क्या आज अमावस्या पर हेयर वॉश से कम होती है सकारात्मक ऊर्जा?

Amavasya Hair Wash rule: अमावस्या के दिन बाल न धोने की परंपरा चंद्रमा, पितृ तिथि और ऊर्जा संतुलन से जुड़ी मानी जाती है। जानें ज्योतिष और धार्मिक दृष्टि से इसके पीछे का कारण।

Amavasya Hair Wash rule: आज 17 फरवरी को  फाल्गुन अमावस्या है. अमावस्या हिंदू पंचांग की वह तिथि है जब चंद्रमा पूरी तरह अदृश्य हो जाता है. इस दिन सूर्य और चंद्र एक ही राशि में स्थित होते हैं, जिससे चंद्रमा की शीतल और मानसिक ऊर्जा क्षीण मानी जाती है. ज्योतिष और धार्मिक मान्यताओं के अनुसार अमावस्या का दिन साधना, पितृ तर्पण और आत्मचिंतन के लिए विशेष होता है. इसी कारण कई घरों में अमावस्या के दिन बाल न धोने की परंपरा निभाई जाती है. आइए इसे सरल भाषा में समझते हैं.

चंद्रमा और मन का संबंध

वैदिक ज्योतिष में चंद्रमा को मन, भावनाओं और जल तत्व का कारक माना गया है. अमावस्या के दिन चंद्रमा कमजोर स्थिति में होता है, इसलिए मानसिक स्थिरता भी कुछ हद तक प्रभावित हो सकती है. बाल धोना जल तत्व से जुड़ी क्रिया है. मान्यता है कि इस दिन अधिक जल का प्रयोग करने से मन की ऊर्जा और भी कमजोर हो सकती है, जिससे चिड़चिड़ापन या उदासी बढ़ सकती है.

ऊर्जा संतुलन का विचार

हमारे शरीर में सकारात्मक और नकारात्मक ऊर्जा का संतुलन बना रहता है. अमावस्या को नकारात्मक ऊर्जा की सक्रियता अधिक मानी जाती है. पुराने ग्रंथों में उल्लेख मिलता है कि इस दिन शरीर को स्थिर और शांत रखना चाहिए. बाल धोना शरीर को ठंडक देता है और ऊर्जा स्तर में बदलाव ला सकता है, इसलिए इसे टालने की सलाह दी जाती है.

पितृ तर्पण और धार्मिक कारण

अमावस्या को पितरों को समर्पित तिथि माना जाता है. इस दिन कई लोग श्राद्ध, तर्पण या दान-पुण्य करते हैं. धार्मिक दृष्टि से यह दिन सादगी और संयम का प्रतीक है. बाल धोना या श्रृंगार करना कुछ परंपराओं में शुभ कार्य नहीं माना जाता, क्योंकि यह दिन भोग-विलास की बजाय श्रद्धा और स्मरण का होता है.

स्वास्थ्य से जुड़ी मान्यता

पुराने समय में प्राकृतिक जल स्रोतों का उपयोग होता था. अमावस्या की रात अंधेरी होती है और वातावरण में नमी अधिक हो सकती है. ऐसे में बाल धोने से सर्दी-जुकाम या सिरदर्द का खतरा बढ़ने की आशंका रहती थी. इसलिए स्वास्थ्य सुरक्षा के रूप में भी यह नियम बनाया गया हो सकता है.

आध्यात्मिक साधना का महत्व

अमावस्या ध्यान, मंत्र जाप और साधना के लिए उत्तम मानी जाती है. इस दिन मन को भीतर की ओर केंद्रित करने की सलाह दी जाती है. बाल धोना एक बाहरी क्रिया है, जबकि अमावस्या आत्ममंथन का समय है. इसलिए बाहरी सजावट की बजाय आंतरिक शुद्धि पर जोर दिया जाता है.

क्या यह नियम सभी के लिए अनिवार्य है?

ध्यान देने वाली बात यह है कि यह एक धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा है, कोई कठोर वैज्ञानिक नियम नहीं. यदि किसी को स्वास्थ्य या स्वच्छता के कारण बाल धोना आवश्यक लगे, तो वह धो सकता है. धर्म में भी स्वच्छता को महत्वपूर्ण माना गया है. इसलिए अंधविश्वास की बजाय समझदारी से निर्णय लेना चाहिए.

आधुनिक दृष्टिकोण

आज के समय में जीवनशैली बदल चुकी है. हम शुद्ध पानी, शैंपू और ड्रायर जैसी सुविधाओं का उपयोग करते हैं. ऐसे में अमावस्या पर बाल धोने से सीधे कोई हानि नहीं होती. फिर भी जो लोग परंपरा का पालन करना चाहते हैं, वे इसे श्रद्धा के रूप में निभा सकते हैं.

अमावस्या के दिन बाल न धोने की परंपरा ज्योतिष, ऊर्जा संतुलन, पितृ श्रद्धा और पुराने समय की स्वास्थ्य सावधानियों से जुड़ी है. इसका मुख्य उद्देश्य संयम, साधना और मानसिक स्थिरता बनाए रखना है. हालांकि यह कोई बाध्यकारी नियम नहीं है, बल्कि आस्था पर आधारित परंपरा है.

यदि आप धार्मिक भाव से इसे मानते हैं तो पालन करें, अन्यथा स्वच्छता और स्वास्थ्य को प्राथमिकता दें. सबसे महत्वपूर्ण है संतुलन — न अंधविश्वास, न ही परंपराओं का अपमान. समझ के साथ चलना ही सही मार्ग है.

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लेखक के बारे में

By Shaurya Punj

मैंने डिजिटल मीडिया में 15 वर्षों से अधिक का अनुभव हासिल किया है. पिछले 6 वर्षों से मैं विशेष रूप से धर्म और ज्योतिष विषयों पर सक्रिय रूप से लेखन कर रहा हूं. ये मेरे प्रमुख विषय हैं और इन्हीं पर किया गया काम मेरी पहचान बन चुका है. हस्तरेखा शास्त्र, राशियों के स्वभाव और उनके गुणों से जुड़ी सामग्री तैयार करने में मेरी निरंतर भागीदारी रही है. रांची के सेंट जेवियर्स कॉलेज से मास कम्युनिकेशन में स्नातक की डिग्री प्राप्त करने के बाद. इसके साथ साथ कंटेंट राइटिंग और मीडिया से जुड़े विभिन्न क्षेत्रों में काम करते हुए मेरी मजबूत पकड़ बनी. इसके अलावा, एंटरटेनमेंट, लाइफस्टाइल और शिक्षा जैसे विषयों पर भी मैंने गहराई से लेखन किया है, जिससे मेरी लेखन शैली संतुलित, भरोसेमंद और पाठक-केंद्रित बनी है.

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