महिला आरक्षण: जब पक्ष-विपक्ष दोनों समर्थक, तो 543 सीटों पर क्यों लागू नहीं हो सकता कानून?

women reservation bill lok sabha : महिला आरक्षण अधिनियम, 2023 में कानून बन चुका है, सरकार ने इसे 17 अप्रैल 2026 को नोटिफाई भी कर दिया है. बावजूद इसके कानून का लाभ महिलाओं को अबतक नहीं मिल पाया है.

women reservation bill lok sabha : महिला आरक्षण अधिनियम में संशोधन के लिए संसद में लाया गया बिल शुक्रवार को गिर गया. अब सरकार और विपक्ष दोनों एक दूसरे को महिला विरोधी बता रहे हैं. ऐसे में आम जनता यह सोच रही है कि जब सरकार और विपक्ष दोनों ही महिलाओं को आरक्षण देने के मामले में एकमत हैं, तो फिर आखिर संशोधन बिल गिरा क्यों? एक और सवाल यह भी है कि आखिर वर्तमान स्थिति में यानी 543 लोकसभा सीटों पर ही महिलाओं को आरक्षण क्यों नहीं दिया जा सकता है?

नारी शक्ति वंदन अधिनियम में संशोधन का बिल क्यों गिरा?

नारी शक्ति वंदन अधिनियम 2023 को लोकसभा चुनाव 2029 में लागू करवाने के उद्देश्य से सरकार इसमें संशोधन का प्रस्ताव लेकर आई थी. सरकार की मंशा यह थी कि जनगणना और परिसीमन के बाद आरक्षण को लागू करवाने के लिए समय सीमा 2029 तय हो जाए. अभी की स्थिति में अधिनियम में इस तरह के प्रावधान हैं कि महिला आरक्षण 2029 में लागू नहीं किया जा सकता है. इसकी वजह यह है कि अभी जनगणना शुरू नहीं हुई है. जनगणना के बाद परिसीमन होगा और उसके बाद ही आरक्षण लागू हो पाएगा, इस प्रक्रिया में आरक्षण 2034 से पहले लागू हो पाएगा, इसकी संभावना बहुत कम है.

वहीं विपक्ष का आरोप है कि सरकार अभी परिसीमन कराकर अपने प्रभाव वाले क्षेत्र यानी उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में लोकसभा की सीट बढ़ाना चाहती है. साथ ही जहां उसका प्रभाव सीमित है यानी दक्षिण के राज्य, वहां सीटें कम कराना चाहती है. विपक्ष इसे संघीय ढांचे पर प्रहार बता रहा है क्योंकि किसी भी राज्य को कम आंकना और किसी को ज्यादा यह संघीय ढांचे और लोकतंत्र दोनों के खिलाफ है. इसी वजह से विपक्ष ने एकजुट होकर मतदान किया जिसकी वजह से बिल पारित नहीं हो पाया.

543 सीटों वाली लोकसभा में क्यों नहीं लागू हो सकता है कोटा?

नरेंद्र मोदी सरकार के 12 साल के कार्यकाल में ऐसा पहली बार हुआ है कि कोई बिल संसद में गिर गया. सबके मन में यह सवाल है कि अगर महिलाओं को आरक्षण देने के लिए दोनों पक्ष सहमत हैं, तो 543 सीटों पर ही आरक्षण क्यों नहीं दिया जा सकता, सीट बढ़ाने की जरूरत क्या है? 2023 में संसद ने महिलाओं को आरक्षण देने के लिए नारी शक्ति वंदन विधेयक को बिना किसी विरोध के पास किया. अबतक यह कानून महिलाओं को आरक्षण का लाभ नहीं दे पाया है, क्योंकि इसके लिए पहले जनगणना का होना जरूरी है. उसके बाद चुनाव क्षेत्रों को फिर से बांटने और फिर से बनाने के लिए डीलिमिटेशन यानी परिसीमन की प्रक्रिया होगी, उसके बाद ही आरक्षण लागू होगा.

विपक्ष का कहना है कि महिला आरक्षण को लागू करने के लिए हमने जनगणना, फिर परिसीमन तब आरक्षण की मांग नहीं की थी. यहां गौर करने वाली बात यह है कि अधिनियम में यही बात है, यानी कि कानूनन आरक्षण तब ही लागू हो सकता है, जब जनगणना का नया आंकड़ा आए. यह अभी संभव नहीं है, क्योंकि जनगणना हुई नहीं है. इस परिस्थिति में सरकार संशोधन लेकर आई थी, ताकि संभवत: पुराने डेटा के आधार पर परिसीमन का काम करा लिया जाता और जब नई जनगणना के आंकड़े आते, तो सबकुछ व्यवस्थित कर लिया जाता. हालांकि सरकार ने संशोधन बिल में इसपर कुछ भी स्पष्ट तौर पर नहीं कहा था. बावजूद इसके विपक्ष ने इसी मुद्दे पर संशोधन का विरोध किया और बिल पारित नहीं हो पाया.

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लेखक के बारे में

Published by: Rajneesh Anand

रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है.पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव रखती हैं. झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाली रजनीश ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की और वर्ष 2000-01 में पत्रकारिता की शुरुआत की. इन्होंने पहली नौकरी झारखंड जागरण दैनिक अखबार में की. उसके बाद इन्होंने प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस तथा दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य संस्करणों में काम करने के बाद वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. रजनीश आनंद की पहचान तथ्यपरक रिपोर्टिंग, गहन शोध और विश्लेषणात्मक लेखन के लिए है. उनकी रुचि राजनीति, सामाजिक सरोकारों, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों में रही है। उन्होंने हमेशा उन मुद्दों को प्राथमिकता दी है जो समाज के हाशिये पर खड़े लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की चर्चा में अपेक्षाकृत कम स्थान पाते हैं. वे कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर विस्तृत अध्ययन और रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान उन्होंने महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर कार्य किया. इसके अतिरिक्त सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत उन्होंने बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की. आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है. हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में भविष्य की चुनौतियों, रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं. उनका मानना है कि ऊर्जा परिवर्तन की प्रक्रिया तभी सफल होगी जब उसमें प्रभावित समुदायों की भागीदारी और हितों को केंद्र में रखा जाए.पत्रकारिता उनके लिए केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने का माध्यम है. जमीनी रिपोर्टिंग, तथ्यों की पड़ताल और जनसरोकारों को केंद्र में रखकर लिखना उनकी कार्यशैली की विशेषता रही है. इसके अतिरिक्त रजनीश आनंद कहानियां और कविताएं लिखने का शौक भी रखती है.

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