श्रावणी उपाकर्म का महत्व

श्रीपति त्रिपाठी, ज्योतिषाचार्य श्रावण माह में श्रावण शुक्ल पूर्णिमा को श्रावणी उपाकर्म प्रत्येक हिंदू के लिए जरूर बताया गया है. वैसे यह कुंभ स्नान के दौरान भी होता है. यह कर्म किसी आश्रम, जंगल या नदी के किनारे संपूर्ण किया जाता है. अर्थात घर-परिवार से दूर संन्यासी जैसा जीवन जीकर यह कर्म किया जाता है. […]

श्रीपति त्रिपाठी, ज्योतिषाचार्य

श्रावण माह में श्रावण शुक्ल पूर्णिमा को श्रावणी उपाकर्म प्रत्येक हिंदू के लिए जरूर बताया गया है. वैसे यह कुंभ स्नान के दौरान भी होता है. यह कर्म किसी आश्रम, जंगल या नदी के किनारे संपूर्ण किया जाता है. अर्थात घर-परिवार से दूर संन्यासी जैसा जीवन जीकर यह कर्म किया जाता है. प्रायश्चित संकल्प, संस्कार और स्वाध्याय (श्रावणी उपाकर्म) किसी गुरु के सान्निध्य में रहकर करना चाहिए.
यह सबसे सिद्धिदायक महीना होता है, इसलिए इस दौरान व्यक्ति कठिन उपवास करते हुए जप, ध्यान या तप करता है. इसमें दसविधि स्नान करने से आत्मशुद्धि होती है व पितरों के तर्पण से उन्हें भी तृप्ति होती है. श्रावणी पर्व वैदिक काल से शरीर, मन और इंद्रियों की पवित्रता का पुण्य पर्व माना जाता है.
व्रत में नियमों का पालन जरूरी
अधिकतर लोग दो समय फलाहारी कर उपवास करते हैं, तो कुछ एक समय ही भोजन करते हैं. कुछ लोग तो अपने मन से ही नियम बना लेते हैं और फिर उपवास करते हैं. यह भी देखा गया है कुछ लोग चप्पल-जूते पहनना छोड़ देते हैं, लेकिन अपशब्द कहना नहीं छोड़ते.
जबकि व्रत के दौरान यात्रा, सहवास, वार्ता, भोजन आदि त्याग कर नियमपूर्वक व्रत रखना चाहिए, तब ही उसका फल मिलता है. हालांकि उपवास में कई लोग साबूदाने की खिचड़ी, फलाहार या राजगिरे की रोटी और भिंडी की सब्जी खा लेते हैं. इस तरह के उपवास से कैसे लाभ मिलेगा? उपवास या व्रत के शास्त्रों में उल्लेखित नियम का पालन करेंगे तभी तो लाभ मिलेगा.
किसे व्रत नहीं रखना चाहिए : अशौच अवस्था में व्रत न करें. जिसकी शारीरिक स्थिति ठीक न हो, व्रत करने से उत्तेजना बढ़े और व्रत रखने पर व्रत भंग होने की संभावना हो, वह भी व्रत न करे. रजस्वला स्त्री को भी व्रत नहीं रखना चाहिए. यदि कहीं पर जरूरी यात्रा करनी हो, तब भी व्रत रखना जरूरी नहीं है. युद्ध जैसी स्थिति में भी व्रत त्याज्य है. क्रमश:

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