Varuthini Ekadashi 2026: वैशाख मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को वरुथिनी एकादशी कहा जाता है. यह व्रत भगवान विष्णु को समर्पित है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन व्रत रखने और भगवान विष्णु की पूजा करने से व्यक्ति के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं और उसे सौभाग्य की प्राप्ति होती है.
तिथि और शुभ मुहूर्त
महावीर पंचांग के अनुसार, एकादशी तिथि की शुरुआत और शुभ समय इस प्रकार हैं:
- एकादशी तिथि का प्रारंभ: 13 अप्रैल की रात 09:19 बजे से
- एकादशी तिथि का समापन: 14 अप्रैल को सुबह 09:05 बजे तक
- ब्रह्म मुहूर्त: सुबह 03:59 से 04:43 तक (साधना के लिए सर्वोत्तम)
- अभिजीत मुहूर्त: दोपहर 11:40 से 12:29 तक (किसी भी शुभ कार्य के लिए उत्तम)
व्रत पारण का समय
कहा जाता है कि व्रत का पूर्ण फल तभी मिलता है, जब उसका पारण सही समय पर किया जाए.
- पारण तिथि: 14 अप्रैल 2026 (मंगलवार)
- पारण का समय: सुबह 06:54 से 08:31 के बीच
वरुथिनी एकादशी पूजा सामग्री
- भगवान विष्णु की मूर्ति या तस्वीर
- पीला कपड़ा (चौकी के लिए)
- पीले फूल (गेंदा या कमल)
- तुलसी दल (अनिवार्य)
- धूप, अगरबत्ती
- शुद्ध घी का दीपक
- रोली, अक्षत, हल्दी
- पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, चीनी)
- कलश, नारियल, सुपारी
- लौंग-इलायची
भोग: भगवान विष्णु को खरबूजा, तुलसी दल और पीली मिठाई का भोग लगाएं.
रंग: इस दिन पीले रंग के वस्त्र पहनना और प्रभु को अर्पित करना अत्यंत शुभ माना जाता है.
फूल: पूजा में भगवान को पीले गेंदे या कमल के फूल श्रद्धापूर्वक अर्पित करें.
पूजा विधि
सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और साफ कपड़े पहनें. इसके बाद भगवान के सामने व्रत का संकल्प लें. भगवान विष्णु की मूर्ति या चित्र के सामने घी का दीपक जलाएं. उन्हें पीले फूल, तुलसी दल, धूप-अगरबत्ती, फल और तिल अर्पित करें तथा भोग लगाएं. इसके बाद वरुथिनी एकादशी की व्रत कथा पढ़ें या सुनें और भगवान विष्णु के मंत्रों का जाप करें. पूजा के अंत में भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की आरती अवश्य करें.
भगवान विष्णु के मंत्र
- ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
- श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारे,
हे नाथ नारायण वासुदेवाय।। - ॐ नारायणाय विद्महे, वासुदेवाय धीमहि, तन्नो विष्णु प्रचोदयात्।।
- ॐ विष्णवे नमः।
- ॐ हूं विष्णवे नमः।
भगवान विष्णु की आरती
ॐ जय जगदीश हरे,
स्वामी जय जगदीश हरे.
भक्त जनों के संकट,
क्षण में दूर करे॥ ॐ जय…॥
जो ध्यावे फल पावे,
दुःख बिनसे मन का.
सुख-सम्पत्ति घर आवे,
कष्ट मिटे तन का॥ ॐ जय…॥
मात-पिता तुम मेरे,
शरण गहूं मैं किसकी.
तुम बिन और न दूजा,
आस करूं मैं जिसकी॥ ॐ जय…॥
तुम पूर्ण परमात्मा,
तुम अंतर्यामी.
पारब्रह्म परमेश्वर,
तुम सबके स्वामी॥ ॐ जय…॥
तुम करुणा के सागर,
तुम पालनकर्ता.
मैं मूरख खल कामी,
कृपा करो भर्ता॥ ॐ जय…॥
तुम हो एक अगोचर,
सबके प्राणपति.
किस विधि मिलूं दयामय,
तुमको मैं कुमति॥ ॐ जय…॥
ॐ जय जगदीश हरे,
स्वामी जय जगदीश हरे.
भक्त जनों के संकट,
क्षण में दूर करे॥ ॐ जय…॥
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