डॉ. राकेश कुमार सिन्हा
Mahashivratri 2026: साल भर भगवान शिव के भक्त पूजा-अर्चना और साधना में लगे रहते हैं, लेकिन कुछ विशेष अवसरों का महत्व अन्य दिनों से अधिक होता है. इनमें महाशिवरात्रि सर्वोपरि है. यह दिन शिव शंकर की कृपा प्राप्त करने और पुण्य अर्जित करने के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है. इसी दिन द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से प्रसिद्ध श्री बैद्यनाथ जी की प्रादुर्भाव तिथि का विशेष महत्व है. पूरे भारतवर्ष में शिव भक्त इस दिन विशेष भक्ति और श्रद्धा के साथ यहां पहुंचते हैं.
श्री बैद्यनाथ का नाम
श्री बैद्यनाथ को केवल ‘बैद्यनाथ’ के नाम से ही नहीं, बल्कि रावणेश्वर महादेव, कामना लिंग, कामलिंग, श्री बैजनाथ, श्री बैजूनाथ, चिताभूमि आदि कई नामों से जाना जाता है. यह झारखंड राज्य की तीर्थ नगरी देवघर में स्थित हैं. इनके बारे में कई पौराणिक ग्रंथों जैसे शिव महापुराण (कोटिरुद्र संहिता), पद्म पुराण, ब्रह्म पुराण, अध्यात्म रामायण, तीर्थ दीपिका आदि में विशेष उल्लेख मिलता है.
द्वादश ज्योतिर्लिंग की उत्पत्ति की कथा
कथा के अनुसार, भगवान शिव ने एक बार ब्राह्मण का वेश धारण कर पृथ्वी पर भिक्षाटन किया. उनकी मोहक रूप-रेखा से कई ऋषि पत्नियां मोहित हो गईं. यह देखकर क्रोधित ऋषियों ने उन्हें श्राप दिया कि उनका लिंग कटकर गिर जाएगा और उनकी कामना पूर्ण नहीं होगी. श्राप के अनुसार भगवान शिव का लिंग कट गया और यह धरती, पाताल और आकाश तक फैल गया.
जब स्थिति गंभीर हुई, तब भगवान विष्णु की सहायता से इसे 12 भागों में विभाजित किया गया, जिन्हें द्वादश ज्योतिर्लिंग कहा गया. इन 12 में से नौवें स्थान पर श्री बैद्यनाथ जी विराजमान हैं. इन्हें “सर्व कामप्रदायक” और “भवरोगहर” के नाम से भी जाना जाता है.
देवघर में दर्शन की अनूठी परंपरा
श्री बैद्यनाथ के दर्शन यहां विशेष तरीके से होते हैं. गंगा जी के बीच स्थित श्री अजगैबीनाथ का दर्शन पहले, फिर बैद्यनाथ जी और उसके बाद श्री बासुकीनाथ के दर्शन का विधान है. यही परंपरा भक्तों को पवित्र अनुभव कराती है. साल भर यहाँ देश-विदेश से भक्त आते हैं, लेकिन महाशिवरात्रि पर यहां विशाल महा-मेला लगता है. भक्तों की भीड़, मंदिर की भव्यता और श्रद्धा का माहौल अद्भुत होता है.
रावण और भक्त बैजू की कथा
कथा के अनुसार, रावण भगवान शिव को लंका ले जाना चाहता था. लेकिन भगवान शिव की स्थायी कृपा और शक्ति के आगे किसी की योजना सफल नहीं हो सकी. वे घनघोर अरण्य खण्ड के हरितिकी वन में स्थायी रूप से विराजमान हो गए. बाद में भक्त बैजू ने उनका उद्धार किया और उन्हें पुनः प्रतिष्ठित किया. मंदिर का निर्माण प्राचीन काल में श्री विश्वकर्मा ने किया था. बाद में 1595-96 ईस्वी में गिद्धौर नरेश पूरणमल चंदेल ने इसे विशाल और सुंदर रूप दिया. इस मंदिर में बंग शैली का झलक दिखाई देती है.
शिव और शक्ति की अनोखी संगति
देवघर के मंदिर परिसर में केवल द्वादश ज्योतिर्लिंग ही नहीं, बल्कि 51 शक्ति पीठों में से एक भगवती जय दुर्गा का स्थान भी है. यही कारण है कि यहां शिव और पार्वती की संयुक्त पूजा होती है. मंदिरों के शिखरों की माला को भी प्रतीक स्वरूप आपस में जोड़ा गया है. आज भी यहां लगभग दो दर्जन मंदिर परिसर में मौजूद हैं, जिनकी अधिकांश मूर्तियां उत्तर गुप्त काल से लेकर पालकालीन युग का प्रतिनिधित्व करती हैं.
भारत में अन्य श्री बैद्यनाथ मंदिर
भारत में श्री बैद्यनाथ केवल देवघर में ही नहीं, बल्कि कई अन्य जगहों पर भी प्रसिद्ध हैं. इनमें महाराष्ट्र के नांदेड के निकट परली, गुजरात के कलोल के वासन, ओड़िशा के भुवनेश्वर के कपिला तीर्थ, मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले के गरौनली, बिहार के रामगढ़, हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा, उज्जैन, गयाजी, अल्मोड़ा, कोलकाता, शिवपुरी, वर्धमान, मलूटी, रामेश्वरम, हरिद्वार, वाराणसी और मऊ शामिल हैं. धर्मज्ञों का कहना है कि श्री बैद्यनाथ का नाम ही फलदायक और पुण्यप्रद है. यही कारण है कि उनकी उपस्थिति पूरे भारतवर्ष में महसूस की जाती है.
महाशिवरात्रि और श्री बैद्यनाथ का संबंध
विशेषज्ञ पंडित विश्वेश्वर मिश्र बताते हैं कि महाशिवरात्रि और श्री बैद्यनाथ का संबंध प्राचीन काल से है. यही कारण है कि संपूर्ण भारतवर्ष में देवघर की महाशिवरात्रि सबसे प्रसिद्ध है. कहते हैं कि शिवलिंग तो असंख्य हैं, लेकिन द्वादश ज्योतिर्लिंग में श्री बैद्यनाथ भक्तों के लिए कृपा और पुण्य का स्रोत हैं. उनका सबसे विशेष दिवस है महाशिवरात्रि, जब यहां भक्ति, श्रद्धा और आस्था का अद्भुत संगम देखने को मिलता है.
