Mauni Amavasya 2026: आज, 18 जनवरी 2026, रविवार को मौनी अमावस्या है. इस दिन स्नान-दान और पितरों की आत्मा की शांति के लिए तर्पण किया जाता है. मान्यता है कि मौनी अमावस्या के दिन भगवान विष्णु की आराधना करने और विष्णु चालीसा का पाठ करने से भक्त के जीवन से नकारात्मकता का नाश होता है और जीवन में सुख-शांति आती है. साथ ही, इससे पितर भी प्रसन्न होते हैं और अपना आशीर्वाद प्रदान करते हैं. ऐसे में इस दिन स्नान करने के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण करें और विधि-विधान से भगवान विष्णु की पूजा करें. इसके साथ ही विष्णु चालीसा का पाठ अवश्य करें.
भगवान विष्णु चालीसा (Bhagwan Vishnu Chalisa)
॥ दोहा ॥
विष्णु सुनिए विनय, सेवक की चित लाय।
कीरत कुछ वर्णन करूँ, दीजै ज्ञान बताय॥
॥ चौपाई ॥
नमो विष्णु भगवान खरारी।
कष्ट नशावन अखिल बिहारी॥
प्रबल जगत में शक्ति तुम्हारी।
त्रिभुवन फैल रही उजियारी॥
सुंदर रूप मनोहर सूरत।
सरल स्वभाव मोहिनी मूरत॥
तन पर पीतांबर अति सोहत।
बैजंती माला मन मोहत॥
शंख चक्र कर गदा विराजे।
देखत दैत्य असुर दल भाजे॥
सत्य धर्म मद लोभ न गाजे।
काम क्रोध मद लोभ न छाजे॥
संतभक्त सज्जन मनरंजन।
दनुज असुर दुष्टन दल गंजन॥
सुख उपजाय कष्ट सब भंजन।
दोष मिटाय करत जन सज्जन॥
पाप काट भव सिंधु उतारण।
कष्ट नाशकर भक्त उबारण॥
करत अनेक रूप प्रभु धारण।
केवल आप भक्ति के कारण॥
धरणी धेनु बन तुम्हें पुकारा।
तब तुम रूप राम का धारा॥
भार उतार असुर दल मारा।
रावण आदि को संहारा॥
आप वराह रूप बनाया।
हिरण्याक्ष को मार गिराया॥
धर मत्स्य तन सिंधु बनाया।
चौदह रतनन को निकलाया॥
अमिलख असुरन द्वंद मचाया।
रूप मोहिनी आप दिखाया॥
देवन को अमृत पान कराया।
असुरन को छवि से बहलाया॥
कूर्म रूप धर सिंधु मझाया।
मंद्राचल गिरि तुरत उठाया॥
शंकर का तुम फंद छुड़ाया।
भस्मासुर को रूप दिखाया॥
वेदन को जब असुर डुबाया।
कर प्रबंध उन्हें ढूंढवाया॥
मोहित बनकर खलहि नचाया।
उस ही कर से भस्म कराया॥
असुर जलंधर अति बलदाई।
शंकर से उन कीन्ह लड़ाई॥
हार पार शिव सकल बनाई।
कीन सती से छल खल जाई॥
सुमिरन कीन तुम्हें शिवरानी।
बतलाई सब विपत कहानी॥
तब तुम बने मुनीश्वर ज्ञानी।
वृंदा की सब सुरति भुलानी॥
देखत तीन दनुज शैतानी।
वृंदा आय तुम्हें लपटानी॥
हो स्पर्श धर्म क्षति मानी।
हना असुर उर शिव शैतानी॥
तुमने ध्रुव प्रह्लाद उबारे।
हिरण्यकशिपु आदि खल मारे॥
गणिका और अजामिल तारे।
बहुत भक्त भव सिंधु उतारे॥
हरहु सकल संताप हमारे।
कृपा करहु हरि सिरजनहारे॥
देखूँ मैं निज दर्शन तुम्हारे।
दीनबंधु भक्तन हितकारे॥
चहत आपका सेवक दर्शन।
करहु दया अपनी मधुसूदन॥
जानूँ नहीं योग्य जप पूजन।
होय यज्ञ स्तुति अनुमोदन॥
शील दया संतोष सुलक्षण।
विदित नहीं व्रतबोध विलक्षण॥
करहुँ आपका किस विधि पूजन।
कुमति विलोक होत दुख भीषण॥
करहुँ प्रणाम कौन विधि सुमिरण।
कौन भाँति मैं करहुँ समर्पण॥
सुर मुनि करत सदा सेवकाई।
हर्षित रहत परम गति पाई॥
दीन दुखिन पर सदा सहाई।
निज जन जान लेव अपनाई॥
पाप दोष संताप नशाओ।
भव बंधन से मुक्त कराओ॥
सुत संपत्ति दे सुख उपजाओ।
निज चरणन का दास बनाओ॥
निगम सदा ये विनय सुनावै।
पढ़ै सुनै सो जन सुख पावै॥
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