संत रविदास जयंती: अइसा चाहौं राज मैं... जहं छोट बड़ो सभ सम बसैं

कृष्ण प्रताप सिंहहिन्दी की भक्ति काव्यधारा में संत रविदास की अपनी सर्वथा अलग व विलक्षण पहचान है. लेकिन दूसरे संत कवियों की ही तरह उनके जन्म के बारे में भी ज्यादा जानकारी नहीं मिलती. जो मिलती है, उसके अनुसार विक्रम संवत् 1441 से 1455 के बीच रविवार को पड़ी किसी माघ पूर्णिमा के दिन मांडुर […]

कृष्ण प्रताप सिंह
हिन्दी की भक्ति काव्यधारा में संत रविदास की अपनी सर्वथा अलग व विलक्षण पहचान है. लेकिन दूसरे संत कवियों की ही तरह उनके जन्म के बारे में भी ज्यादा जानकारी नहीं मिलती. जो मिलती है, उसके अनुसार विक्रम संवत् 1441 से 1455 के बीच रविवार को पड़ी किसी माघ पूर्णिमा के दिन मांडुर नामक गांव में उनका जन्म हुआ. यह मांडुर उत्तर प्रदेश के वाराणसी जिले में मंडेसर तालाब के किनारे मांडव ऋषि के आश्रम के पास वही गांव है, जो अब मंडुवाडीह कहलाता है. उनके पिता का नाम रग्घू अथवा राघव था. माता का करमा, जिन्हें ऊंच-नीच के पैरोकार हिकारत से ‘घुरबिनिया’कहते थे.

संत रविदास के समय में अस्पृश्यता समेत वर्ण व्यवस्था की नाना व्याधियां मनुष्यता का मार्ग अवरुद्ध किये हुए थीं. अंत्यज के रूप में खुद उनकी जाति पर भी यह कहर टृटता रहता था. वे इन व्याधियों को धर्म व संस्कृति का चोला पहने और स्वीकृति पाते देखते, तो कुछ ज्यादा ही त्रास पाते थे. ऐसे में स्वाभाविक ही था कि एक पीड़ित के रूप में वे तत्कालीन धर्म व संस्कृति को उस रूप में न लें, जिसमें ‘रामझरोखे बैठकर मुजरा लेनेवाले’दूसरे संतकवि ले रहे थे. तभी तो वे अपनी रचनाओं में इन कवियों से अलग, प्रतिरोधी और वैकल्पिक नजरिये के साथ सामने आते और उस श्रमण संस्कृति से ऊर्जा ग्रहण करते दिखायी देते हैं जो उन दिनों की मेहनत-मजदूरी करनेवाली जनता का एकमात्र अवलंब थी. इसी संस्कृति ने रविदास को तमाम पाखंडों व कुरीतियों के विरुद्ध मुखर होने की शक्ति दी. यह कहने की भी कि वे किसी भी नाम पर पाखंडों को स्वीकार नहीं करने वाले. यहां तक कि भक्ति के नाम पर भी नहीं और उनके निकट बेदीन होना व पराधीन होना एक जैसी चीजें हैं : ‘पराधीन को दीन क्या, पराधीन बेदीन, रैदास पराधीन को सभै ही समझे हीन!’

उनका लगभग सारा साहित्य इन्हीं बेदीन, हीन और पराधीन लोगों से प्रीति व मिताई की गाथा है. जो भी इस प्रीति के आड़े आया, वह चाहे कोई मान्यता या धारणा हो, विचार या दर्शन, रविदास ने उसको झाड़ने व झिंझोड़ने में कोई कोर-कसर नहीं रखी. ईश्वर, वेद, यज्ञ, आत्मा-परमात्मा, धर्म-अधर्म, जाति-संप्रदाय, वर्ग-वर्ण, छूत-अछूत और भेदभाव की बाबत उनके दो-टूक विचार इसकी जीवंत मिसालें हैं. मनुष्य और मनुष्य में भेद करनेवाले हर सिद्धांत, कर्मकांड, आडंबर और विश्वास पर उन्होंने लानतें भेजीं. एक जगह भक्ति को भी दासता का गुण बता डाला और कहा कि ईश्वर को जप-तप, व्रत-दान, पूजा-पाठ, गृहत्याग व इंद्रियदमन से नहीं पाया जा सकता, न ही जटा बढ़ाकर गुफाओं में खोजने से. वह मिलेगा तो बस मानव प्रेम में क्योंकि वह प्रेम में ही निवास करता है. रविदास कहते हैं कि जन्म से कोई ऊंचा-नीचा नहीं होता. नीच तो वास्तव में वे हैं, जिन्हें ओछे करमों की कीच लगी हुई है.

संत रविदास ने अपने समय में जिन मानवतावादी मूल्यों के लिए संघर्ष किया, जैसे आदर्श समाज की कल्पना की और अच्छे राज्य की जो अवधारणा पेश की, वह हू-ब-हू हमारे संवैधानिक संकल्पों जैसी है : ‘अइसा चाहौं राज मैं जहं मिलै सभन को अन्न, छोट बड़ो सभ सम बसैं रैदास रहै प्रसन्न’. यह अवधारणा उन्हें ’वसुधैव कुटुम्बकम्’की भावना से भी आगे ले जाती है. इस तर्क तक कि जब सभी लोग हाड़-मांस व खून के ही बने हैं, तो भिन्न या छोटे-बड़े कैसे हो सकते हैं : ‘जब सभकर दोउ हाथ-पग दोउ नैन दोउ कान, रविदास पृथक कइसे भये हिन्दू औ मूसलमान?’

अंत्यज श्रमजीवी के तौर पर गुजरी उनकी जिंदगी भी हमें कुछ कम संदेश नहीं देती. उनसे जुड़ा एक बहुप्रचारित मिथक ‘मन चंगा तो कठौती में गंगा’का है, जिसमें सिद्ध किया गया है कि मन मैला न हो तो कर्म व कर्तव्यपालन की कठौती भी गंगा है, और मन में भरे मैल को निकाले बिना गंगास्नान से भी कोई पुण्यखाता नहीं खुला करता. वहीं कई किंवदंतियां प्रगतिशील छवि से अलग उनका चमत्कारिक व्यक्तित्व गढ़ती हैं. दलित विचारक अंगनेलाल के अनुसार ऐसी किंवदंतियां उन लोगों ने गढ़ दी हैं, जिनके पास रविदास के इस प्रश्न का उत्तर नहीं था : ‘एकै चाम एक मल-मूतर एक खून एक गूदा, एक बूंद से सभ उत्पन्ने को बाभन को सूदा?’ये लोग चाहते थे कि रविदास हारकर उनकी परंपरा में आ जायें. लेकिन रविदास अविचलित रहे.

श्रम को ही ईश्वर बतानेवाले अपने इस गुरु को वृद्धावस्था में उनकी प्रिय शिष्या मीरा ने आग्रहपूर्वक चित्तौड़ बुलाया तो वहां कुछ विद्धेषियों ने धोखे से पत्नी लोना समेत रविदास की हत्या कर उनके शरीर को नष्ट-भ्रष्ट कर दिया. तब इतिहास ने इस तथ्य को भारी हृदय के साथ अपने पृष्ठों में दर्ज किया : ‘मानुषता को खात है रैदास जाति को रोग’.

‘बेगमपुरा’में रविदास के सपनों की दुनिया
यह दुनिया कैसी हो, इसकी एक कल्पना संत रविदास ने पेश की है. गुरु ग्रंथ साहिब में संकलित उनकी रचना ’बेगमपुर’की तुलना सर थॉमस मोर (1478-1535) की महत्वपूर्ण कृति ’यूटोपिया’से की जा सकती है.

बेगमपुरा सहर को नाउ

दूखु अंदोहु नही तह ठाउ।

न तसवीस खिराजु न मालु

खउफु न खता न तरसु जवालु।।

अब मोहि खूब वतन गह पाई

ऊहां खैरि सदा मेरे भाई।।

काइमु दाइमु सदा पातिसाही

दोम न सेम एक सो आही।

आबादानु सदा मसहूर

ऊहां गनी बसहि मामूर।।

तिउ तिउ सैल करहि जिउ भावै

महरम महल न को अटकावै।

कहि रविदास खलास चमारा।

जो हमसहरी सु मीतु हमारा।।

भावार्थ : बेगमपुरा ऐसे शहर का नाम है, जहां कोई दुख, चिंता नहीं है. कोई खटका नहीं, कोई टैक्स नहीं. खौफ नहीं, खता नहीं, घाटे का डर नहीं. जहां हमेशा खैरियत रहती है और एक सच्चे ईश्वर की सत्ता हमेशा के लिए कायम है. जहां कोई भी दूसरे-तीसरे दर्जे का नागरिक नहीं है और जो सदा आबाद रहता है. जहां दौलतमंद संतोष के साथ रहते हैं. लोग जहां चाहे जाते हैं. महल के लोग किसी के रास्ते में बाधा नहीं डालते हैं. रविदास कहते हैं कि जो भी हमारे इस बेगमपुरा का वासी है, वह हमारा मित्र है.

शब्दार्थ : बेगमपुरा- बिना गम का शहर, अंदोह- चिंता, तसवीस- खटका या धड़का, खिराज- टैक्स, जवाल- घाटा या पतन, काइमु- कायम, दाइमु- दायम यानी हमेशा, पातिसाही- पातशाही यानी एक सच्चे ईश्वर की सत्ता, दोम- दोयम यानी दूसरे दर्जे का, सेम- सेयम यानी तीसरे दर्जे का, आबादान- आबाद, गनी- धनी या बड़े लोग, मामूर- संतुष्ट या तृप्त, सैल- सैर, महरम महल- महल के वाकिफ.

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