कॉन्सर्ट हो या छुट्टी, ईएमआई पर चल रही जिंदगी! बढ़ते कर्ज को लेकर क्यों सतर्क है RBI?

फोन, शॉपिंग, ट्रैवल, कॉन्सर्ट या किसी महंगे वीकेंड प्लान के लिए अब पहले की तरह महीनों तक बचत करने की जरूरत नहीं पड़ती. आपके वॉलेट में रखा क्रेडिट कार्ड आपको खर्च करने की ताकत देता है, लेकिन इस आजादी की कीमत भी है, वह कीमत आने वाले महीनों की कमाई से चुकानी पड़ती है.तो क्या यह सुविधा आपको भविष्य की कमाई के बोझ में तो नहीं धकेल रही?

क्रेडिट कार्ड, पर्सनल लोन और डिजिटल क्रेडिट ने आज हमारे खर्च करने का तरीका काफी बदल दिया है. जिन चीजों को खरीदने के लिए पहले महीनों तक पैसे बचाने पड़ते थे, उन्हें अब एक क्लिक में खरीदा जा सकता है. फोन लेना हो, ट्रिप पर जाना हो, कॉन्सर्ट देखना हो या कोई महंगा सामान खरीदना हो, क्रेडिट का विकल्प हमेशा मौजूद है. यानी कुछ खरीदने के लिए अब यह जरूरी नहीं कि आपके बैंक खाते में पैसे हों, क्रेडिट कार्ड और दूसरे क्रेडिट विकल्प आपको आज खर्च करने की आजादी देते हैं.

लेकिन इस सुविधा का दूसरा पहलू भी है, खर्च करना जितना आसान हुआ है, कर्ज का बोझ भी उतनी ही तेजी से बढ़ रहा है, खासकर युवाओं में. इसलिए सवाल सिर्फ यह नहीं है कि युवा कर्ज क्यों ले रहे हैं, असली सवाल यह है कि वे कर्ज ले किस चीज के लिए रहे हैं?

यानी कहानी सिर्फ बढ़ते कर्ज की नहीं है. असली सवाल यह है कि इस कर्ज का पैसा कहां जा रहा है, जरूरतों पर, किसी ऐसी चीज पर जो आगे कमाई में मदद कर सकती है, या फिर आज की लाइफस्टाइल और अनुभवों पर? ऐसे में यह जानना जरूरी है कि बढ़ता क्रेडिट युवाओं की लाइफस्टाइल को आसान बना रहा है या उन्हें भविष्य की कमाई के बोझ में भी धकेल रहा है?

कहां और कितना खर्च हो रहा है उधार का पैसा?

भारत में लोगों पर कर्ज का बोझ पिछले कुछ सालों में बदला है.

  • भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के आंकड़ों के मुताबिक, मार्च 2026 तक लोगों की कुल उधारी में घर के अलावा दूसरी जरूरतों के लिए लिया गया कर्ज 58.4 प्रतिशत हो गया. मार्च 2025 में यह हिस्सा 54.9 प्रतिशत था.
  • लेकिन इस आंकड़े का मतलब यह नहीं है कि लोग अपनी कुल उधारी का 58.4 प्रतिशत छुट्टी, फोन, शॉपिंग या दूसरे लाइफस्टाइल खर्चों पर लगा रहे हैं, इस हिस्से में कई तरह के खुदरा कर्ज भी शामिल हैं.

यह बदलाव एक बड़ा सवाल जरूर खड़ा करता है, लोग कर्ज लेकर आखिर क्या खरीद रहे हैं और पैसा कहां खर्च कर रहे हैं?

  • क्योंकि कुल कर्ज का आंकड़ा हमें सिर्फ यह बताता है कि उधारी बढ़ रही है. यह नहीं बताता कि उस उधार से किस तरह का उपयोग हो रहा है. यही वजह है कि कर्ज की मात्रा के साथ उसके इस्तेमाल को समझना भी जरूरी हो जाता है.
  • क्योंकि घर खरीदने के लिए लिया गया कर्ज अलग है, कारोबार शुरू करने या बढ़ाने के लिए लिया गया कर्ज भी अलग है, ऐसे कर्ज से आगे चलकर कोई संपत्ति बन सकती है या कमाई का जरिया तैयार हो सकता है.
  • लेकिन अगर कर्ज का इस्तेमाल छुट्टी, नया फोन, शॉपिंग, मनोरंजन या दूसरे लाइफस्टाइल खर्चों के लिए हो रहा है, तो इसका असर अलग होता है, यहां खर्च आज हो जाता है, लेकिन उसकी कीमत आने वाले महीनों की कमाई से चुकानी पड़ती है.
  • इसलिए सवाल सिर्फ यह नहीं है कि लोग कितना कर्ज ले रहे हैं. असली सवाल यह है कि वे कर्ज का पैसा किस चीज पर खर्च कर रहे हैं. यह भी देखना जरूरी है कि कर्ज कौन ले रहा है, किस उम्र में ले रहा है और उसे चुकाने के बाद हर महीने उसकी आय में कितना पैसा बचता है.
  • क्योंकि कर्ज का जोखिम सिर्फ इस बात से तय नहीं होता कि आपने कितना पैसा लिया है. यह भी उतना ही मायने रखता है कि वह पैसा कहां गया और उसे चुकाने की आपकी क्षमता कितनी है.

क्रेडिट का विकल्प आर्थिक सहायता या कमाई पर बोझ?

युवाओं की क्रेडिट यात्रा अब पहले शुरू हो रही है

कुछ साल पहले तक किसी की जिंदगी में पहला बड़ा कर्ज अक्सर घर, कार या कारोबार जैसी बड़ी जरूरतों को पूरा करने के लिए किया जाता था. लेकिन अब तस्वीर बदल रही है. आज लोग काफी कम उम्र में ही क्रेडिट की दुनिया में आ रहे हैं, खासकर युवा.

  • पीढ़ियों के हिसाब से किए गए एक विश्लेषण में सामने आया कि 1960 और 1970 के दशक में जन्मे लोगों ने आमतौर पर अपना पहला कर्ज 30 के दशक के आखिर या 40 की उम्र के आसपास लिया था.
  • 1990 के दशक में जन्मी पीढ़ी में यह उम्र घटकर 20 के दशक के मध्य तक आ गई.
  • 2000 के बाद जन्मे युवाओं में क्रेडिट की दुनिया में एंट्री करीब 22 साल की उम्र में होने की बात सामने आई है.

यानी जो चीज पहले जिंदगी के काफी बाद में शुरू होती थी, वह अब करियर शुरू होने के कुछ ही समय बाद शुरू हो जाती है. और इसके पीछे सिर्फ जरूरत नहीं है, बल्कि स्मार्टफोन, डिजिटल भुगतान, ऑनलाइन खरीदारी और कुछ ही मिनटों में मिलने वाला क्रेडिट ऑप्शन इसकी बड़ी वजह हैं.

यानी क्रेडिट तक पहुंच जितनी जल्दी हो रही है, खर्च करने की क्षमता भी उतनी ही जल्दी बढ़ रही है. पहले जहां खरीदारी के लिए बचत जरूरी थी, अब खरीदारी पहले और भुगतान बाद में हो सकता है.

नतीजा आज कम उम्र में ही क्रेडिट कार्ड, ईएमआई और दूसरे कर्ज के विकल्पों से जुड़ रहा है. सवाल यह है कि कम उम्र में शुरू हुई यह क्रेडिट यात्रा युवाओं को वित्तीय रूप से मजबूत बना रही है या उनकी भविष्य की कमाई पर बोझ भी बढ़ा रही है?

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क्रेडिट कार्ड ने दी लोगों को खर्च करने की आजादी

क्रेडिट की सबसे बड़ी खासियत यह है कि पैसा आपके खाते में न हो, तब भी आप खर्च कर सकते हैं.

  • मान लीजिए किसी के बैंक खाते में ₹30,000 हैं, लेकिन उसके क्रेडिट कार्ड की सीमा ₹1 लाख है. ऐसे में भले उसके पास असल में ₹30,000 ही हैं. लेकिन वह जरूरत पड़ने पर ₹1 लाख तक का खर्च कर सकता है. यही बदलाव युवाओं के खर्च करने के तरीके को बदल रहा है.

लेकिन यहां एक बात समझना जरूरी है.

  • क्रेडिट लिमिट आपके पैसे नहीं हैं. यह उधार लेने की सीमा है. आज उस सीमा से किया गया खर्च कल आपकी कमाई से चुकाना होगा. यानी क्रेडिट कार्ड ने खर्च करना आसान जरूर किया है, लेकिन साथ ही भविष्य की कमाई का एक हिस्सा पहले ही खर्च करने का रास्ता भी खोल दिया है.
  • यानी क्रेडिट लिमिट जितनी बड़ी दिखाई देती है, असली सवाल यह है कि उस लिमिट से खर्च करने के बाद उसे चुकाने की क्षमता कितनी है.

और इसके साथ साथ यह आसानी से उपलब्ध भी है.

सिर्फ चीजें नहीं, अनुभव भी खरीदे रहे लोग

खर्च के लिए बढ़ रहा क्रेडिट के इस्तेमाल को समझने के लिए आपको यह समझना होगा कि उपभोग का चेहरा भी बदल रहा है.

  • नई पीढ़ी के लिए खर्च का मतलब सिर्फ फोन, कपड़े या इलेक्ट्रॉनिक्स खरीदना नहीं है, यात्रा, कॉन्सर्ट, संगीत समारोह, खेल आयोजन, रेस्तरां और दूसरे अनुभव भी लाइफस्टाइल उपभोग का हिस्सा बन रहे हैं.

यानी लाइफस्टाइल खर्च अब सिर्फ ऐसी चीजों तक सीमित नहीं है जो घर में दिखाई देते हैं. अनुभव भी खर्च का हिस्सा हैं और कई बार इन अनुभवों की कीमत सिर्फ एक टिकट या एक बुकिंग तक सीमित नहीं रहती.

जनवरी 2026 के एयरबीएनबी इंडिया सर्वेक्षण में 62 प्रतिशत जनरेशन Z उत्तरदाताओं ने कॉन्सर्ट और संगीत समारोहों के लिए यात्रा करने की योजना बताई थी. 76 प्रतिशत ने कहा कि वे किसी संगीत कार्यक्रम के लिए पहली बार किसी शहर गए.

अगर इन आंकड़ों को उपभोग और क्रेडिट के व्यापक संदर्भ में देखें तो एक महत्वपूर्ण बात सामने आती है कि कॉन्सर्ट की कीमत सिर्फ टिकट की कीमत नहीं होती. अगर वो कार्यक्रम दूसरे शहर में है तो खर्च का पूरा पैकेज होता है.

यानी ₹5,000 या ₹10,000 का कॉन्सर्ट कार्यक्रम देखते-देखते ₹20,000, ₹30,000 या उससे अधिक की ट्रिप हो सकती है.

छुट्टी खत्म होती है, लेकिन क्रेडिट कार्ड बिल नहीं

इसे एक आसान उदाहरण से समझिए...

  • मान लीजिए किसी ने ₹80,000 की ट्रिप की, इसमें ₹30,000 उसकी अपनी बचत थी और बाकी ₹50,000 क्रेडिट कार्ड या किसी दूसरे से कर्ज लिया.
  • ट्रिप खत्म हो गई. तस्वीरें सोशल मीडिया पर आ गईं. लेकिन ₹50,000 का खर्च खत्म नहीं हुआ.अब यह रकम आने वाले महीनों की कमाई से चुकानी होगी.
  • यानी छुट्टी आज खत्म हो गई, लेकिन उसका खर्च अभी बाकी है. जो आने वाले महिने की सैलरी से चुकाना होगा.
  • यही वह फर्क है जो लाइफस्टाइल क्रेडिट को सामान्य खर्च से अलग बनाता है. चीज या अनुभव आज मिल जाता है, लेकिन उसका भुगतान बाद में होता है.

इसलिए लाइफस्टाइल क्रेडिट को समझने के लिए सिर्फ यह पूछना पर्याप्त नहीं है कि कितना खर्च हुआ. यह भी समझना होगा कि उस खर्च के लिए पैसा कहां से आया?

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कर्ज से ज्यादा जरूरी है कि खर्च होने वाली कमाई का हिस्सा

असली जोखिम एक बड़ा उधार नहीं, कई सारा छोटा कर्ज हो सकता है.

  • मान लीजिए आपके पास पहले से क्रेडिट कार्ड का बकाया है, फोन की ईएमआई चल रही है और एक पर्सनल लोन भी है तो यह तस्वीर बदल जाती है.
  • हर कर्ज अलग है, छोटा है, लेकिन महीने की सैलरी आने पर उसकी किस्त आपको एक साथ चुकानी होगी.
  • अगर महीने की कमाई ₹40,000 है, तो उसमें से ₹14,000 यानी 35 प्रतिशत सिर्फ कर्ज चुकाने में चला जाएगा.
  • अब आपके पास घर का खर्च, खाना, यात्रा, बचत और बाकी जरूरतों के लिए सिर्फ ₹26,000 बचेंगे.
  • यानी जोखिम सिर्फ कर्ज की रकम में नहीं, बल्कि उस रकम की वजह से कमाई पर पड़ने वाले हर महीने के दबाव में है.

कर्ज कितना बड़ा है, सिर्फ यह देखना काफी नहीं है, यह भी जानना जरूरी है कि हर महीने उसकी कमाई का कितना हिस्सा कर्ज चुकाने में जा रहा है.कई बार एक बड़ा कर्ज नहीं, बल्कि ऐसे ही कई छोटे-छोटे कर्ज मिलकर व्यक्ति की कमाई पर बड़ा दबाव बना देते हैं.

आज की कीमत कल की कमाई से चुकाया जा रहा

  • क्रेडिट का बढ़ना अपने आप में बुरी बात नहीं है. सही तरीके से लिया गया कर्ज जरूरत पूरी करने और आर्थिक गतिविधियों को बढ़ाने में मदद कर सकता है.
  • लेकिन क्रेडिट जितना आसान होता जा रहा है, उतना ही जरूरी है कि लोग यह समझें कि कर्ज और कमाई के बीच संतुलन कितना है.
  • आज किसी के लिए ₹50,000 का खर्च बहुत बड़ा नहीं लगे,लेकिन अगर यही पैसा क्रेडिट से आया है, तो अगले कई महीनों तक उसकी कमाई का एक हिस्सा इसे चुकाने में जाएगा.
  • यहीं से लाइफस्टाइल और कर्ज की कहानी जुड़ती है. आज का खर्च कितना है, यह जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी यह भी है कि उसकी कीमत चुकाने के बाद कल कितना बचेगा.

क्रेडिट को लेकर क्या है रिजर्व बैंक की चिंता

रिजर्व बैंक की चिंता यह नहीं है कि लोग कर्ज क्यों ले रहे हैं. चिंता यह है कि कहीं कुछ लोग अपनी कमाई से ज्यादा कर्ज तो नहीं ले रहे.

  • भारत में घरेलू कर्ज को फिलहाल किसी बड़े वित्तीय संकट के तौर पर नहीं देखा जा रहा है. लेकिन रिजर्व बैंक लगातार इस बात पर नजर रखता है कि घरेलू कर्ज कितना बढ़ रहा है और खासकर असुरक्षित कर्ज लेने वालों पर कितना बोझ है.
  • असुरक्षित कर्ज यानी ऐसा कर्ज जिसके पीछे घर या कोई दूसरी बड़ी संपत्ति गिरवी नहीं होती. इसमें पर्सनल लोन और क्रेडिट कार्ड का बकाया शामिल हो सकता है.
  • मसलन, घर के कर्ज के पीछे एक संपत्ति होती है, घर. लेकिन पर्सनल लोन या क्रेडिट कार्ड के मामले में पैसा वापस आने की उम्मीद मुख्य रूप से उधार लेने वाले की कमाई पर होती है.
  • जब कमाई ठीक चलती है, तो ईएमआई भी चलती रहती है. लेकिन कमाई घट गई या नौकरी चली गई, तो वही ईएमआई बोझ बन सकती है.

यही वजह है कि रिजर्व बैंक के लिए सिर्फ यह देखना काफी नहीं है कि लोग कितना कर्ज ले रहे हैं. यह भी महत्वपूर्ण है कि कर्ज किस तरह का है, उधार लेने वाले पर पहले से कितना कर्ज है और उसकी कमाई के मुकाबले कर्ज चुकाने का बोझ कितना है.

भारत के युवाओं की अगली क्रेडिट कहानी क्या होगी?

घरेलू कर्ज के आंकड़े यह तो बताते हैं कि लोग कितना उधार ले रहे हैं, लेकिन यह नहीं बताते कि कर्ज का पैसा जा कहां रहा है और शायद यही इस पूरी कहानी का सबसे बड़ा data gap है. कुल कर्ज बढ़ने से यह पता नहीं चलता कि युवा अपने क्रेडिट का कितना हिस्सा जरूरतों, कितनी हिस्सेदारी लाइफस्टाइल और कितना हिस्सा पुराने कर्ज को चुकाने में इस्तेमाल कर रहे हैं.

  • युवा ट्रैवल, कॉन्सर्ट, गैजेट या शॉपिंग के लिए कितना क्रेडिट ले रहे हैं? कितने युवाओं के पास एक से ज्यादा कर्ज हैं?
  • कितने लोग पुराना कर्ज चुकाने के लिए नया कर्ज ले रहे हैं?
  • और हर महीने उनकी कमाई का कितना हिस्सा ईएमआई और कर्ज चुकाने में जा रहा है?

इन सवालों के जवाब के लिए सिर्फ कुल कर्ज के आंकड़े काफी नहीं हैं. यह जानना भी जरूरी है कि कर्ज किसने लिया, क्यों लिया और उसे चुकाना कितना आसान या मुश्किल हो रहा है.

क्रेडिट ने लाइफस्टाइल आसान की, लेकिन कमाई पर दबाव भी बढ़ा

  • क्रेडिट ने युवाओं के लिए खर्च करना आसान कर दिया है. ट्रिप, महंगा फोन, शॉपिंग या कॉन्सर्ट, हर चीज के लिए महीनों बचत करना जरूरी नहीं है.
  • लेकिन यह समझना होगा कि इस सुविधा की कीमत भविष्य की कमाई से चुकानी पड़ती है.
  • इसलिए बढ़ते कर्ज की असली कहानी सिर्फ यह नहीं है कि कितना उधार लिया गया, बल्कि यह भी है कि किस लिए लिया गया और हर महीने कमाई का कितना हिस्सा उसे चुकाने में जा रहा है.
  • क्योंकि आज की क्रेडिट से खरीदी गई चीज कल पुरानी हो सकती है, लेकिन उसका कर्ज तब तक साथ रहता है, जब तक पूरा पैसा चुका न दिया जाए.

यानी क्रेडिट ने आज खर्च करने की आजादी जरूर बढ़ा दी है, लेकिन असली सवाल यह है कि इस आजादी की कीमत कल की कमाई कितनी चुकाएगी.

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लेखक के बारे में

By गौतम कुमार

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