रघोतम शुक्ल
पूर्व पीसीएस, लखनऊ
Tulsi Origin Story: क्या आप जानते हैं कि तुलसी जी केवल एक पौधा नहीं, बल्कि स्वयं देवी स्वरूप हैं? उनकी उत्पत्ति वृंदा, जालंधर और शंखचूड़ जैसी रहस्यमयी कथाओं से जुड़ी है. यह कथा न केवल भक्ति का संदेश देती है, बल्कि जीवन और मोक्ष का रहस्य भी बताती है।
जालंधर दैत्य और उसकी उत्पत्ति
प्राचीन काल में जालंधर नाम का एक अत्यंत शक्तिशाली दैत्य हुआ, जिसने अपने पराक्रम से देवताओं को भयभीत कर दिया था। उसकी उत्पत्ति समुद्र मंथन से मानी जाती है. देवी लक्ष्मी ने उसे अपना भाई मानते हुए भगवान विष्णु से यह वचन ले लिया था कि वे उसका वध नहीं करेंगे.
वृंदा की पतिव्रत शक्ति क्यों थी अजेय
जालंधर की पत्नी वृंदा अत्यंत पतिव्रता थी. उसकी पतिव्रत शक्ति के कारण जालंधर अजेय बना हुआ था. भगवान शिव ने उससे लंबा युद्ध किया, लेकिन वृंदा की शक्ति के कारण वे भी उसे परास्त नहीं कर सके। अंततः देवताओं की रक्षा के लिए भगवान विष्णु को लीला करनी पड़ी. इस लीला के परिणामस्वरूप जालंधर का अंत हुआ, लेकिन अपने पति के वियोग में वृंदा सती हो गईं.
विष्णु की लीला और जालंधर का अंत
माना जाता है कि यह घटना आज के जालंधर नगर में घटी थी. यहां के कोट किशनचंद्र क्षेत्र में आज भी वृंदा देवी का मंदिर स्थित है। पौराणिक मान्यता के अनुसार, वृंदा की चिता की राख से तुलसी जी का जन्म हुआ.
तुलसी जी का शंखचूड़ से विवाह
तुलसी जी ने बाद में शंखचूड़ नामक दैत्य से विवाह किया, जो अत्यंत शक्तिशाली था और पूर्व जन्म में भगवान कृष्ण का द्वारपाल रह चुका था. उसे भगवान कृष्ण से प्राप्त दिव्य कवच और तुलसी जी के पतिव्रत धर्म के कारण कोई पराजित नहीं कर सकता था. जब उसका अत्याचार बढ़ा, तब भगवान विष्णु ने ब्राह्मण रूप धारण कर उससे कवच दान में ले लिया और लीला के माध्यम से उसका अंत किया.
तुलसी, शालिग्राम और मोक्ष का संबंध
जब तुलसी जी को सत्य का ज्ञान हुआ, तो वे अत्यंत व्यथित हो गईं. तभी भगवान शिव प्रकट हुए और उन्हें संसार की नश्वरता का उपदेश दिया. उन्होंने वरदान दिया कि तुलसी दिव्य रूप में सदैव बैकुंठ में भगवान विष्णु के साथ निवास करेंगी, पृथ्वी पर गंडकी नदी के रूप में प्रवाहित होंगी और तुलसी वृक्ष बनकर पूजी जाएंगी.
गंडकी नदी से प्राप्त शालिग्राम को भगवान विष्णु का स्वरूप माना गया और तुलसी के बिना उनकी पूजा अधूरी मानी गई. इसी कारण तुलसी जी को विष्णु की प्रिया, पूज्य और मोक्षदायिनी कहा गया.
तुलसी जी का धार्मिक महत्व
- तुलसी जी को देवी लक्ष्मी का स्वरूप माना गया है, इसलिए उनका पूजन घर में सकारात्मक ऊर्जा और सुख-समृद्धि लाता है.
- तुलसी का स्पर्श और दर्शन मन, शरीर और आत्मा—तीनों को शुद्ध करने वाला माना गया है.
तुलसी को विष्णु की प्रिया क्यों कहा गया
- पुराणों के अनुसार तुलसी जी ने विष्णु भक्ति में स्वयं को समर्पित कर दिया, इसलिए भगवान विष्णु ने उन्हें अपनी प्रिया स्वीकार किया.
- विष्णु जी ने वरदान दिया कि उनके सभी पूजन, भोग और अनुष्ठान तुलसी के बिना पूर्ण नहीं माने जाएंगे.
बिना तुलसी शालिग्राम पूजा क्यों अधूरी
- शालिग्राम भगवान विष्णु का स्वरूप हैं और तुलसी उनकी प्रिय हैं, इसलिए दोनों का पूजन साथ-साथ अनिवार्य माना गया है.
- शास्त्रों में कहा गया है कि बिना तुलसी अर्पण किए शालिग्राम की पूजा फलदायी नहीं होती.
तुलसी पूजन से मोक्ष का मार्ग कैसे खुलता है
तुलसी पूजन से व्यक्ति के पाप कर्म नष्ट होते हैं और भक्ति भाव मजबूत होता है, जो मोक्ष का मूल आधार है.
तुलसी को विष्णु की प्रिया क्यों कहा गया?
तुलसी जी ने विष्णु भक्ति में स्वयं को समर्पित किया, इसलिए उन्हें भगवान विष्णु ने अपनी प्रिया स्वीकार किया.
बिना तुलसी शालिग्राम पूजा क्यों अधूरी?
शालिग्राम और तुलसी का पूजन साथ में आवश्यक है, वरना पूजा फलदायी नहीं होती.
