Arrah Cultural Tradition: कृष्ण जन्मोत्सव के अवसर पर देश के कई हिस्सों में धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजन होते हैं, लेकिन आरा में इससे जुड़ी संगीत सम्मेलन की परंपरा अपनी अलग पहचान रखती है. करीब एक शताब्दी से चली आ रही यह परंपरा आज भी शास्त्रीय संगीत, गायन, वादन और नृत्य के माध्यम से श्रीकृष्ण की आराधना का माध्यम बनी हुई है. बक्शी विकास के अनुसार, संगीत और सामवेद कृष्ण का स्वरूप है. श्रीकृष्ण ने स्वयं कहा है- "वेदानां सामवेदोऽस्मि, देवानामस्मि वासवः." यही कारण है कि धार्मिक उत्सवों के अवसर पर सांगीतिक आयोजनों की परंपरा सदियों से चली आ रही है.
आरा का श्रीकृष्ण जन्मोत्सव संगीत समारोह इसी सांगीतिक परंपरा की अनूठी मिसाल है. इसकी शुरुआत वर्ष 1914 में कृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर स्व. बक्शी बृजविलास बिहारी एवं स्व. बक्शी कौशलेश बिहारी ने की थी. ठाकुरबाड़ी में शुरू हुआ यह आयोजन धीरे-धीरे शास्त्रीय कलाओं के संरक्षण और संवर्धन का महत्वपूर्ण मंच बन गया. वर्तमान में छह रातों तक यहां शास्त्रीय संगीत की रसधारा प्रवाहित होती है.
1914 में पड़ी थी संगीत सम्मेलन की नींव
आरा में कृष्ण जन्मोत्सव पर संगीत समारोह की नींव वर्ष 1914 में रखी गयी थी. स्व. बक्शी बृजविलास बिहारी और स्व. बक्शी कौशलेश बिहारी ने कृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर इसकी शुरुआत की थी. समय के साथ यह आयोजन केवल धार्मिक उत्सव तक सीमित नहीं रहा, बल्कि शास्त्रीय संगीत और नृत्य की विभिन्न विधाओं के संरक्षण का माध्यम बन गया.
बक्शी विकास बताते हैं कि गायन, वादन और नृत्य के माध्यम से प्रभु के श्रृंगार और आराधना की यह परंपरा युवाओं को संस्कारित करने का भी काम कर रही है.
1950 के दशक में मिली राष्ट्रीय पहचान
ध्रुपद-धमार से शुरू हुए इस संगीत समारोह को देशभर में पहचान दिलाने में महान संगीत प्रेमी स्व. बक्शी कुलदीप नारायण सिन्हा की महत्वपूर्ण भूमिका रही. समारोह के दौरान आज भी श्रोता और कलाकार उन्हें याद करते हैं.
कुलदीप नारायण सिन्हा के निधन के बाद उनके पुत्र स्व. बक्शी अवधेश कुमार श्रीवास्तव और पुत्रवधू शास्त्रीय गायिका विदुषी बिमला देवी ने इस परंपरा को आगे बढ़ाया. वर्तमान में उनके पौत्र और चर्चित कथक नर्तक बक्शी विकास इस जिम्मेदारी का निर्वहन कर रहे हैं.
बिस्मिल्लाह खां से गिरिजा देवी तक दे चुके हैं प्रस्तुति
आरा के इस संगीत समारोह की पहचान इस बात से भी बनी कि देश के कई बड़े संगीतकार और कलाकार यहां अपनी प्रस्तुतियां दे चुके हैं. भारत रत्न शहनाई वादक उस्ताद बिस्मिल्ला खां, पद्मभूषण वीजी जोग, तबला सम्राट पंडित कंठे महाराज, तबला सम्राट पंडित गामा महाराज, पद्मविभूषण पंडित किशन महाराज, पद्मभूषण पंडित सामता प्रसाद उर्फ गोदई महाराज, पंडित रंगनाथ मिश्र, पद्मविभूषण विदुषी गिरजा देवी, पद्मश्री पंडित सियाराम तिवारी, पंडित रामचतुर मलिक, पद्मभूषण एन. राजम, पद्मभूषण बेगम परवीन सुल्ताना और संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित विदुषी सुनन्दा पटनायक जैसी विभूतियों ने इस आयोजन को ऐतिहासिक बनाया.
रातभर जमी रहती थी शास्त्रीय संगीत की महफिल
एक दौर में इस संगीत समारोह में रातभर श्रोताओं की भीड़ जमी रहती थी. कार्यक्रमों की स्तरीयता और कलाकारों की लंबी प्रस्तुतियों के कारण समारोह का समापन होते-होते सुबह हो जाती थी. कार्यक्रम का समापन प्रायः राग भैरवी से होता था.
"बाजूबंद खुली खुली जाय, सावरिया ने कैसो जादू डाला" जैसी ठुमरी के विस्तार और तबले के साथ दरभंगा के पंडित रामदीन पाठक की खंजड़ी की लयकारी पर श्रोता झूम उठते थे. दशरथ ठाकुर के कथक पर पंडित रंगनाथ मिश्र की अद्भुत तबला संगति को पुराने दर्शक आज भी याद कर रोमांचित हो उठते हैं.
कई दिग्गज कलाकारों की प्रस्तुतियों की यादें
समारोह की सुनहरी स्मृतियों में बनारस के सितार वादक पंडित सुरेंद्र मोहन मिश्र, कलकत्ता की कथक नृत्यांगना चंद्रा घोष-तंद्रा घोष, दरभंगा के पंडित रामदीन पाठक, पटियाला घराने के गायक पंडित हरि भजन सिंह, जंगली मल्लिक, ऋखेश्वर तिवारी, हीरा भगत-रामशकल पंडित, चंद्रशेखर पाठक, अखौरी नागेंद्र नारायण सिन्हा उर्फ नंदन जी, रामविलास ओझा, दामोदर शरण, लक्ष्मी जी, हनुमान प्रसाद उर्फ मोहन जी, सुरेंद्राचार्य जी और लक्ष्मण शाहाबादी जैसे गायकों का नाम प्रमुखता से लिया जाता है.
इसी तरह कथक नर्तक दशरथ ठाकुर, राम जी पांडेय, सारंगी वादक हंसा जी, तबला वादक अंबिका सिंह, द्वारिका सिंह, मनन जी, महावीर सिंह, अरविंद कृष्ण, सितार वादक राजेंद्र शर्मा, दामोदर पाठक, बांसुरी वादक चंद्रशेखर सिंह और सखीचंद जी ने भी इस आयोजन की परंपरा को समृद्ध किया.
बाजारवाद की चकाचौंध के बीच परंपरा बचाने का संघर्ष
समय के साथ बाजारवाद और आर्थिक संकट का असर इस आयोजन पर भी पड़ा. बड़े वातानुकूलित सभागार, बड़े प्रायोजक और रंग-बिरंगी रोशनी से सजे मंच वाले आयोजनों के दौर में ईश्वर की आराधना और उपासना पर आधारित यह आयोजन अपेक्षाकृत छोटा नजर आने लगा.
इसके बावजूद निरंतर प्रयास और संघर्ष से स्थानीय युवा कलाकारों और स्थापित वरिष्ठ कलाकारों के संगीत समागम की परंपरा आज भी कायम है. यही निरंतरता इस समारोह को आरा की सांस्कृतिक पहचान से जोड़ती है.
धर्म और जाति से परे सौहार्द का संदेश
श्रीकृष्ण जन्मोत्सव संगीत समारोह आज भी धर्म और जाति की सीमाओं से परे सांस्कृतिक सौहार्द की मिसाल पेश करता है. पिछले वर्षों में रोजे के दौरान शहनाई वादक मो. मुस्लिम और मो. जब्बार की क्लार्नेट जुगलबंदी के साथ पंडित शिवनंदन की तबला संगति को दर्शकों ने खूब सराहा.
देश के सुविख्यात गायक पंडित रामप्रकाश मिश्र और आकाशवाणी की सुविख्यात गायिका मोहिनी देवी भी इस आयोजन में प्रमुखता से शामिल होती रही हैं और अपने संगीत से प्रभु को रागाभोग लगाती हैं.
इसी आयोजन में संगीत मर्मज्ञ पंडित दुशेश्वर लाल ने कहा था कि संगीत का कोई एक धर्म या मजहब नहीं होता. संगीत समाज की धड़कन है, जो जीवन को जीवंत बना देता है.
