केशव कुमार सिंह, औरंगाबाद : मैं सर्जन हूं. सरकारी अस्पताल में आने वाले जरूरतमंद मरीजों का ऑपरेशन कर सकता हूं. मेरी पढ़ाई, जानकारी व अनुभव भी इसी के लिए है. लेकिन, मरीज का ऑपरेशन न करवा कर सिर्फ जनरल ओपीडी में सर्दी-बुखार से पीड़ित मरीजों का इलाज करवाते थे. ऐसे में सर्जन डॉक्टर होने के नाते मेरा इमान जवाब दे उठा. जब पढ़ाई व अनुभव का लाभ जरूरतमंद मरीज को न मिले, तो मेरा डॉक्टर के रूप में नौकरी करना बेकार है.
औरंगाबाद : मैं सर्जन हूं, मुझसे सर्दी-बुखार का करवाया जाता था इलाज, इसलिए छोड़ी नौकरी
केशव कुमार सिंह, औरंगाबाद : मैं सर्जन हूं. सरकारी अस्पताल में आने वाले जरूरतमंद मरीजों का ऑपरेशन कर सकता हूं. मेरी पढ़ाई, जानकारी व अनुभव भी इसी के लिए है. लेकिन, मरीज का ऑपरेशन न करवा कर सिर्फ जनरल ओपीडी में सर्दी-बुखार से पीड़ित मरीजों का इलाज करवाते थे. ऐसे में सर्जन डॉक्टर होने के […]

अंतत: मैंने ऐच्छिक सेवानिवृत्ति लेते हुए नौकरी छोड़ दी. यह कहना है औरंगाबाद सदर अस्पताल में पदस्थापित सर्जन डॉ सरताज अहमद का. गुरुवार को उन्होंने प्रभात खबर के साथ अपनी आपबीती साझा की. उन्होंने स्पष्ट कहा कि सदर अस्पताल की व्यवस्था से क्षुब्ध होकर नौकरी से ऐच्छिक सेवानिवृत्ति ली है.
पिछले 10 वर्षों से पदस्थापित डॉ सरताज अहमद द्वारा नौकरी छोड़े जाने के बाद स्वास्थ्य महकमा की व्यवस्थाओं पर कई सवाल खड़ा हो गया है. डॉ सरताज अहमद के अलावा अन्य डॉक्टर भी व्यवस्था से क्षुब्ध होकर वीआरएस लेने की कोशिश में हैं. इसमें एक वरीय चिकित्सा पदाधिकारी भी हैं.
ऐच्छिक सेवानिवृत्ति के बाद डॉ सरताज ने सुनायी आपबीती
औरंगाबाद में पहली बार सामने आया ऐसा मामला
ऐच्छिक सेवानिवृत्ति के लिए कोर्ट की ली शरण
डॉ सरताज अहमद ने बताया कि ऐच्छिक सेवानिवृत्ति के लिए कोर्ट की भी शरण लेनी पड़ी. प्रयास कामयाब हुआ. अब विभाग द्वारा अधिसूचना जारी कर दी गयी है. सरकार के संयुक्त सचिव अनिल कुमार ने ज्ञापांक 740(3), दिनांक 6 जून 2019 के माध्यम से अधिसूचना जारी की है.
इसमें उल्लेख है कि सदर अस्पताल के चिकित्सा पदाधिकारी डॉ सरताज अहमद को उनके अभ्यावेदन पर विचारोपरांत बिहार सरकार सेवा संहिता के नियम 74 बी के तहत विभागीय पत्रांक 6190 दिनांक 27-4-1969 में निहित प्रावधान के आलोक में अधिसूचना निर्गत की तिथि से सशर्त ऐच्छिक सेवानिवृत्ति की स्वीकृति दी जाती है.
यदि ऐच्छिक सेवानिवृत्ति के बाद उक्त चिकित्सा पदाधिकारी के विरुद्ध किसी प्रकार की अनियमितता का विषय संज्ञान में आता है या दोषी पाये जाते हैं तो उनके विरुद्ध नियमानुसार कानूनी कार्रवाई की जायेगी. साथ ही डॉ सरताज अहमद भविष्य में बिहार सरकार की सेवा में पुर्ननियोजन या संविदागत नियोजन के पात्र नहीं होंगे.
कई बार किया आग्रह, किसी ने नहीं सुना
डॉ सरताज अहमद ने वीआरएस लेने के बाद सदर अस्पताल में बतौर एमएस के पद पर कार्यरत होते हुए अपना सर्वोच्च देना चाहते थे. यहां आने वाले मरीजों को नि:शुल्क में हर्निया, ऑपेंडिक्स, हाईड्रोसिल, पथरी व सिजेरियन समेत अन्य ऑपरेशन करने के लिए तैयार रहता था. इसके लिए उपाधीक्षक से लेकर सिविल सर्जन तक की बैठक में कई बार उपस्थित होकर आग्रह किया कि एक एनेस्थेसिया चिकित्सक दिया जाये.
फिर ऑपरेशन हो जायेगा. लेकिन, मेरी बातों को किसी ने नहीं सुनी. दरकिनार कर दिया. तब मुझे लगा मेरी पढ़ाई व अनुभव बेकार साबित हो रहा है. फिर काम करने की इच्छा खत्म हो गयी. जबकि, प्रत्येक दिन सुदूर ग्रामीण क्षेत्र से गरीब तबका के लोग आते हैं और गिड़गिड़ाते हुए ऑपरेशन करने के लिए आग्रह करते हैं.
लेकिन, इजाजत नहीं मिलने के कारण चाह कर भी ऑपरेशन नहीं कर पाता था. हमसे दर्द, बुखार का इलाज कराते थे. जबकि इन बीमारियों का इलाज एक आयुष चिकित्सक या एमबीबीएस भी कर सकता है. सरकार जिस काम के लिए हमें वेतन के रूप में दो लाख रुपये दे रही थी, वह भी भारी लग रहा था. तब मैंने स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति का फैसला ले लिया.
सदर अस्पताल ने ऑपरेशन का लक्ष्य कभी नहीं किया पूरा
डॉ सरताज अहमद को ऑपरेशन करने की इजाजत नहीं देने व इसके बाद वीआरएस लेने के लिए अब कई तरह के सवाल उठ रहे हैं. सदर अस्पताल को हर महीने सिजेरियन, बंध्याकरण करने का लक्ष्य दिया जाता है.
लेकिन, सदर अस्पताल की हकीकत है कि आज तक कभी भी लक्ष्य को पूरा नहीं कर सका. इसके पीछे का कारण यह है कि यहां कार्यरत महिला चिकित्सक सिजेरियन करने से कतराती हैं. जबकि, सर्जन चिकित्सक जो ऑपरेशन करने को तैयार रहते थे, उन्हें इजाजत ही नहीं दी जाती थी.
वैसे सदर अस्पताल में पदस्थापित कई चिकित्सक पहले भी व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए नौकरी छोड़ चुके हैं. इसमें अनुबंध पर पदस्थापित सर्जन डॉ मनीष कुमार, चर्म रोग विशेषज्ञ डॉ मृत्युजंय कुमार, हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ आसित रंजन समेत अन्य शामिल हैं. इन चिकित्सकों का कहना था कि जिसकी डिग्री है, उस अनुसार इलाज न करवा कर जनरल मरीजों का इलाज कराया जाता था.