शारदीय नवरात्र आठवां दिन : मां महागौरी की ऐसे करें पूजा, होगी मनोकामनाओं की पूर्त्ति

जो श्वेत वृषभ पर आरूढ़ होती हैं, श्वेत वस्त्र धारण करती हैं,सदा पवित्र रहती हैं तथा महादेवजी को आनंद प्रदान करती हैं, वे महागौरी दुर्गा मंगल प्रदान करें. आदिशक्ति सीताजी-8 सीताजी सर्वलोकमयी, सर्वधर्ममयी, सर्ववेदमयी, सर्वाधार, सर्व कार्यकारणमयी, महालक्ष्मी, देवेश की भिन्नाभिन्नरूपा, चेतना चेतनात्मिका, ब्रह्मस्थावरात्मा, तद्गुण-क्रमविभाग-भेद से शरीर रूपा, असुर, राक्षस, भूत, प्रेत, पिशाच, बेताल, भूतादि-भूतशरीररूपा, […]

जो श्वेत वृषभ पर आरूढ़ होती हैं, श्वेत वस्त्र धारण करती हैं,सदा पवित्र रहती हैं तथा महादेवजी को आनंद प्रदान करती हैं, वे महागौरी दुर्गा मंगल प्रदान करें.
आदिशक्ति सीताजी-8
सीताजी सर्वलोकमयी, सर्वधर्ममयी, सर्ववेदमयी, सर्वाधार, सर्व कार्यकारणमयी, महालक्ष्मी, देवेश की भिन्नाभिन्नरूपा, चेतना चेतनात्मिका, ब्रह्मस्थावरात्मा, तद्गुण-क्रमविभाग-भेद से शरीर रूपा, असुर, राक्षस, भूत, प्रेत, पिशाच, बेताल, भूतादि-भूतशरीररूपा, देवर्षि, मनुष्य, गन्धर्वरूपा एवं भूतेन्द्रिय-मनःप्राणरूपा हैं. श्रीरामजी से सीताजी सदा सम्पृक्त हैं, उनसे कभी पृथक् नहीं होतीं.
गोस्वामीजी लिखते हैं-
प्रभा आइ कहं भानु विहाई ।
कहं चंद्रिका चदुं तजि जाई ।।
पद्मपुराण में सीताजी को जगमाता और श्रीराम को जगत्-पिता,सीताजी को प्रपंचरूपिणी और श्रीराम को निष्प्रपंच,सीताजी को ध्यानस्वरूपिणी और श्रीराम को योगियों की ध्येयात्ममूर्ति और दोनों को परिणामापरिणाम से रहित बताया गया है-
जगन्मातापितृभ्यां च जनन्यै राघवाय च ।
नमः प्रपंचरूपिण्यै निष्प्रपंचस्वरूपिणे ।।
नमो ध्यानस्वरूपिण्यै योगिध्येयात्ममूर्तयै ।
परिणामापरिमाभ्यां रिक्ताभ्यां च नमो नमः ।।
जब लंका-विजय करके श्री रामजी लौटे और अयोध्या में उनका अभिषेक हुआ, रामजी सिंहासनरूढ़ हुए, पास में माता सीताजी बैठी थीं,उस समय वे वसिष्ठादि महात्माओं से घिरे हुए थे. रामजी ने देखा हनुमानजी अंजलि बांधे खड़े हैं.
उन्हें तत्वज्ञान के अतिरिक्त और किसी पदार्थ की चाह नहीं है. तब श्रीरामजी ने सीताजी से कहा कि तुम हनुमानजी को तत्वोपदेश करो. ये हम दोनों के परम भक्त हैं. तब सीताजी ने कहा-हनुमान, तुम मुझे मूलप्रकृति समझो. मैं सृष्टि,स्थिति और लय करती हूं. श्रीराम के सन्निधान मात्र से निरंतर इस जगत् की रचना किया करती हूं. अनभिज्ञ लोग इनके सान्निध्य से मेरी रचना का आरोप इनपर किया करते हैं.
अयोध्या में अति निर्मल रघुवंश में जन्मग्रहण, विश्वामित्र की सहायता, यज्ञ की रक्षा,अहल्योहार, शिवजी का धनुष-भङ्ग,मेरा पाणिग्रहण,परशुराम का मदभङ्ग, दण्डकारण्यगमन,माया-मारीच का वध,माया-सीताहरण,जटायु को मोक्ष-प्रदान,शबरी-सत्कारग्रहण,सुग्रीव से समागम, बालि-वध,सीता का अन्वेषण, समुद्र में सेतुबंधन, लंका पर चढ़ाई, दुष्ट रावण का सपुत्र-वध, विभीषण को राज्य-दान, पुष्पक द्वारा मेरे साथ अयोध्या-आगमन, राज्य में श्रीरामजी का अभिषेक-ये सभी कार्य मैने किये हैं. वस्तुतः सीता ही इच्छा-शक्ति हैं जो लोकरक्षणार्थ श्रीरूप से प्रवृत्त होती है. वे ही योगमाया हैं. प्रलयावस्ता में श्रीवत्स रूप से भगवान के दक्षिण वक्षः स्थल में निवास करती हैं.
(क्रमशः)
प्रस्तुतिः डॉ एनके बेरा

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