Sawan Pradosh Vrat: आज 25 अगस्त 2026, मंगलवार को सावन मास का अंतिम प्रदोष व्रत रखा जा रहा है. मंगलवार के दिन पड़ने के कारण इसे भौम प्रदोष व्रत कहा जाता है. इस दिन भक्त भगवान शिव की आराधना करते हैं और व्रत रखते हैं. धार्मिक मान्यता है कि प्रदोष व्रत रखने से जीवन के दोषों का नाश होता है, मंगल दोष के अशुभ प्रभाव कम हो सकते हैं और जीवन में सुख-समृद्धि आती है.
प्रदोष व्रत की पूजा विधि
- पूजा के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें, स्वच्छ वस्त्र धारण करें और व्रत का संकल्प लें. इसके बाद घर में नियमित पूजा करें.
- दिनभर मन को शांत रखें, फलाहार करें और भगवान शिव का स्मरण करें.
- शाम को सूर्यास्त के समय प्रदोष काल में स्नान कर पूजा की तैयारी करें.
- इसके बाद शिवलिंग पर गंगाजल, दूध, दही, शहद और घी से अभिषेक करें. अंत में शुद्ध जल अर्पित करें.
- भगवान शिव को चंदन, अक्षत, बेलपत्र, धतूरा, आक के फूल और शमी पत्र अर्पित करें. माता पार्वती को लाल चुनरी और श्रृंगार सामग्री चढ़ाएं.
- इसके बाद भगवान शिव को फल और मिठाई का भोग लगाएं.
- महादेव के मंत्रों का जाप करें तथा प्रदोष व्रत कथा और शिव चालीसा का पाठ करें.
- अंत में दीपक जलाकर भगवान शिव और माता पार्वती की आरती करें.
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भगवान शिव के मंत्र
- ॐ नमः शिवाय.
- ॐ नमः शिवाय शुभं शुभं कुरु कुरु शिवाय नमः ॐ.
- ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्. उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्॥
भगवान शिव की आरती
ॐ जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा. ब्रह्मा, विष्णु, सदाशिव, अर्द्धांगी धारा॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥
एकानन, चतुरानन, पंचानन राजे. हंसासन, गरुड़ासन, वृषवाहन साजे॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥
दो भुज, चार चतुर्भुज, दस भुज अति सोहे. त्रिगुण रूप निरखते, त्रिभुवन जन मोहे॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥
अक्षमाला, वनमाला, मुण्डमाला धारी. त्रिपुरारी, कंसारी, कर माला धारी॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥
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श्वेताम्बर, पीताम्बर, बाघम्बर अंगे. सनकादिक, गरुणादिक, भूतादिक संगे॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥
कर के मध्य कमण्डलु, चक्र त्रिशूलधारी. सुखकारी, दुखहारी, जगपालनकारी॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥
ब्रह्मा, विष्णु, सदाशिव, जानत अविवेका. मधु-कैटभ दोउ मारे, सुर भयहीन करे॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥
लक्ष्मी व सावित्री, पार्वती संगा. पार्वती अर्द्धांगी, शिवलहरी गंगा॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥
पर्वत सोहैं पार्वती, शंकर कैलासा. भांग-धतूर का भोजन, भस्मी में वासा॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥
जटा में गंग बहत है, गल मुण्डन माला. शेष नाग लिपटावत, ओढ़त मृगछाला॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥
काशी में विराजे विश्वनाथ, नन्दी ब्रह्मचारी. नित उठ दर्शन पावत, महिमा अति भारी॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥
त्रिगुणस्वामी जी की आरती, जो कोई नर गावे. कहत शिवानंद स्वामी, मनवांछित फल पावे॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥
भगवान शिव चालीसा
॥ दोहा ॥
जय गणेश गिरिजा सुवन, मंगल मूल सुजान. कहत अयोध्यादास तुम, देहु अभय वरदान॥
जय गिरिजापति दीनदयाला. सदा करत सन्तन प्रतिपाला॥
भाल चन्द्रमा सोहत नीके. कानन कुण्डल नागफनी के॥
अंग गौर शिर गंग बहाए. मुण्डमाल तन क्षार लगाए॥
वस्त्र खाल बाघम्बर सोहे. छवि को देखि नाग मन मोहे॥
मैना मातु की हवे दुलारी. बाम अंग सोहत छवि न्यारी॥
कर त्रिशूल सोहत छवि भारी. करत सदा शत्रुन क्षयकारी॥
नन्दि गणेश सोहैं तहँ कैसे. सागर मध्य कमल हैं जैसे॥
कार्तिक श्याम और गणराऊ. या छवि को कहि जात न काऊ॥
देवन जबहीं जाय पुकारा. तब ही दुख प्रभु आप निवारा॥
किया उपद्रव तारक भारी. देवन सब मिलि तुमहिं जुहारी॥
तुरत षडानन आप पठायउ. लवनिमेष महँ मारि गिरायउ॥
आप जलंधर असुर संहारा. सुयश तुम्हार विदित संसारा॥
त्रिपुरासुर सन युद्ध मचाई. सबहिं कृपा कर लीन बचाई॥
किया तपहिं भागीरथ भारी. पुरब प्रतिज्ञा तासु पुरारी॥
दानिन महँ तुम सम कोउ नाहीं. सेवक स्तुति करत सदाहीं॥
वेद माहि महिमा तुम गाई. अकथ अनादि भेद नहिं पाई॥
प्रकटी उदधि मंथन में ज्वाला. जरत सुरासुर भए विहाला॥
कीन्ही दया तहं करी सहाई. नीलकण्ठ तब नाम कहाई॥
पूजन रामचन्द्र जब कीन्हा. जीत के लंक विभीषण दीन्हा॥
सहस कमल में हो रहे धारी. कीन्ह परीक्षा तबहिं पुरारी॥
एक कमल प्रभु राखेउ जोई. कमल नयन पूजन चहं सोई॥
कठिन भक्ति देखी प्रभु शंकर. भए प्रसन्न दिए इच्छित वर॥
जय जय जय अनन्त अविनाशी. करत कृपा सब के घटवासी॥
दुष्ट सकल नित मोहि सतावै. भ्रमत रहौं मोहि चैन न आवै॥
त्राहि त्राहि मैं नाथ पुकारो. येहि अवसर मोहि आन उबारो॥
लै त्रिशूल शत्रुन को मारो. संकट ते मोहि आन उबारो॥
मात-पिता भ्राता सब होई. संकट में पूछत नहिं कोई॥
स्वामी एक है आस तुम्हारी. आय हरहु मम संकट भारी॥
धन निर्धन को देत सदा हीं. जो कोई जांचे सो फल पाहीं॥
अस्तुति केहि विधि करैं तुम्हारी. क्षमहु नाथ अब चूक हमारी॥
शंकर हो संकट के नाशन. मंगल कारण विघ्न विनाशन॥
योगी यति मुनि ध्यान लगावैं. शारद नारद शीश नवावैं॥
नमो नमो जय नमः शिवाय. सुर ब्रह्मादिक पार न पाय॥
जो यह पाठ करे मन लाई. ता पर होत है शम्भु सहाई॥
ऋणिया जो कोई हो अधिकारी. पाठ करे सो पावन हारी॥
पुत्र होन कर इच्छा जोई. निश्चय शिव प्रसाद तेहि होई॥
पण्डित त्रयोदशी को लावे. ध्यानपूर्वक होम करावे॥
त्रयोदशी व्रत करै हमेशा. ताके तन नहीं रहै कलेशा॥
धूप दीप नैवेद्य चढ़ावे. शंकर सम्मुख पाठ सुनावे॥
जन्म जन्म के पाप नसावे. अन्त धाम शिवपुर में पावे॥
कहैं अयोध्यादास आस तुम्हारी. जानि सकल दुःख हरहु हमारी॥
॥ दोहा ॥
नित्य नेम उठि प्रातः ही, पाठ करो चालीसा. तुम मेरी मनोकामना, पूर्ण करो जगदीश॥
मगसिर छठि हेमन्त ऋतु, संवत चौसठ जान. स्तुति चालीसा शिवहि, पूर्ण कीन कल्याण॥
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