कामना रहित पूजा होनी चाहिए, कामना युक्त नहीं : जीयर स्वामी

श्रीलक्ष्मी नारायण महायज्ञ का भव्य भंडारे के साथ हुई पूर्णाहुति

आरा.

उदवंतनगर प्रखंड के चौराई गांव में जीयर स्वामी जी महाराज के सान्निध्य में हो रहे श्रीलक्ष्मी नारायण महायज्ञ का भव्य भंडारे के साथ सोमवार को पूर्णाहुति कर दी गयी. इस मौके पर यज्ञ समिति की तरफ से भजन संध्या का भी आयोजन किया गया, जिसमें भजन सम्राट भरत शर्मा ने स्वामी जी का भजन गाकर सबका दिल जीत लिया. यज्ञ समिति की तरफ से आनेवाले सभी आगंतुक अतिथियों को माता की चुनरी देकर सम्मानित किया गया.

स्वामी जी महाराज ने प्रवचन करते हुए कहा कि कामना रहित पूजा होनी चाहिए, कामना युक्त नहीं. क्योंकि ईश्वर तो आपकी सभी कामनाओं को जानते हीं हैं, फिर कहने से क्या फायदा. चित्त की उलटी चाल में मैं फंस गया था, मृगजल ने मुझे भी धोखा दिया था, पर भगवान ने बड़ी कृपा की जो मेरी आंखें खोल दीं. तुमने मेरी गुहार सुनी, इससे मैं निर्भय हो गया हूं. अपने भक्त को दुःखी नहीं करते, अपने दास की चिंता अपने ही ऊपर उठा लेते हैं. सुखपूर्वक हरि का कीर्तन करो, हर्ष के साथ हरि के गुण गाओ. कलिकाल से मत डरो, कलिकाल का निवारण तो सुदर्शनचक्र आप ही कर लेगा. भगवान अपने भक्तों को कभी छोड़ते ही नहीं. हरिका नाम ही बीज है और हरि का नाम ही फल है. यही सारा पुण्य और सारा धर्म है. सब कलाओं का यही सार मर्म है. निर्लज्ज नामसंङ्कीर्तन में सब रसोंका आनन्द एक साथ आता है. सब तीर्थों की मुकुट मणि यह हरिकथा है.यह ऊर्ध्ववाहिनी परमामृत की धारा भगवान् के सामने बहती रहती है. भगवान्पर इस सुधाधारा का अभिषेक होता रहता है. संतों का मुख्य कार्य जीवों को मोह-मायाकी निद्रासे जगा देना होता है स्वयं जगे रहते हैं, दूसरों को जगा देते हैं, जीवों को अभय दान देते हैं और उनका दैन्य नष्ट कर उन्हें स्वानन्द साम्राज्यपद पर आरूढ़ करते हैं ।संतों के उपकार माता-पिता के उपकार से भी अधिक हैं. सब छोटी-बड़ी नदियाँ जिस प्रकार अपने नाम-रूपों के साथ जाकर समुद्र में ऐसी मिल जाती हैं जैसे उनका कोई अस्तित्व ही न हो, उसी प्रकार त्रिभुवन के सब सुख-दुःख संतों के बोधमहार्णव में विलीन हो जाते हैं.

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By DEVENDRA DUBEY

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