जिनका हाथ उज्जवल चंद्रहास (तलवार) से सुशोभित होता है तथा सिंहप्रवर जिनका वाहन है, वे दानव संहारिणी दुर्गा देवी कात्यायनी मंगल प्रदान करें.
आदिशक्ति सीताजी-6
श्रीरामचरितमानस के अयोध्याकांड से अरण्यकांड तक सीताजी स्थितिकारिणी अर्थात पालनकर्तृ हैं. इन कांडों में सीताजी करुणा की साकार प्रतिमा हैं. इन कांडों में घटनेवाली सारी घटनाओं को वे साक्षी-भाव से देखती हैं.
उनमें उन घटनाओं के प्रति कोई प्रतिक्रिया नहीं है.
वे यदि चाहतीं, तो पल मात्र में देवताओं, कैकेयी और मंथरा के सम्मिलित षड्यंत्रों को ध्वस्त कर देतीं, क्योंकि सीताजी चराचर की समस्त क्रियाओं की मूल प्रेरणा हैं. वे आदिशक्ति और जगत की मूलाधार चेतना है. उनके भृकुटिविलास से सृष्टिका सृजन और प्रलय होता है. मनु-शतरूपा-प्रकरण में सीताजी को आद्याशक्ति के रूप में महाकवि तुलसीदासजी ने चित्रित किया है-
वाम भाग सोभति अनुकूला ।
आदिसक्ति छबिनिधि जगमूला ।।
जासु अंस उपजहिं गुनखानी ।
अगनित लच्छि उमा ब्रह्मानी ।।
भृकुटि बिलास जासु जग होई ।
राम बाम दिसि सीता सोई ।।
उपर्युक्त समस्त वैभव-विभूषित होने पर भी सीताजी चूंकि अयोध्या से अरण्यकांड तक पालनकारिणी की भूमिका में हैं, अतः वे साक्षीमात्र या क्षमास्वरूपा हैं. जयंत उन पर चंचु-प्रहार करता है, फिर भी वे करुणामयी बनी रहती हैं. यहां तक कि रावण द्वारा अपहृत होने के बाद भी वे अपनी करुणा का परित्याग नहीं करती.(क्रमशः)
प्रस्तुतिः डॉ एनके बेरा
