संतान की लंबी उम्र के लिए माताओं ने रखा निर्जला व्रत

जिले भर में जिउतिया व्रत धूमधाम व परंपरागत ढंग से संपन्न

आरा.

जिलेभर में जिउतिया पर्व धूमधाम व परंपरागत ढंग से मनाया गया. इस दौरान माताओं ने पूरे दिन निर्जला उपवास रहकर संतानों की लंबी उम्र की कामना की. तीन दिनी पर्व में माताएं अपने परिवार की सुख शांति के लिए कठिन परिश्रम करती हैं. 13 सितंबर को व्रतियों ने पकवान बनाया व भोजन किया. प्रसाद के रूप में इसे सगे संबंधियों व इष्ट मित्रों को खिलाया गया.

14 सितंबर को पूरे दिन माताओं ने पानी भी नहीं पिया.शाम को घरों सहित मंदिरों में भी पूजा पाठ किया गया व संतानों की लंबी उम्र की कामना की गयी. इस दौरान व्रती महिलाओं ने एक दूसरे को जिउतिया पर्व से संबंधित कथा सुनाया. इसे लेकर पूरे जिले में उत्साह का माहौल था.हर तरफ कथा वाचन से पूरा माहौल आध्यात्मिक बन गया था. जितिया पर्व को लेकर शुद्ध घी में ठेकुआ बनाया जाता है.इसे ओठघन कहा जाता है. इसे प्रसाद के रूप में माताएं अपनी संतानों को खिलाती है.

महाभारत का भी है संबंधकहा जाता है कि महाभारत के युद्ध में अपने पिता की मौत के बाद अश्वत्थामा बहुत नाराज था.उसके हृदय में बदले की भावना भड़क रही थी. इसी के चलते वह पांडवों के शिविर में घुस गया.शिविर के अंदर पांच लोग सो रहे थे. अश्वत्थामा ने उन्हें पांडव समझकर मार डाला. वे सभी द्रोपदी की पांच संतानें थीं. फिर अर्जुन ने उसे बंदी बनाकर उसकी दिव्य मणि छीन ली. अश्वत्थामा ने बदला लेने के लिए अभिमन्यु की पत्नी उत्तरा के गर्भ में पल रहे बच्चे के गर्भ को नष्ट कर दिया.ऐसे में भगवान श्रीकृष्ण ने अपने सभी पुण्यों का फल उत्तरा की अजन्मी संतान को देकर उसको गर्भ में फिर से जीवित कर दिया. गर्भ में मरकर जीवित होने के कारण उस बच्चे का नाम जीवित्पुत्रिका पड़ा.तब से ही संतान की लंबी उम्र और मंगल के लिए जिउतिया का व्रत किया जाने लगा. क्या है जिउतिया व्रत की पौराणिक कथागन्धर्वराज जीमूतवाहन बड़े धर्मात्मा और त्यागी पुरुष थे.युवाकाल में ही राजपाट छोड़कर वन में पिता की सेवा करने चले गए थे.एक दिन भ्रमण करते हुए उन्हें नागमाता मिली. नागमाता काफी विलाप कर रही थी.जब जीमूतवाहन ने उनके विलाप करने का कारण पूछा तो उन्होंने बताया कि नागवंश गरुड़ से काफी परेशान है. वंश की रक्षा करने के लिए गरुड़ से समझौता किया है कि वे प्रतिदिन उसे एक नाग खाने के लिए देंगे और इसके बदले वह हमारा सामूहिक शिकार नहीं करेगा. इस प्रक्रिया में आज उसके पुत्र को गरुड़ के सामने जाना है. नागमाता की पूरी बात सुनकर जीमूतवाहन ने उन्हें वचन दिया कि वे उनके पुत्र को कुछ नहीं होने देंगे और उसकी जगह कपड़े में लिपटकर खुद गरुड़ के सामने उस शिला पर लेट जायेंगे, जहां से गरुड़ अपना आहार उठाता है और उन्होंने ऐसा ही किया. गरुड़ ने जीमूतवाहन को अपने पंजों में दबाकर पहाड़ की तरफ उड़ चला.जब गरुड़ ने देखा कि हमेशा की तरह नाग चिल्लाने और रोने की जगह शांत है तो उसने कपड़ा हटाकर देखा तो जीमूतवाहन को पाया. जीमूतवाहन ने सारी कहानी गरुड़ को बता दी.इसके बाद उसने जीमूतवाहन को छोड़ दिया और नागों को न खाने का भी वचन दिया. आज होगा जिउतिया का पारणसोमवार को जिउतिया का पारण पहले सुबह माताओं द्वारा किया जायेगा .इसके बाद ठेकुआ का प्रसाद संतानों सहित अन्य लोगों को खिलाया जायेगा. इसके साथ ही जिउतिया व्रत संपन्न हो जायेगा.

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Author: DEVENDRA DUBEY

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