अरवल जिले के कुर्था प्रखंड स्थित लारी गांव, जिसे सती नगरी के नाम से भी जाना जाता है, अपने ऐतिहासिक गौरव के लिए प्रसिद्ध है. लारी गढ़ पर आज भी एक ऐसा ऐतिहासिक भवन मौजूद है, जो उस दौर की पंचायती व्यवस्था की कहानी बताता है. वर्ष 1911 में बना यह भवन अब सरकारी उपेक्षा के कारण जर्जर स्थिति में पहुंच गया है.
1911 में रखी गई थी एडवर्ड ऑर्बिटेंशन हॉल की नींव
इतिहास के अनुसार इस भवन की नींव वर्ष 1911 में तत्कालीन सम्राट एडवर्ड सप्तम के नाम पर एडवर्ड ऑर्बिटेंशन हॉल के रूप में रखी गई थी. दो वर्षों के निर्माण कार्य के बाद वर्ष 1913 में भवन तैयार हुआ. इसका उद्घाटन तत्कालीन गया जिले के जिलाधिकारी ओल्डहम ने किया था. उस समय वर्तमान अरवल जिला गया जिले का हिस्सा था.
1908 में लारी में शुरू हुई थी पंचायती व्यवस्था
प्रो. शिवपूजन शर्मा की पुस्तक 'त्रिभुवन' में इस ऐतिहासिक भवन और लारी की पंचायती व्यवस्था का उल्लेख मिलता है. पुस्तक के अनुसार बिहार पंचायती राज व्यवस्था के संयोजक आदित्य प्रसाद सिंह की पहल पर वर्ष 1908 में लारी गांव में पंचायती राज व्यवस्था का गठन किया गया था.
जब पंचायत की अवधारणा थी नई, तब लारी में शुरू हुआ प्रयोग
उस दौर में देश में पंचायत की अवधारणा अभी नई थी. ऐसे समय में लारी गांव में लोकतांत्रिक पंचायत व्यवस्था को जमीन पर उतारा गया. यही वजह है कि लारी का यह ऐतिहासिक भवन बिहार की पंचायती व्यवस्था के शुरुआती इतिहास का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है.
ईमानदारी और चरित्र के आधार पर चुने जाते थे पंच
पुस्तक में उल्लेख है कि पंचायत के गठन के समय पांच पंचों का चयन उनकी ईमानदारी, चरित्र और समझदारी के आधार पर किया जाता था. शुरुआती पंचों में प्रसिद्ध नारायण सिंह, नरसिंह नारायण सिंह, रामविशुन सिंह, रामबली सिंह और राम गुलाम सिंह के नाम शामिल थे.
जाति और धर्म से ऊपर थी पंचायत व्यवस्था
उस समय की पंचायती व्यवस्था में पारदर्शिता और विधि-सम्मत प्रक्रिया पर जोर दिया जाता था. पंचायत के कामकाज में जाति, भाषा और मजहब के आधार पर भेदभाव नहीं किया जाता था. यदि ग्राम पंचायत का कोई निर्णय सही नहीं माना जाता था, तो मामले को सब-डिवीजन स्तर की पंचायत में भेजने की व्यवस्था थी.
100 साल से ज्यादा पुरानी धरोहर बदहाल
एक सदी से अधिक पुराना यह ऐतिहासिक पंचायत भवन अब रख-रखाव के अभाव में जर्जर हो चुका है. कभी ग्रामीण लोकतंत्र की शुरुआती व्यवस्था का गवाह रहा यह भवन आज संरक्षण की बाट जोह रहा है. यहां अब सरकारी कामकाज भी नहीं होता है.
पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने की मांग
स्थानीय लोगों और इतिहास प्रेमियों ने सरकार और जिला प्रशासन से इस ऐतिहासिक भवन के संरक्षण की मांग की है. लोगों का कहना है कि भवन का जीर्णोद्धार कर इसे पर्यटन और ऐतिहासिक स्थल के रूप में विकसित किया जा सकता है.
आने वाली पीढ़ियों के लिए बचाना जरूरी
लारी का यह ऐतिहासिक पंचायत भवन बिहार में पंचायती राज व्यवस्था के पुराने इतिहास की महत्वपूर्ण कड़ी है. इसका संरक्षण होने से आने वाली पीढ़ियों को न केवल इस भवन का इतिहास जानने का मौका मिलेगा, बल्कि वे ग्रामीण लोकतंत्र के शुरुआती स्वरूप से भी परिचित हो सकेंगे.
