Gita Gyan: श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को जीवन को खुशहाल और सफल बनाने के लिए कई सूत्र बताए हैं. गीता के अध्याय दो में वर्णित कुछ श्लोकों में स्थिर बुद्धि वाले इंसान के लक्षणों को विस्तार से बताया गया है. गीता के 5 ज्ञानवर्धक श्लोकों के जरिए जानते हैं कि आखिर बुद्धि को स्थिर करने के लिए व्यक्ति को क्या करना चाहिए.
कामनाओं को मन पर हावी न होने देना चाहिए
प्रजहाति यदा कामान्सर्वान्पार्थ मनोगतान् ।
आत्मन्येवात्मना तुष्ट: स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते ॥
अध्याय-2, श्लोक-55
भावार्थ: भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि जब इंसान मन की सभी कामनाओं को पूरी तरह से अलग कर देता है. साथ ही, जब वह अपने आत्मज्ञान से संतुष्ट रहता है, तो उस स्थिति में वह स्थितप्रज्ञ कहा जाता है.
आसक्ति, भय और क्रोध से दूर रहने वाले होते हैं स्थिर बुद्धि
दु:खेष्वनुद्विग्नमना: सुखेषु विगतस्पृह:।
वीतरागभयक्रोध: स्थितधीर्मुनिरुच्यते ।।
अध्याय-2, श्लोक-56
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भावार्थ: श्रीकृष्ण अर्जुन को समझाते हुए कहते हैं कि जिस मनुष्य का मन दुःख मिलने पर भी विचलित नहीं होता. इसके अलावा, जो इंसान किसी चीज की लालसा नहीं रखता और जिसके भीतर से आसक्ति, क्रोध और भय खत्म हो गए हैं, ऐसा इंसान स्थिर बुद्धि वाला कहा जाता है, क्योंकि उसकी बुद्धि स्थिर रहती है.
सुख-दुःख में न घबराने वाले की बुद्धि रहती है स्थिर
यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम्।
नाभिनन्दति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता।।
अध्याय-2, श्लोक-57
भावार्थ: जो मनुष्य हर प्रकार की कामनाओं से दूर रहता है, जो शुभ फल की प्राप्ति पर हर्षित नहीं होता और जो विपत्ति आने पर घबराता नहीं, उसकी बुद्धि स्थिर होती है. गीता के इस श्लोक में स्थिर बुद्धि वाले इंसान के लक्षण बताए गए हैं.
कछुए की तरह इंद्रियों पर रखना चाहिए नियंत्रण
यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गानीव सर्वश:।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ।।
अध्याय-2, श्लोक-58
भावार्थ: भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि कछुआ जिस प्रकार हर तरफ से अपने अंगों को समेट लेता है, वैसे ही मनुष्य को इंद्रियों पर नियंत्रण रखते हुए हर प्रकार के भोग की वस्तुओं से मन को हटा लेना चाहिए. ऐसा करने वाला मनुष्य स्थिर बुद्धि वाला होता है.
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लालसा खत्म करने के लिए क्या करना चाहिए
विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिन:।
रसवर्जं रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते ।।
अध्याय-2, श्लोक-59
भावार्थ: श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि इंसान इंद्रियों के विषय-भोग से खुद को कितना भी दूर क्यों न कर ले, लेकिन विषयों को भोगने की इच्छा बनी रहती है. फिर, जो मनुष्य भगवान को जान लेते हैं, उनकी लालसाएं खत्म हो जाती हैं.
