भारत की समृद्ध पारंपरिक ज्ञान परंपरा से पर्यावरण संरक्षण संभव : प्रो गणेश

भारतीय संस्कृति एवं पारंपरिक ज्ञान में पर्यावरण संरक्षण की अवधारणाएं विषय पर महाराजा बहादुर राम रणविजय प्रसाद सिंह महाविद्यालय में वेबिनार आयोजित

आरा.

महाराजा बहादुर राम रणविजय प्रसाद सिंह महाविद्यालय (महाराजा कॉलेज) के स्नातकोत्तर भूगोल विभाग के तत्वावधान में मंगलवार को प्रो एसके सिन्हा स्मृति ऑनलाइन व्याख्यान शृंखला के 22वें सत्र का सफलतापूर्वक आयोजन किया गया. यह वेबिनार भारतीय संस्कृति एवं पारंपरिक ज्ञान में पर्यावरण संरक्षण की अवधारणाएं विषय पर आयोजित हुआ.

इस अवसर पर मुख्य वक्ता के रूप में एएनएमपीजी कॉलेज, दुबे छपरा, बलिया (उप्र) के पूर्व प्राचार्य प्रो गणेश कुमार पाठक ( पूर्व विभागाध्यक्ष, स्नातकोत्तर भूगोल विभाग) ने अपना सारगर्भित एवं ज्ञानवर्धक व्याख्यान प्रस्तुत किया. अपने व्याख्यान में प्रो पाठक ने स्पष्ट किया कि भारतीय संस्कृति, वेद, उपनिषद, लोक परंपराएं एवं धार्मिक आस्थाएं पर्यावरण संरक्षण की मजबूत आधारशिला प्रस्तुत करती हैं. उन्होंने सूर्य पूजा, नदियों, वनों, पशु-पक्षियों के प्रति सम्मान तथा पंचतत्व (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु एवं आकाश) की अवधारणा पर विस्तार से प्रकाश डाला. उन्होंने बताया कि वायु संरक्षण की भावना वायु देवता की उपासना में, जल संरक्षण की अवधारणा नदियों की पवित्रता में तथा लोकगीतों, लोककथाओं और पारंपरिक अनुष्ठानों में प्रकृति संरक्षण के गहरे संकेत निहित हैं. वक्ता ने यह भी रेखांकित किया कि भारतीय चिंतन में मानव को प्रकृति का स्वामी नहीं, बल्कि उसका अभिन्न अंग माना गया है. कार्यक्रम का आयोजन महाविद्यालय की प्राचार्या प्रो. कनक लता कुमारी के संरक्षण में किया गया. उन्होंने विभाग की इस शैक्षणिक पहल की सराहना करते हुए कहा कि पारंपरिक ज्ञान वर्तमान पर्यावरणीय संकटों के समाधान में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है.

व्याख्यान शृंखला के संयोजक एवं स्नातकोत्तर भूगोल विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो संजय कुमार ने अपने संबोधन में कहा कि इस प्रकार के व्याख्यान आधुनिक पर्यावरण विज्ञान और भारत की समृद्ध पारंपरिक ज्ञान परंपरा के बीच सेतु का कार्य करते हैं, जिससे विद्यार्थियों में सांस्कृतिक रूप से निहित सतत विकास की चेतना विकसित होती है. कार्यक्रम की आयोजन सचिव डाॅ द्वीपिका शेखर सिंह ने स्वदेशी ज्ञान को औपचारिक शिक्षा से जोड़ने की आवश्यकता पर बल दिया तथा कहा कि पर्यावरणीय स्थिरता प्राप्त करने हेतु पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों का समावेश अत्यंत आवश्यक है. डाॅ अरविंद कुमार सिंह और डॉ विशाल देव ने तकनीकी सहयोग प्रदान करते हुए वेबिनार के सुचारू संचालन को सुनिश्चित किया. इस वेबिनार में 90 से अधिक विद्यार्थी, शोधार्थी एवं शिक्षकगण उपस्थित रहे. देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों एवं महाविद्यालयों के शिक्षकों की उल्लेखनीय सहभागिता रही, जिनमें प्रो. शारदा नन्द झा, दरभंगा से, डाॅ स्नेहा स्वरूप,एस.एस. कॉलेज, जहानाबाद, डाॅ उदय कुमार, इग्नू, पोर्ट ब्लेयर, डा. कुमार शशि शंकर, दरभंगा , डाॅ गौरव सिक्का, पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय पटना, डा. वंदना सिंह, स्नातकोत्तर अंग्रेज़ी विभाग, महाराजा कॉलेज, आरा, आलोक रंजन, वीकेएसयू, आरा, तथा कमलेश कुमार पासवान, और विनय कुमार पासवान,आरा प्रमुख रूप से शामिल रहे. कार्यक्रम का समापन संवादात्मक चर्चा एवं डॉ. क़िसलय कलश के धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ, जिसमें साध.

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By Devendra dubey

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