस्थित थे.
(फोटो नंबर-19)कैप्शन- कार्यक्रम में शामिल पेंशनर्स एसोसिएशन के सदस्य
बूढ़ापे का सहारा है पेंशन औरंगाबाद (कोर्ट) पेंशनर्स एसोसिएशन की जिला शाखा द्वारा बुधवार को पेंशन दिवस मनाया गया. इस अवसर आयोजित कार्यक्रम की अध्यक्षता ललन प्रसाद ने की. क्लब रोड स्थित महासंघ भवन कार्यालय में इस दौरान वक्ताओं ने कहा कि पेंशन की गयी सेवा की मजदूरी है. यह एक सामाजिक कल्याण का काम […]
