आजादी के 70 साल बाद महादलितों को मिली सीताथापा धाम में प्रवेश की छूट

औरंगाबाद : मदनपुर में सरकार व समाज की तमाम कोशिशों के बावजूद आज भी जगह-जगह जातिगत भेदभाव एक बड़ी समस्या बनी हुई है. इसके बावजूद कि आज सबके पास समानता का अधिकार है. सभी को एक जैसे जीने का हक है. लेकिन, इसी बीच कुछ ऐसे काम हो रहे हैं, घटनाएं हो रही हैं, जिनसे […]

औरंगाबाद : मदनपुर में सरकार व समाज की तमाम कोशिशों के बावजूद आज भी जगह-जगह जातिगत भेदभाव एक बड़ी समस्या बनी हुई है. इसके बावजूद कि आज सबके पास समानता का अधिकार है. सभी को एक जैसे जीने का हक है. लेकिन, इसी बीच कुछ ऐसे काम हो रहे हैं, घटनाएं हो रही हैं, जिनसे समाज को नयी दिशा भी मिलती दिख रही है. ऐसी ही एक बात फिर सामने आयी है. मामला औरंगाबाद जिले के मदनपुर ब्लॉक में स्थित नीमा गांव से जुड़ा है. ताजी प्रगति महादलित समुदाय के लोगों के लिए काफी उत्साहवर्द्धक है. कहा जा सकता है कि किसी उत्सव से कम नहीं. घटना नीमा के प्रसिद्ध सीताथापा धाम मंदिर में महादलितों को प्रवेश की छूट से जुड़ी है.

नीमा के ऐतिहासिक सीताथापा मंदिर में आजादी के 70 वर्ष बाद तक महादलित समुदाय के लोगों का प्रवेश वर्जित था. लेकिन, एक दशक पूर्व सीताथापा मंदिर के मुख्य पुजारी बसंत शून्यदास द्वारा शुरू किये गये भागीरथ प्रयास से नीमा के महादलितों को अब मंदिर में प्रवेश की आजादी मिल गयी है. मुख्य पुजारी बसंत शून्यदास का कहना है कि इसके पहले भी असामाजिक तत्व महादलितों पर अत्याचार ढा रहे थे. उनके द्वारा जब इसका विरोध किया जाता था, तो उन्हें धमकी दी जाती थी. धमकाया जाता था कि अगर महादलितों के पक्ष में खड़े हुए, तो जान से हाथ धोना पड़ेगा.

बाध्य होकर मुख्य पुजारी ने विगत मंगलवार को औरंगाबाद जिलाधिकारी को सारी बातें बतायीं. मुख्य पुजारी और जगन यादव नामक एक ग्रामीण इस मामले को लेकर जिलाधिकारी कंवल तनुज के पास पहुंचे थे. मामले की जानकारी मिलने के बाद जिलाधिकारी ने इस मामले में रुचि दिखाते हुए अपने स्तर से प्रयास शुरू किया. जिलाधिकारी व उनके सहयोगी दूसरे अफसरों के सामूहिक प्रयास का असर यह हुआ कि बुधवार को यहां हुई एक लंबी बैठक के बाद महादलितों को सीताथापा मंदिर के अखंड परिक्रमा परिसर में भी प्रवेश की छूट मिल गयी.

नीमा निवासी तमाम महादलित इस नयी प्रगति से काफी खुश हैं. इसी गांव के रामरतन दास का कहना है कि कई वर्षों से वह ऐतिहासिक सीताथापा मंदिर में पूजा-अर्चना के लिए नहीं जा पा रहे थे. देवी-देवताओं व भगवान का दर्शन-पूजन नहीं कर पा रहे थे. इस दिशा में कोशिश शुरू करने पर उनके समुदाय के लोगों को धमकाया जाता था. लेकिन, बाबा बसंत शून्यदास और अधिकारियों के कठोर प्रयास व मजबूत इच्छाशक्ति से उनके समुदाय को आखिरकार मंदिर में प्रवेश की आजादी मिल गयी.

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