Kalashtami Vrat Katha: आज कालाष्टमी पर क्यों खास है कालभैरव पूजा? जानें पूरी व्रत कथा

Kalashtami Vrat Katha: आज 10 जनवरी 2026 को साल की पहली कालाष्टमी मनाई जा रही है. यह दिन भगवान कालभैरव की विशेष पूजा के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है. कालाष्टमी पर व्रत कथा सुनने से भय, बाधा और नकारात्मक शक्तियों का प्रभाव कम होता है.

By Shaurya Punj | January 10, 2026 7:55 AM

Kalashtami Vrat Katha: कालाष्टमी भगवान शिव के उग्र स्वरूप श्री कालभैरव को समर्पित अत्यंत प्रभावशाली व्रत माना जाता है. यह व्रत प्रत्येक माह कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को रखा जाता है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, कालाष्टमी के दिन विधि-विधान से पूजा करने से भय, रोग, शत्रु बाधा और नकारात्मक शक्तियों का प्रभाव समाप्त होता है.

आज यानी 10 जनवरी 2026, शनिवार को साल 2026 की पहली कालाष्टमी मनाई जा रही है. इस शुभ अवसर पर भगवान कालभैरव की पूजा करने से विशेष फल की प्राप्ति होती है. आइए जानते हैं कालाष्टमी का शुभ मुहूर्त और इससे जुड़ी पौराणिक व्रत कथा.

2026 की पहली कालाष्टमी का शुभ मुहूर्त

पंचांग के अनुसार, माघ मास कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि की शुरुआत 10 जनवरी 2026, शनिवार सुबह 8:23 बजे से होगी और इसका समापन 11 जनवरी 2026, रविवार सुबह 10:20 बजे पर होगा.

निशिता काल में की जाती है पूजा

कालाष्टमी की पूजा विशेष रूप से निशिता काल में की जाती है और इसमें उदया तिथि का नियम लागू नहीं होता. इसी कारण वर्ष 2026 की पहली कालाष्टमी 10 जनवरी को ही मनाई जाएगी. इस दिन व्रत, पूजन और कालभैरव नाम जप करना अत्यंत शुभ माना गया है.

कालाष्टमी की पौराणिक व्रत कथा

पौराणिक कथाओं के अनुसार, एक बार ब्रह्मा, विष्णु और महेश के बीच श्रेष्ठता को लेकर विवाद उत्पन्न हो गया. यह विवाद इतना बढ़ गया कि सभी देवताओं की एक सभा बुलाई गई, जिसमें यह प्रश्न रखा गया कि इन तीनों में सबसे श्रेष्ठ कौन है. सभा में देवताओं ने अपने-अपने मत प्रकट किए. भगवान विष्णु और भगवान शिव ने सभी के विचारों को शांत भाव से सुना, लेकिन ब्रह्मा जी क्रोध में आ गए और उन्होंने भगवान शिव के प्रति अपमानजनक शब्द कह दिए. यह सुनकर भगवान शिव अत्यंत क्रोधित हो उठे.

शिवजी के इसी क्रोध से एक उग्र स्वरूप प्रकट हुआ—भगवान भैरव. इस रुद्र रूप को देखकर सभा में उपस्थित सभी देवता भयभीत हो गए. भगवान भैरव के हाथ में दंड था और उनका वाहन काला कुत्ता था. उन्हें दंडाधिकारी और महाकालेश्वर का स्वरूप भी कहा जाता है. क्रोधावेश में भगवान भैरव ने ब्रह्मा जी के पांच मुखों में से एक मुख को काट दिया. इसी कारण आज ब्रह्मा जी को चार मुखों वाला माना जाता है. लेकिन ब्रह्मा का सिर काटने के कारण भगवान भैरव पर ब्रह्महत्या का पाप लग गया.

काशी में मिला ब्रह्महत्या से मुक्ति का वरदान

जब भगवान शिव को यह ज्ञात हुआ, तो उन्होंने भैरव को ब्रह्महत्या के पाप से मुक्ति पाने के लिए पृथ्वी लोक पर प्रायश्चित करने का मार्ग बताया. भगवान भैरव कई वर्षों तक तपस्या और पश्चाताप करते हुए पृथ्वी पर भ्रमण करते रहे. अंततः उनकी यह यात्रा काशी में पूर्ण हुई. भगवान शिव की नगरी काशी में, बाबा विश्वनाथ के आशीर्वाद से भगवान भैरव को ब्रह्महत्या के पाप से मुक्ति मिली. तभी से भगवान कालभैरव को काशी का कोतवाल कहा जाता है. दंड लेकर धर्म की रक्षा करने के कारण उनका एक नाम ‘दंडपाणी’ भी प्रसिद्ध हुआ. माना जाता है कि आज भी काशी में बिना कालभैरव की अनुमति के कोई भी कार्य पूर्ण नहीं होता.

कालाष्टमी व्रत का महत्व

मान्यता है कि कालाष्टमी के दिन भगवान कालभैरव की कथा सुनने और पूजा करने से—

  • भय और नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है
  • शत्रु बाधाएं समाप्त होती हैं
  • अकाल मृत्यु और दुर्घटना का भय कम होता है
  • जीवन में साहस, सुरक्षा और स्थिरता आती है

तो यह थी कालाष्टमी से जुड़ी पावन व्रत कथा. हम आशा करते हैं कि यह कथा आपके मन में भक्ति और श्रद्धा का भाव जागृत करेगी. ऐसे ही व्रत-त्योहार, पूजा विधि और धार्मिक कथाओं से जुड़ी संपूर्ण जानकारी के लिए श्री मंदिर ऐप से जुड़ें और ईश्वर की भक्ति में सहभागी बनें.

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Disclaimer: यहां दी गई जानकारी धार्मिक ग्रंथों, पंचांग और मान्यताओं पर आधारित है. इसका उद्देश्य केवल सामान्य जानकारी देना है. किसी भी ज्योतिषीय उपाय को अपनाने से पहले विशेषज्ञ की सलाह अवश्य लें.

कालाष्टमी 2026 में कब मनाई जा रही है?

साल 2026 की पहली कालाष्टमी 10 जनवरी, शनिवार को मनाई जा रही है.

कालाष्टमी की पूजा किस समय करनी चाहिए?

कालाष्टमी की पूजा निशिता काल में करना सबसे अधिक फलदायी माना जाता है.

भगवान कालभैरव को काशी का कोतवाल क्यों कहा जाता है?

ब्रह्महत्या से मुक्ति के बाद भगवान कालभैरव काशी के रक्षक और कोतवाल बने.