मासिक दुर्गाष्टमी आज, मां दुर्गा की आराधना से दूर होंगे संकट, जानें पूजा विधि, मंत्र और आरती-चालीसा के बोल

Masik Durgashtami 2026: आज सावन मास की दुर्गाष्टमी के अवसर पर भक्त मां दुर्गा की आराधना और व्रत रखते हैं. धार्मिक मान्यता के अनुसार, विधिपूर्वक पूजा करने से नकारात्मकता दूर होती है और जीवन में सुख-शांति बनी रहती है. जानें पूजा विधि, मंत्र, आरती और दुर्गा चालीसा के बोल.

Masik Durgashtami 2026: हिंदू पंचांग के अनुसार, प्रत्येक महीने के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को मासिक दुर्गाष्टमी का पर्व मनाया जाता है. इस तरह साल में कुल 12 मासिक दुर्गाष्टमी आती हैं. वर्ष 2026 में श्रावण मास की मासिक दुर्गाष्टमी 20 अगस्त, गुरुवार को मनाई जा रही है. मान्यता है कि इस दिन मां दुर्गा की सच्चे मन से पूजा-अर्चना करने से साधक के जीवन के भय और संकट दूर होते हैं. साथ ही, घर में सुख-समृद्धि का वास होता है.

मासिक दुर्गाष्टमी पूजा विधि

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  • पूजा के दिन सुबह जल्दी स्नान करने के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण करें और व्रत का संकल्प लें.
  • पूजा स्थान की साफ-सफाई करके मां दुर्गा की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें.
  • मां दुर्गा के समक्ष घी का दीपक जलाएं. दीपक में लौंग डालना शुभ माना जाता है.
  • माता को रोली, अक्षत, लाल चुनरी, सिंदूर और लाल पुष्प अर्पित करें.
  • मां दुर्गा को फल, हलवा या अपनी श्रद्धानुसार अन्य सात्विक भोग अर्पित करें.
  • इसके बाद मां दुर्गा के मंत्रों का जाप करें और दुर्गा चालीसा का पाठ करें.
  • अंत में धूप-दीप से मां दुर्गा की आरती करें और पूजा में हुई भूल-चूक के लिए क्षमा प्रार्थना करें.

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मां दुर्गा के मंत्र

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या देवी सर्वभूतेषु लक्ष्मी-रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

देहि सौभाग्यं आरोग्यं देहि मे परमं सुखम्। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥

या देवी सर्वभूतेषु विद्या-रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

पत्नीं मनोरमां देहि मनोवृत्तानुसारिणीम्। तारिणीं दुर्गसंसारसागरस्य कुलोद्भवाम्॥

मां दुर्गा की आरती

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ॐ जय अम्बे गौरी…

जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी। तुमको निशदिन ध्यावत, हरि ब्रह्मा शिवरी॥ ॐ जय अम्बे गौरी॥

मांग सिंदूर विराजत, टीको मृगमद को। उज्ज्वल से दोउ नैना, चंद्रवदन नीको॥ ॐ जय अम्बे गौरी॥

कनक समान कलेवर, रक्ताम्बर राजै। रक्तपुष्प गल माला, कंठन पर साजै॥ ॐ जय अम्बे गौरी॥

केहरि वाहन राजत, खड्ग खप्पर धारी। सुर-नर-मुनिजन सेवत, तिनके दुखहारी॥ ॐ जय अम्बे गौरी॥

कानन कुण्डल शोभित, नासाग्रे मोती। कोटिक चंद्र दिवाकर, सम राजत ज्योति॥ ॐ जय अम्बे गौरी॥

शुंभ-निशुंभ बिदारे, महिषासुर घाती। धूम्र विलोचन नैना, निशदिन मदमाती॥ ॐ जय अम्बे गौरी॥

चंड-मुंड संहारे, शोणितबीज हरे। मधु-कैटभ दोउ मारे, सुर भयहीन करे॥ ॐ जय अम्बे गौरी॥

ब्रह्माणी, रुद्राणी, तुम कमला रानी। आगम निगम बखानी, तुम शिव पटरानी॥ ॐ जय अम्बे गौरी॥

चौंसठ योगिनी मंगल गावत, नृत्य करत भैरों। बाजत ताल-मृदंगा, अरु बाजत डमरू॥ ॐ जय अम्बे गौरी॥

तुम ही जग की माता, तुम ही हो भरता। भक्तन की दुख हरता, सुख-संपत्ति करता॥ ॐ जय अम्बे गौरी॥

भुजा चार अति शोभित, खड्ग खप्पर धारी। मनवांछित फल पावत, सेवत नर-नारी॥ ॐ जय अम्बे गौरी॥

कंचन थाल विराजत, अगर कपूर बाती। श्रीमालकेतु में राजत, कोटि रतन ज्योति॥ ॐ जय अम्बे गौरी॥

श्री अम्बेजी की आरती, जो कोई नर गावे। कहत शिवानंद स्वामी, सुख-संपत्ति पावे॥ ॐ जय अम्बे गौरी॥

जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी॥

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दुर्गा चालीसा

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नमो नमो दुर्गे सुख करनी। नमो नमो दुर्गे दुःख हरनी॥ निरंकार है ज्योति तुम्हारी। तिहूं लोक फैली उजियारी॥

शशि ललाट मुख महाविशाला। नेत्र लाल भृकुटि विकराला॥ रूप मातु को अधिक सुहावे। दरश करत जन अति सुख पावे॥

तुम संसार शक्ति लै कीना। पालन हेतु अन्न धन दीना॥ अन्नपूर्णा हुई जग पाला। तुम ही आदि सुंदरी बाला॥

प्रलयकाल सब नाशन हारी। तुम गौरी शिवशंकर प्यारी॥ शिव योगी तुम्हरे गुण गावें। ब्रह्मा विष्णु तुम्हें नित ध्यावें॥

रूप सरस्वती को तुम धारा। दे सुबुद्धि ऋषि-मुनिन उबारा॥ धरयो रूप नरसिंह को अम्बा। प्रगट भई फाड़कर खंभा॥

रक्षा करि प्रह्लाद बचायो। हिरण्याक्ष को स्वर्ग पठायो॥ लक्ष्मी रूप धरो जग माहीं। श्री नारायण अंग समाहीं॥

क्षीरसिंधु में करत विलासा। दयासिंधु दीजै मन आसा॥ हिंगलाज में तुम्हीं भवानी। महिमा अमित न जात बखानी॥

मातंगी अरु धूमावती माता। भुवनेश्वरी बगला सुखदाता॥ श्री भैरवी तारा जगतारिणी। छिन्नमस्ता भव-दुःख निवारिणी॥

केहरि वाहन सोह भवानी। लांगुर वीर चलत अगवानी॥ कर में खप्पर खड्ग विराजै। जाको देख काल डर भाजै॥

सोहै अस्त्र और त्रिशूला। जाते उठत शत्रु हिय शूला॥ नगरकोट में तुम्हीं विराजत। तिहुंलोक में डंका बाजत॥

शुंभ-निशुंभ दानव तुम मारे। रक्तबीज शंखन संहारे॥ महिषासुर नृप अति अभिमानी। जेहि अघ भार मही अकुलानी॥

रूप कराल कालिका धारा। सेन सहित तुम तिहि संहारा॥ परी गाढ़ संतन पर जब-जब। भई सहाय मातु तुम तब-तब॥

अमरपुरी अरु बासव लोका। तब महिमा सब रहें अशोका॥ ज्वाला में है ज्योति तुम्हारी। तुम्हें सदा पूजें नर-नारी॥

प्रेम भक्ति से जो यश गावें। दुःख दारिद्र निकट नहिं आवें॥ ध्यावे तुम्हें जो नर मन लाई। जन्म-मरण ताकौ छुटि जाई॥

जोगी सुर-मुनि कहत पुकारी। योग न हो बिन शक्ति तुम्हारी॥ शंकर आचारज तप कीनो। काम अरु क्रोध जीति सब लीनो॥

निशिदिन ध्यान धरो शंकर को। काहु काल नहिं सुमिरो तुमको॥ शक्ति रूप का मरम न पायो। शक्ति गई तब मन पछितायो॥

शरणागत हुई कीर्ति बखानी। जय जय जय जगदंब भवानी॥ भई प्रसन्न आदि जगदंबा। दई शक्ति नहिं कीन विलंबा॥

मोको मातु कष्ट अति घेरो। तुम बिन कौन हरै दुःख मेरो॥ आशा तृष्णा निपट सतावें। रिपु-मूर्ख मोहि डरपावें॥

शत्रु नाश कीजै महारानी। सुमिरौं इकचित तुम्हें भवानी॥ करो कृपा हे मातु दयाला। ऋद्धि-सिद्धि दै करहु निहाला॥

जब लगि जिऊं दया फल पाऊं। तुम्हरो यश मैं सदा सुनाऊं॥ दुर्गा चालीसा जो कोई गावै। सब सुख भोग परमपद पावै॥

देवीदास शरण निज जानी। करहु कृपा जगदंब भवानी॥

॥ इति श्री दुर्गा चालीसा सम्पूर्ण ॥

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लेखक के बारे में

By नेहा कुमारी

नेहा कुमारी वर्तमान में प्रभात खबर डिजिटल में धर्म बीट पर कंटेंट राइटर के रूप में कार्यरत हैं. वह व्रत-त्योहार, राशिफल, पंचांग, ज्योतिष, शुभ मुहूर्त, पौराणिक कथाओं और भारतीय संस्कृति से जुड़े विषयों पर लेख लिखती हैं. उन्होंने वेस्ट बंगाल स्टेट यूनिवर्सिटी से मास्टर ऑफ जर्नलिज्म एंड मास कम्युनिकेशन की डिग्री प्राप्त की है.

डिजिटल पत्रकारिता में उन्होंने धर्म, ज्योतिष और भारतीय परंपराओं से जुड़े विषयों पर विशेष अनुभव हासिल किया है. उनका उद्देश्य पाठकों तक सरल भाषा में सटीक, विश्वसनीय और उपयोगी जानकारी पहुंचाना है, ताकि वे धार्मिक और सांस्कृतिक विषयों को आसानी से समझ सकें.

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