Hindu College के सिंपोजियम वार्षिकोत्सव में बोलीं ममता कालिया- साहित्य में अतीत नहीं वर्तमान को लिखने पर हो जोर

Hindu College के साहिित्य सिंपोजियम में साहित्यकार ममता कालिया ने स्त्री लेखन पर विस्तार से बात की.

Hindu College : अतीत में जाकर लिखना आसान होता है किंतु लेखक को अतीत नहीं बल्कि वर्तमान को लिखने पर जोर देना चाहिए. लेखन स्त्री के प्रश्नों का हो या जीवन के दूसरे सवाल,अच्छे लेखक को हमेशा अतिवादिता से बचना चाहिए. सुप्रसिद्ध लेखिका ममता कालिया ने उक्त विचार हिंदू महाविद्यालय में एक आयोजन में व्यक्त किए. वे महाविद्यालय की संस्था सिंपोजियम के वार्षिकोत्सव में ‘साहित्य में स्त्री और स्त्री का साहित्य’ विषय पर व्याख्यान दे रही थीं. ममता कालिया ने कहा कि साहित्य में स्त्री हमेशा रही हैं. हालांकि आधुनिक काल में स्त्री की दशा और दिशा को दिखाने का शुरुआती प्रयास बांग्ला लेखकों ने किया जिनमें शरत चंद्र,रवींद्रनाथ ठाकुर का नाम सबसे महत्वपूर्ण है. भारत में नवजागरण और लेखन साथ-साथ आया. नवजागरण के साथ ही शिक्षा आयी और स्त्रियों में कलम चलाने की हिम्मत पैदा हुई. दुलाईवाली कहानी की लेखिका राजेंद्र बाला घोष के संस्मरणों को सुनकर प्रेमघन जी ने उन्हें लिखने के लिए प्रेरित किया और इस प्रकार एक स्त्री के जीवन के किस्से ही लेखनी का स्पर्श पाकर साहित्य का हिस्सा बन गए.


ममता कालिया ने बताया कि राष्ट्रीय सेवा योजना के माध्यम से उन्हें गांव की बहुत सी स्त्रियों से बात करने का मौका मिला जिसमें उन्हें पता चला कि स्त्रियों को समस्या होने पर भी वे आवाज नहीं उठाती. ऐसी स्त्रियों को उनके हक के प्रति जागरूक करने की आवश्यकता है ताकि वे थोपी हुई नैतिकता और आदर्शवादिता की बेड़ियां तोड़ सकें. साहित्य में स्त्री लेखन पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि नए लेखन की मुखर शुरुआत मन्नू भंडारी की कहानियों से होती है जिनकी कहानियां समाज और पुरुषवादी मानसिकता को चुनौती देने वाली थीं. स्वाधीनता आंदोलन से जुड़कर उन्होंने समाज को जागरूक करने का भी कार्य किया. राजेंद्र यादव ने भी हंस पत्रिका के माध्यम से लेखिकाओं को प्रोत्साहित किया. मोहन राकेश,कमलेश्वर ने भी सफल-असफल संबंधों पर खूब लिखा.


ममता कालिया ने कहा कि स्त्री लेखन को स्त्री देह तक सीमित नहीं रहना चाहिए. स्त्रियों को समाज के अन्य पहलुओं को भी लेखन का दायरा बनाना चाहिए. उन्होंने इस विषय पर समकालीन लेखिकाओं के उदाहरण भी प्रस्तुत किए. जिनमें उषा प्रियंवदा, मधु कांकरिया, नीलाक्षी सिंह,अलका सरावगी, गीतांजलि श्री की कृतियों का उदाहरण देकर स्त्री लेखन के वृहद आयामों को उद्घाटित किया. गीतांजलि श्री के उपन्यास रेत समाधि का विस्तृत उल्लेख कर उन्होंने कहा कि यह उपन्यास विभाजन की समस्या पर केंद्रित है जिसमें एक बूढ़ी औरत अपने घर को देखने के लिए लाहौर जाना चाहती है. कालिया ने देवेश की रचना मेट्रोनामा और वंदना राग के उपन्यास बिसात पर जुगनू को विषय की विविधता की दृष्टि से उत्कृष्ट बताया.

व्याख्यान के अंत में कालिया ने कहा कि स्त्री के हक में लेखन ठीक है लेकिन जिस प्रकार पुरुषवाद गलत है उसी प्रकार स्त्रीवाद भी. किसी भी चीज की अति ठीक नहीं होती. लेखन में टकराव के माध्यम से अपनी खोई हुई अस्मिता को पाना एक लक्ष्य हो सकता है किंतु किसी की अस्मिता को दबा कर गैर बराबरी मिटाई नहीं जा सकती. कार्यक्रम में सिंपोजियम के परामर्शदाता डॉ सुमित नंदन, राजनीति विज्ञान के डॉ अनिरुद्ध प्रसाद, डॉ कस्तूरी एवं डॉ रितिका मौजूद रहे. सोसायटी की अध्यक्ष चार्वी ने प्रारंभ में ममता कालिया का स्वागत किया. आयोजन में अंग्रेजी, हिंदी, राजनीति विज्ञान समेत अन्य विभागों के विद्यार्थी भी बड़ी संख्या में उपस्थित रहे. उक्त जानकारी हिंदू कॉलेज के साहित्य सभा के अध्यक्ष आकाश मिश्रा ने दी.

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Author: Rajneesh Anand

रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है.पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव रखती हैं. झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाली रजनीश ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की और वर्ष 2000-01 में पत्रकारिता की शुरुआत की. इन्होंने पहली नौकरी झारखंड जागरण दैनिक अखबार में की. उसके बाद इन्होंने प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस तथा दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य संस्करणों में काम करने के बाद वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. रजनीश आनंद की पहचान तथ्यपरक रिपोर्टिंग, गहन शोध और विश्लेषणात्मक लेखन के लिए है. उनकी रुचि राजनीति, सामाजिक सरोकारों, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों में रही है। उन्होंने हमेशा उन मुद्दों को प्राथमिकता दी है जो समाज के हाशिये पर खड़े लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की चर्चा में अपेक्षाकृत कम स्थान पाते हैं. वे कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर विस्तृत अध्ययन और रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान उन्होंने महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर कार्य किया. इसके अतिरिक्त सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत उन्होंने बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की. आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है. हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में भविष्य की चुनौतियों, रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं. उनका मानना है कि ऊर्जा परिवर्तन की प्रक्रिया तभी सफल होगी जब उसमें प्रभावित समुदायों की भागीदारी और हितों को केंद्र में रखा जाए.पत्रकारिता उनके लिए केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने का माध्यम है. जमीनी रिपोर्टिंग, तथ्यों की पड़ताल और जनसरोकारों को केंद्र में रखकर लिखना उनकी कार्यशैली की विशेषता रही है. इसके अतिरिक्त रजनीश आनंद कहानियां और कविताएं लिखने का शौक भी रखती है.

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