भोजपुर वीरों की भूमि रही है, जिसे समय-समय पर यहां के जांबाजों ने अपनी शहादत और पराक्रम से सिद्ध किया है. जब भी देश की रक्षा के लिए प्राणों की आहुति देने की बारी आई, तो यहां के सपूतों ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा. बाबू वीर कुंवर सिंह से लेकर कारगिल शहीद विद्यानंद सिंह तक इस शौर्य गाथा की फेहरिस्त अत्यंत गौरवशाली है.
आज पूरे देश में 'कारगिल विजय दिवस' मनाया जा रहा है और देश के लिए कुर्बान होने वाले वीर सपूतों को याद किया जा रहा है. ऐसे में 1999 के भारत-पाक कारगिल युद्ध में अदम्य साहस का परिचय देते हुए शहीद हुए जिले के जांबाज शहीद विद्यानंद सिंह को उनकी जन्मभूमि पूरी शिद्दत के साथ नमन कर रही है.
1999 में जब पाकिस्तान ने छद्म युद्ध छेड़ा, तब बिहार रेजिमेंट की पहली बटालियन के लाल विद्यानंद सिंह ने 18 हजार फीट की ऊंचाई पर दुश्मन से लोहा लिया. वे 07 जून 1999 को देश की रक्षा करते हुए अमर हो गए.
चाचा और बड़े भाई की वर्दी से मिली थी सेना में जाने की प्रेरणा
शहीद विद्यानंद सिंह का जन्म 12 जनवरी 1966 को भोजपुर जिले के संदेश थाना क्षेत्र अंतर्गत एक छोटे से गांव पनपुरा में हुआ था. उनके पिता सकलदीप सिंह एवं माता लक्ष्मीना देवी एक साधारण किसान परिवार से थे.
उनके चाचा स्व. चंद्रदीप सिंह एवं उनके चचेरे बड़े भाई रामप्रसाद सिंह भी भारतीय सेना में तैनात थे. चाचा और भाई को वर्दी में गांव आते देख तथा उनसे सेना के अदम्य साहस की कहानियां सुनकर विद्यानंद के मन में भी देशसेवा का जज्बा जागा. इसी प्रेरणा से वे 1986 में भारतीय सेना की 1-बिहार रेजिमेंट में भर्ती हुए.
अपनी मजबूत कद-काठी और बलिष्ठता के लिए प्रसिद्ध विद्यानंद सिंह कारगिल युद्ध से पूर्व नागालैंड में तैनात थे. वहां नागा विद्रोहियों के दांत खट्टे करने के लिए उनके उत्कृष्ट प्रदर्शन को देखते हुए उन्हें 'सेना मेडल' (Sena Medal) से सम्मानित किया गया था.
21 मई को पहुंचे कारगिल, 6 जून की रात पाई शहादत
देश के विभिन्न दुर्गम इलाकों में सेवा देने के बाद कारगिल युद्ध से एक वर्ष पूर्व ही उनकी बटालियन जम्मू-कश्मीर में तैनात थी. शहीद के बड़े भाई पूर्व सैनिक रामप्रसाद सिंह बताते हैं कि युद्ध शुरू होते ही बटालियन को कारगिल कूच करने का आदेश मिला और वे 21 मई को कारगिल पहुंचे.
उनकी टीम को 18 हजार फुट की अत्यधिक ऊंचाई पर स्थित बटालिक सेक्टर की एक महत्वपूर्ण चोटी को दुश्मन के कब्जे से मुक्त कराने का जिम्मा सौंपा गया. द्रास और बटालिक की ये चोटियां रणनीतिक रूप से बेहद अहम थीं, क्योंकि ऊपर बैठे पाकिस्तानी सैनिक नीचे से गुजरने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग और रसद आपूर्ति पर सीधा हमला कर रहे थे.
5 जून को उनकी टुकड़ी को चोटी पर कब्जे का टास्क मिला. 6 जून की रात के अंधेरे में खड़ी चढ़ाई पूरी करते हुए विद्यानंद की प्लाटून ने दुश्मन के बंकर पर भीषण हमला बोल दिया. आमने-सामने की लड़ाई में उनकी टीम ने दुश्मनों को पस्त कर बंकर पर तिरंगा फहराया.
इस भीषण मुठभेड़ के दौरान दुश्मनों की ओर से अंधाधुंध गोलीबारी की गई. विद्यानंद सिंह के सीने और शरीर में 6 गोलियां लगीं, लेकिन अंतिम सांस तक वे अपनी मीडियम मशीन गन (MMG) से गोलियां बरसाते रहे और आधा दर्जन से अधिक पाकिस्तानी सैनिकों को ढेर कर दिया. चिकित्सा सहायता पहुंचने से पूर्व ही वे अपने साथियों के साथ वीरगति को प्राप्त हो गए.
9 जून को गांव पहुंचा था पार्थिव शरीर, हजारीबाग में रहता है परिवार
09 जून 1999 को जब शहीद विद्यानंद सिंह का पार्थिव शरीर पटना पहुंचा, तो पूरा देश गर्व और आंसुओं के साथ उनकी अंतिम यात्रा का साक्षी बना. दानापुर रेजिमेंटल सेंटर के अधिकारियों व जवानों ने उनके पैतृक गांव पनपुरा पहुंचकर सैन्य सम्मान के साथ अंतिम विदाई दी, जहां तत्कालीन मुख्यमंत्री ने भी पहुंचकर श्रद्धांजलि अर्पित की थी.
वर्तमान में शहीद की धर्मपत्नी पार्वती देवी अपने पूरे परिवार के साथ हजारीबाग में निवास करती हैं. सरकार द्वारा उनकी पत्नी के नाम हजारीबाग में 'कारगिल पॉइंट' नाम से एक पेट्रोल पंप आवंटित किया गया है. इसके साथ ही 'शहीद विद्यानंद सिंह एजुकेशनल एवं सोशल फाउंडेशन' नामक एनजीओ के माध्यम से सामाजिक कार्य किए जाते हैं.
शहीद के पुत्र ने बताया कि परिजनों के प्रयास से गांव पनपुरा में वर्ष 2003 में 'शहीद स्मारक' का निर्माण कराया गया था, जहां हर वर्ष उनकी शहादत दिवस पर ग्रामीण व जन प्रतिनिधि उन्हें श्रद्धासुमन अर्पित करते हैं.
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