वीर कुंवर सिंह विश्वविद्यालय, आरा के स्नातकोत्तर मनोविज्ञान विभाग में गुरु पूर्णिमा के शुभ अवसर पर "मानव उत्थान में भारतीय मनोविज्ञान की भूमिका" विषय पर दो दिवसीय संगोष्ठी एवं भाषण प्रतियोगिता का आयोजन किया गया.
इस कार्यक्रम में स्नातकोत्तर एवं पीएचडी के विद्यार्थियों ने उत्साहपूर्वक भाग लेते हुए भारतीय मनोविज्ञान के विभिन्न आयामों पर अपने विचार प्रस्तुत किए. कार्यक्रम की अध्यक्षता विभागाध्यक्ष प्रो. यशवंत कुमार ने की.
अध्यक्षीय संबोधन और मुख्य वक्ता के विचार
अपने अध्यक्षीय संबोधन में प्रो. यशवंत कुमार ने कहा कि वर्तमान समय तीव्र प्रतिस्पर्धा, तनाव, भौतिकवाद, तकनीकी निर्भरता तथा सामाजिक विघटन का युग है. ऐसी परिस्थितियों में व्यक्ति आर्थिक, मानसिक, सामाजिक और आध्यात्मिक चुनौतियों का सामना कर रहा है.
इन जटिल समस्याओं के समाधान के लिए भारतीय मनोविज्ञान एक समग्र एवं संतुलित दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है, जो व्यक्ति के सर्वांगीण विकास का मार्ग प्रशस्त करता है.
कार्यक्रम के मुख्य वक्ता डॉ. वाचस्पति दूबे ने भारतीय मनोविज्ञान की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि भारतीय चिंतन "वसुधैव कुटुम्बकम्" तथा "सर्वे भवन्तु सुखिनः" जैसे सार्वभौमिक आदर्शों पर आधारित है.
उन्होंने कहा कि भारतीय मनोविज्ञान व्यक्ति के भीतर सहिष्णुता, सहयोग, सहानुभूति और वैश्विक बंधुत्व की भावना विकसित करता है, जो आज के समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है.
कर्मयोग और आत्मअनुशासन पर जोर
संगोष्ठी का सफल संचालन डॉ. प्रीतिका ने किया. उन्होंने अपने संबोधन में विद्यार्थियों को श्रीमद्भगवद्गीता के कर्मयोग के सिद्धांत को जीवन में अपनाने की सलाह देते हुए कहा कि निष्काम कर्म और आत्मअनुशासन व्यक्ति के व्यक्तित्व विकास तथा मानसिक संतुलन के लिए अत्यंत आवश्यक हैं.
कार्यक्रम के अंत में वक्ताओं ने विद्यार्थियों से भारतीय मनोवैज्ञानिक परंपरा के मूल्यों को आत्मसात कर समाज एवं मानवता के उत्थान में सक्रिय भूमिका निभाने का आह्वान किया. दो दिवसीय इस संगोष्ठी एवं भाषण प्रतियोगिता में विद्यार्थियों की सक्रिय भागीदारी और उत्साह ने इस आयोजन को बेहद सफल और ज्ञानवर्धक बना दिया.
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