शांति केवल अहिंसा से ही संभव है. पर अहिंसा का अर्थ इतना ही नहीं है कि किसी जीव की हत्या न की जाये. दूसरों को पीड़ा न पंहुचाना, उनके अधिकारों का हनन करना भी अहिंसा है. इस अहिंसा की पहले भी आवश्यकता थी और आज भी है. पर आज विनाशक शस्त्रों के अंबार लगे हुए हैं. गरीबी एवं अभाव के कारण लोग नारकीय जीवन जीने के लिए विवश है.
सैनिक छावनियों में लाखों-लाख सैनिक प्रतिदिन युद्धाभ्यास करते हैं. हिंसा की इतनी सूक्ष्म जानकारी और प्रशिक्षण दी जा रही है कि वर्षों तक यह क्रम चलता रहता है. हर वर्ष उसकी नयी-नयी तकनीक खोजी जाती है. नये-नये प्रेक्षापास्त, नये-नये टैंक सामने आ रहे है. हिंसा के प्रशिक्षण के लिए प्रचार-प्रसार पर मुट्ठी भर निहित स्वार्थी शक्तियों द्वारा अकूत संसाधन लगाये जा रहे हैं. ऐसी स्थिति में मन में एक विकल्प उठता है कि इतनी ट्रैनिंग दी जाती है, तो क्या अहिंसा की प्रशिक्षण की आवश्यकता नहीं है?
निश्चय ही आवश्यक तो है पर सवाल यह है कि उसे पूरा कैसे किया जाये? क्या केवल धर्मशास्त्रों के पढ़ने मात्र से अहिंसा जीवन में उतर आयेगी? क्या केवल प्रवचन सुनने मात्र से अहिंसा का जीवन में अवतरण हो जायेगा? नहीं. उसके लिए हमें अहिंसा के प्रशिक्षण पर विचार करना होगा. यह सोचना होगा कि हिंसा के क्या कारण हैं तथा कैसे उनका निवारण किया जा सकता है. हिंसा के दो प्रकार के कारण हैं- आंतरिक एवं बाहरी.
हिंसा के आंतरिक कारण में सबसे बड़ा पोषक कारण है- तनाव. वही आदमी हिंसा करता है, जो तनाव से ग्रस्त रहता है. हिंसा का दूसरा पोषक कारण है- रासायनिक असंतुलन. हिंसा केवल बाहरी कारणों से ही नहीं होती, उसके भीतरी कारण भी होते हैं. हमारी ग्रंथियों में जो रसायन बनते हैं, उन रसायनों में जब असंतुलन पैदा हो जाता है, तब व्यक्ति हिंसक बन जाता है.
हिंसा का तीसरा पोषक कारण है- नाड़ी तंत्रीय असंतुलन. नाड़ी तंत्रीय असंतुलन होते ही आदमी हिंसा पर उतारू हो जाता है. हिंसा का चौथा कारण है- निषेधात्मक दृष्टिकोण. घृणा, ईर्ष्या, भय, कामवासना ये सब निषेधक दृष्टिकोण हैं. उनसे भावतंत्र प्रभावित होता है और मनुष्य हिंसा में प्रवृत्त हो जाता है.
– आचार्य महाश्रमण
