Pithori Amavasya 2026 Maa Tara Story: आज यानी 10 सितंबर 2026 को पिठोरी अमावस्या मनाई जा रही है. धार्मिक मान्यता में यह अमावस्या मातृशक्ति और संतान के कल्याण से जुड़ी मानी जाती है. इस दिन 64 योगिनियों और देवी स्वरूपों की पूजा की परंपरा है. पिठोरी व्रत की कथा में भी मातृशक्ति को संतान की रक्षा और जीवन देने वाली शक्ति के रूप में देखा गया है.
इसी मातृशक्ति का एक बेहद गहरा और रहस्यमयी रूप पश्चिम बंगाल के बीरभूम स्थित तारापीठ में मां तारा के रूप में दिखाई देता है. तारापीठ की मान्यता में तारापीठ की परंपरा में मां तारा को उग्र शक्ति के साथ करुणामयी मातृरूप में भी पूजा जाता.
समुद्र मंथन से जुड़ी है मां तारा की यह कथा
ज्योतिषाचार्य डॉ एन के बेरा ने बताया कि इस कथा का उल्लेख शक्ति महाभागवत और कुछ शाक्त/तांत्रिक ग्रंथों में मिलता है. देवताओं और असुरों ने अमृत प्राप्त करने के लिए क्षीरसागर का मंथन किया. लेकिन अमृत से पहले भयंकर हलाहल विष निकला. विष के प्रभाव से तीनों लोकों पर संकट मंडराने लगा. तब भगवान शिव ने सृष्टि की रक्षा के लिए उस विष को अपने कंठ में धारण कर लिया. इसी कारण उन्हें नीलकंठ कहा गया.
यह प्रसंग श्रीमद्भागवत महापुराण के अष्टम स्कंध में वर्णित समुद्र मंथन की कथा से जुड़ा है. वहां शिव के विषपान को लोककल्याण और त्याग के रूप में प्रस्तुत किया गया है.
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लेकिन शाक्त और तांत्रिक परंपरा में इसी प्रसंग का एक अत्यंत भावुक रूप सामने आता है. मान्यता है कि हलाहल के प्रभाव से जब शिव अचेत होने लगे, तब आदिशक्ति मां तारा प्रकट हुईं. उन्होंने शिव को अपने बालक की तरह गोद में लिया और उन्हें स्तनपान कराया. मां के दूध के प्रभाव से शिव को चेतना मिली और विष का प्रभाव शांत हुआ. मां तारा के इसी वात्सल्य स्वरूप को तारापीठ की साधना परंपरा में विशेष महत्व प्राप्त है.
पिठोरी अमावस्या से क्या है इसका संबंध?
यहीं से आज की पिठोरी अमावस्या का अर्थ और भी गहरा हो जाता है. पिठोरी व्रत की परंपरा में मां और संतान के संबंध को केंद्र में रखा गया है, जबकि मां तारा की कथा में स्वयं महादेव को भी देवी ने संतान के समान अपनाया. यानी दोनों परंपराओं के केंद्र में एक ही भाव दिखाई देता है—मां की ममता, रक्षा और जीवन देने वाली शक्ति. पिठोरी अमावस्या की कथा में 64 योगिनियों की पूजा और संतान की मंगलकामना का उल्लेख मिलता है. परंपरा के अनुसार देवी की कृपा से संतान के कष्ट दूर होने और परिवार में सुख आने की कामना की जाती है. इस दृष्टि से देखें तो मां तारा का संदेश भी यही है कि देवी का मातृरूप केवल मनुष्य की संतान तक सीमित नहीं है, वह स्वयं शिव जैसे देवता को भी अपनी गोद में स्थान देता है.
आज तारापीठ में अमावस्या का विशेष महत्व
आज की अमावस्या का एक और विशेष पहलू है. भाद्रपद अमावस्या के इसी समय तारापीठ में कौलिक और तांत्रिक परंपराओं से जुड़ी मां तारा की साधना का विशेष महत्व माना जाता है. आज 10 सितंबर को तारापीठ में अमावस्या के अवसर पर विशेष पूजा और साधना का आयोजन हो रहा है. इसलिए आज की अमावस्या को केवल एक तिथि के रूप में नहीं, बल्कि मातृशक्ति, करुणा और संरक्षण के प्रतीक दिवस के रूप में भी देखा जा सकता है. पिठोरी अमावस्या पर मां का स्मरण करते हुए मां तारा की यह कथा हमें याद दिलाती है कि शक्ति का सबसे सुंदर रूप वही है, जिसमें उग्रता के पीछे करुणा और सामर्थ्य के पीछे ममता छिपी हो.
