सुधीर कुमार सिन्हा, औरंगाबाद शहर : रक्तदान को यूं ही महादान नहीं कहा जाता. इसका महत्व वे लोग अधिक समझ सकते हैं, जिनके घरों का चिराग दान के खून से जल रहा हो. जिले में एक-दो नहीं, बल्कि दर्जनों ऐसे घर हैं. जो दान के खून से रोशन हो रहे हैं. आज विश्व थैलेसीमिया दिवस है. थैलेसीमिया एक घातक बीमारी है. इस बीमारी के प्रति काफी जागरूकता का अभाव है. इस खास दिवस को मनाने की वजह यही है कि लोग जागरूक हों और इस बीमारी की रोकथाम हो सके.
दान के खून से जल रहे कई घरों के चिराग
सुधीर कुमार सिन्हा, औरंगाबाद शहर : रक्तदान को यूं ही महादान नहीं कहा जाता. इसका महत्व वे लोग अधिक समझ सकते हैं, जिनके घरों का चिराग दान के खून से जल रहा हो. जिले में एक-दो नहीं, बल्कि दर्जनों ऐसे घर हैं. जो दान के खून से रोशन हो रहे हैं. आज विश्व थैलेसीमिया दिवस […]

इस बीमारी से पीड़ित मरीजों को जल्दी-जल्दी रक्त चढ़ाने की जरूरत होती है. जाहिर है इसके लिए परिजनों को परेशान भी होना पड़ता है. जिले में लगभग 24 थैलेसीमिया से पीड़ित मरीज हैं. इन्हें सदर अस्पताल स्थित ब्लड बैंक में समय पर खून उपलब्ध कराया जाता है.
किसी को 13, तो किसी को 10 साल से मिल रहा जीवनदान: जिले में कई ऐसे थैलेसीमिया मरीज हैं, जिन्हें दशकों से जीवनदान मिल रहा. वह भी रक्तदान से. दाउदनगर के शमशेरनगर निवासी आलोक कुमार को छह महीने की उम्र में थैलेसीमिया हो गयी थी.
तब से उसे लगातार खून की जरूरत होती है. आज वह 13 वर्ष का है. न्यू एरिया निवासी 12 वर्षीय मिस्टर आर्यन को 2009 से ब्लड चढ़ाया जा रहा है. नवीनगर निवासी अरविंद सिंह के बेटे आदित्य कुमार पिछले पांच सालों से इस बीमारी से पीड़ित है.
रिसियप निवासी अजीत किशोर के बेटे आर्यन राज, दाउदनगर के संतोष मेहता के बेटे रवि कुमार भी कई वर्षों से इस बीमारी की चपेट में है. शहर के मिनी बिगहा निवासी अनिशा कुमारी, कुटुंबा के सिमरी निवासी निखिल कुमार, नवीनगर के विशाल कुमार, नावाडीह निवासी अब्दुल मुतलिफ, कुटुंबा के डुमरी निवासी अर्नव कुमार, फेसर के अक्षय कुमार, देव के हैदरचक निवासी रंजीत कुमार को भी काफी पहले यह बीमारी हो गयी थी.
शहर के श्रीकृष्ण नगर मुहल्ला निवासी शालू कुमारी, देव के अजब बिगहा की काव्या कुमारी, झारखंड के हरिहरगंज निवासी सूर्यकांत कुमार व सोनम कुमारी, दोसमा निवासी कन्हैया कुमार को रक्तदान से जीवनदान मिल रहा है.
अनुवांशिक बीमारी का प्रमाण : तीन सहोदर भाई व दो जुड़वां भी ग्रसित
डॉक्टरों की मानें तो यह बीमारी अनुवांशिक है. इसके प्रमाण भी मिलते हैं. रोहतास के राजपुर निवासी कुंज बिहारी के तीन बेटे इसी बीमारी से ग्रसित हैं. आठ वर्षीय सूरज कुमार, छह वर्षीय पवन कुमार व तीन वर्षीय आदित्य कुमार को दान में मिले खून चढ़ाये जाते हैं, जिससे ये सामान्य जीवन जी रहे हैं. कुंज बिहारी की एक अन्य संतान की मौत भी इस बीमारी से हो चुकी है. इसी तरह देव निवासी जुड़वां भाई लव-कुश हैं. इन दोनों को थैलेसीमिया है.
20 दिनों में चढ़ाना पड़ता है एक यूनिट ब्लड
सामान्य रूप से शरीर में लाल रक्त कणों की उम्र करीब 120 दिनों की होती है. लेकिन, थैलेसीमिया के कारण इनकी उम्र सिमटकर मात्र 20 दिनों की हो जाती है. इसका सीधा प्रभाव शरीर में स्थित हीमोग्लोबीन पर पड़ता है. ब्लड बैंक के नोडल पदाधिकारी डॉ विनय कुमार ने बताया कि इस बीमारी में बोन मैरो ठीक तरह से काम नहीं करता. इसका इलाज थोड़ा महंगा होता है. वैसे इलाज के बाद बीमारी ठीक हो जाती है.
पटना में होता था अधिक खर्च, यहां नि:शुल्क
थैलेसीमिया पीड़ित दाउदनगर निवासी जितेन्द्र पासवान को हर 20 दिनों में खून चढ़ाने के लिए पैसे खर्च करने पड़ते थे. खून तो उपलब्ध हो जाता था लेकिन निजी अस्पताल में भर्ती होकर खून चढ़वाने में 1500-2000 रुपये खर्च होते थे. जो संभव नहीं था. अब यहां सदर अस्पताल में यह काम नि:शुल्क होता है.