Vaishakh Buddha Purnima 2026: वैशाख मास की पूर्णिमा को बुद्ध पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है. वर्ष 2026 में यह पर्व 1 मई, शुक्रवार को मनाया जा रहा है. इस दिन पवित्र नदियों में स्नान, दान-पुण्य, मंत्र जाप और पूजा-पाठ करने का विशेष महत्व है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन व्रत रखने और व्रत कथा का पाठ करने से जीवन में सकारात्मकता आती है और सभी दुखों का नाश होता है. यह दिन आत्म-शुद्धि और भक्ति के संगम का प्रतीक है.
पौराणिक कथा
प्राचीन काल में कांतिका नामक एक नगर था, जहां चंद्रहास्य नाम के राजा का शासन था. उसी नगर में धनेश्वर नाम के एक ब्राह्मण अपनी पत्नी सुशीला के साथ रहते थे. उनके घर में सुख-सुविधाओं और धन-धान्य का कोई अभाव नहीं था, लेकिन उनकी कोई संतान नहीं थी, जिस कारण वे सदा दुखी रहते थे.
एक बार उस नगर में एक सिद्ध साधु आए. वे प्रतिदिन हर घर से भिक्षा मांगते और फिर गंगा तट पर जाकर उसका भोग लगाते थे. ब्राह्मण धनेश्वर ने देखा कि साधु पूरे नगर से भिक्षा लेते हैं, लेकिन उनके द्वार पर कभी नहीं रुकते. एक दिन उन्होंने साधु को रोका और पूछा, “महाराज, आप पूरे नगर का अन्न ग्रहण करते हैं, फिर मेरे घर से भिक्षा लेने क्यों नहीं आते?”
साधु ने शांत स्वर में उत्तर दिया, “पुत्र, तुम नि:संतान हो. शास्त्रों में संतानहीन व्यक्ति के घर से भिक्षा लेना उचित नहीं माना जाता है, इसलिए मैं तुम्हारे यहाँ से भिक्षा नहीं लेता.” साधु की यह बात ब्राह्मण के हृदय में तीर की तरह चुभी. उन्होंने व्याकुल होकर साधु के चरण पकड़ लिए और संतान प्राप्ति का उपाय पूछा. साधु को उन पर दया आ गई और उन्होंने कहा, “तुम मां चंडी की शरण में जाओ और 16 दिनों तक उनकी कठोर उपासना करो.”
ब्राह्मण दंपती ने ऐसा ही किया. उनकी श्रद्धा से प्रसन्न होकर माता काली प्रकट हुईं और उन्हें पुत्र प्राप्ति का वरदान दिया. माता ने उनसे कहा, “पुत्र प्राप्ति के लिए पूर्णिमा का व्रत करना. प्रत्येक पूर्णिमा पर दीपक जलाना और उनकी संख्या तब तक बढ़ाते रहना जब तक वे 32 न हो जाएं.”
मां के आशीर्वाद से ब्राह्मण की पत्नी ने एक पुत्र को जन्म दिया, जिसका नाम देवीदास रखा गया. समय बीतने के साथ देवीदास बड़ा हुआ और उसे उच्च शिक्षा के लिए काशी भेजा गया. काशी में एक दिन ऐसी परिस्थिति बनी कि अनजाने में उसका विवाह एक कन्या से हो गया. देवीदास को ज्ञात था कि उसकी आयु कम है, इसलिए उसने विवाह के समय अपनी अल्पायु की बात भी कही, लेकिन विधि का विधान अटल था और विवाह संपन्न हो गया.
कुछ समय बाद, जब देवीदास की मृत्यु का समय निकट आया, तो साक्षात ‘काल’ उसके प्राण हरने के लिए पहुँचा. परंतु काल लाख प्रयासों के बाद भी देवीदास के प्राण नहीं ले सका. विवश होकर काल ने यमराज को सूचना दी. जब यमराज स्वयं वहां पहुंचे और भगवान शिव व माता पार्वती से इस रहस्य के बारे में पूछा, तो महादेव ने बताया कि इस बालक की रक्षा उसके माता-पिता के पुण्यों का फल कर रहा है.
धनेश्वर और सुशीला द्वारा किए गए पूर्णिमा व्रत और माता काली के वरदान की शक्ति के आगे काल की शक्ति क्षीण हो गई थी. यमराज को भी वहाँ से खाली हाथ लौटना पड़ा और देवीदास को दीर्घायु प्राप्त हुई. जब यह समाचार पूरे नगर में फैला, तो लोगों ने पूर्णिमा व्रत की महिमा को समझा. तभी से यह माना जाता है कि जो भी व्यक्ति पूर्ण विश्वास के साथ पूर्णिमा का व्रत रखता है और दीपदान करता है, उसे न केवल योग्य संतान की प्राप्ति होती है, बल्कि उसके जीवन से अकाल मृत्यु का संकट भी टल जाता है.
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