विमल इलायची के विज्ञापन पर शाहरुख, अजय और टाइगर को क्यों मिला नोटिस, जानिए क्या है सरोगेट एडवर्टाइजिंग?

विमल इलायची के विज्ञापन को लेकर शाहरुख खान, अजय देवगन और टाइगर श्रॉफ को महाराष्ट्र FDA का नोटिस मिला है. जानिए क्या है सरोगेट एडवर्टाइजिंग और इस मामले में कानून क्या कहता है?

विमल इलायची के विज्ञापन को लेकर महाराष्ट्र FDA ने शाहरुख खान, अजय देवगन और टाइगर श्रॉफ को कारण बताओ नोटिस भेजा है. FDA को आशंका है कि इलायची के नाम पर विमल पान मसाला का प्रचार किया जा रहा है. विज्ञापन में तीनों कलाकार ब्रांड एंडोर्सर के तौर पर शामिल हैं. इस मामले के साथ एक शब्द की काफी चर्चा हो रही है,सरोगेट विज्ञापन. आखिर सरोगेट विज्ञापन क्या होता है और कानून इसे किस नजर से देखता है?

सबसे पहले समझिए, सरोगेट विज्ञापन होता क्या है?

  • सरोगेट विज्ञापन को बहुत आसान तरीके से समझें तो यह किसी ऐसे प्रोडक्ट का घुमाकर विज्ञापन करना है, जिसका सीधे विज्ञापन करने पर कानून रोक लगाता है.
  • मसलन, कोई ब्रांड का पान मसाला या तंबाकू वाला प्रोडक्ट सीधे विज्ञापन नहीं कर सकता. ऐसे में ब्रांड द्वारा उसी नाम से कोई दूसरा प्रोडक्ट, जैसे इलायची, माउथ फ्रेशनर या कोई दूसरी चीज बाजार में दिखाई जाए और उसका विज्ञापन किया जाए और अगर उस विज्ञापन का असली मकसद लोगों के नजर में प्रतिबंधित प्रोडक्ट की ब्रांड पहचान बनाए रखना है, तो मामला सरोगेट विज्ञापन का बन सकता है.
  • यानी सवाल सिर्फ यह नहीं होता कि विज्ञापन में क्या प्रोडक्ट दिखाया गया है, बल्कि यह भी देखा जाता है कि विज्ञापन किस चीज की याद और पहचान उपभोक्ता के दिमाग में छोड़ रहा है.

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भारत में सरोगेट विज्ञापन को लेकर क्या है कानून

  • भारत में सरोगेट विज्ञापन को लेकर सबसे अहम नियम 2022 की भ्रामक विज्ञापनों और एंडोर्समेंट से जुड़ी गाइडलाइन में हैं. इनमें ऐसे विज्ञापन पर रोक है, जिसमें कानून के तहत प्रतिबंधित या सीमित प्रोडक्ट के विज्ञापन पर लगी रोक को किसी दूसरे प्रोडक्ट के जरिए घुमा कर पार करने की कोशिश की जाए.
  • लेकिन सिर्फ किसी प्रतिबंधित प्रोडक्ट से जुड़े ब्रांड नाम का इस्तेमाल हो जाने से कोई विज्ञापन अपने आप सरोगेट नहीं बन जाता. गाइडलाइन के मुताबिक, अगर विज्ञापन में प्रतिबंधित प्रोडक्ट की तरफ कोई सीधा या अप्रत्यक्ष इशारा नहीं है और बाकी नियमों का उल्लंघन भी नहीं हो रहा, तो केवल एक जैसा ब्रांड या कंपनी का नाम होना पर्याप्त नहीं है.
  • नियमों में ब्रांड नाम, लोगो, रंग, लेआउट और विज्ञापन की पूरी प्रस्तुति जैसे पहलुओं को भी देखा जाता है. यानी किसी विज्ञापन को सरोगेट मानने के लिए सिर्फ नाम नहीं, बल्कि यह भी देखना जरूरी है कि उसका कुल संदेश उपभोक्ता तक क्या पहुंचा रहा है.
  • इसी वजह से विमल इलायची के मामले में भी सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि विज्ञापन में इलायची दिखाई गई है. FDA यह देख रहा है कि विज्ञापन की पूरी प्रस्तुति और ब्रांड पहचान कहीं प्रतिबंधित विमल पान मसाला की ओर तो इशारा नहीं करती. फिलहाल यह जांच का विषय है, अंतिम कानूनी निष्कर्ष नहीं.

अब विमल इलायची का मामला समझिए

  • महाराष्ट्र FDA ने हाल में शाहरुख खान, अजय देवगन और टाइगर श्रॉफ को विमल इलायची के विज्ञापन में उनकी भूमिका को लेकर नोटिस भेजा है.
  • FDA का कहना है कि पहली नजर में विज्ञापन की प्रस्तुति और विमल ब्रांड की पहचान को देखते हुए यह जांचने की जरूरत है कि कहीं इसके जरिए महाराष्ट्र में प्रतिबंधित विमल पान मसाला का अप्रत्यक्ष प्रचार तो नहीं हो रहा.
  • यही वजह है कि FDA ने केवल विज्ञापन बंद करने की बात नहीं की, बल्कि अभिनेताओं से उनके एंडोर्समेंट कॉन्ट्रैक्ट, कैंपेन ब्रीफ, भुगतान की जानकारी और विज्ञापन एजेंसी से जुड़े दस्तावेज भी मांगे हैं.
  • FDA ने यह भी कहा है कि तीनों विज्ञापन में आगे भाग न लें और अपने सोशल मीडिया अकाउंट से संबंधित प्रचार सामग्री हटाए. FDA ने तीनों को जवाब देने के लिए 15 दिन का समय दिया है. तय समय में जवाब नहीं मिलने या जवाब संतोषजनक नहीं होने पर आगे की कार्रवाई की जा सकती है.

लेकिन क्या इलायची का विज्ञापन करना गैरकानूनी है?

  • नहीं, सिर्फ इलायची का विज्ञापन करना अपने आप में गैरकानूनी नहीं है.
  • विवाद यह नहीं है कि इलायची बेची जा सकती है या उसका विज्ञापन किया जा सकता है. असली सवाल यह है कि क्या किसी कानूनी प्रोडक्ट के विज्ञापन का इस्तेमाल ऐसे प्रतिबंधित प्रोडक्ट की ब्रांडिंग के लिए किया जा रहा है, जिसका सीधा विज्ञापन कानून के तहत प्रतिबंधित है.
  • इसलिए जांच में विज्ञापन की भाषा, दृश्य, ब्रांड पहचान, बाजार में उस ब्रांड की पहचान और पूरे विज्ञापन का प्रभाव जैसे पहलू महत्वपूर्ण हो सकते हैं.

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कानून के मुताबिक कौन-कौन हो सकता है जिम्मेदार

  • कानून में सिर्फ कंपनी या विज्ञापन बनाने वाली एजेंसी की जिम्मेदारी नहीं है. किसी प्रोडक्ट का एंडोर्समेंट करने वाला व्यक्ति भी कुछ परिस्थितियों में जवाबदेह हो सकता है.
  • उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 और 2022 की गाइडलाइंस भ्रामक विज्ञापनों के मामले में निर्माता, विज्ञापनदाता और एंडोर्सर की भूमिका को अलग-अलग देखती हैं.
  • CCPA यानी केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण भ्रामक विज्ञापन के मामले में पहली बार 10 लाख रुपये तक और दोबारा उल्लंघन पर 50 लाख रुपये तक का जुर्माना लगा सकता है. एंडोर्सर को कुछ समय के लिए विज्ञापन करने से रोका भी जा सकता है.
  • यहां यह समझना जरूरी है कि CCPA की ये शक्तियां भ्रामक विज्ञापनों के मामलों में लागू होने वाली कार्रवाई से जुड़ी हैं. मौजूदा महाराष्ट्र FDA की कार्रवाई को सीधे इसी ₹10 लाख या ₹50 लाख वाली CCPA penalty के रूप में नहीं देखना चाहिए. दोनों की कानूनी भूमिका और कार्रवाई का आधार अलग हो सकता है.
  • हालांकि यहां एक बात साफ समझनी जरूरी है कि नोटिस मिलना दोष साबित होना नहीं है. अभी FDA ने तीनों से जवाब और दस्तावेज मांगे हैं. आगे की कार्रवाई जांच के नतीजे पर निर्भर करेगी.

विमल मामले में पहले भी हो चुका है विवाद ?

  • हां. विमल इलायची को लेकर सरोगेट विज्ञापन का सवाल पहले भी अदालत तक पहुंच चुका है. 2024 में दिल्ली हाई कोर्ट के सामने विमल इलायची के विज्ञापन से जुड़े मामले में यह मुद्दा उठा था कि क्या इसके जरिए तंबाकू उत्पाद का अप्रत्यक्ष प्रचार किया जा रहा है. अदालत ने उस स्तर पर कंपनियों के खिलाफ जारी कार्रवाई पर रोक बरकरार रखी थी.
  • अदालत के सामने मूल सवाल यह भी था कि क्या Vimal जैसे ब्रांड नाम का इस्तेमाल इलायची जैसे दूसरे उत्पाद के विज्ञापन में किया जाना प्रतिबंधित तंबाकू या पान मसाला उत्पाद के अप्रत्यक्ष प्रचार के तौर पर देखा जा सकता है. अदालत ने इस तरह के मामले को तथ्यों और उपलब्ध सबूतों के आधार पर देखने की जरूरत पर जोर दिया था.
  • इसका मतलब यह नहीं है कि अदालत ने हर विमल इलायची विज्ञापन को कानूनी या गैरकानूनी घोषित कर दिया था. बल्कि यह दिखाता है कि किसी विज्ञापन को सरोगेट साबित करने के लिए उनके तथ्यों और परिस्थितियों की जांच जरूरी है.

फिलहाल शाहरुख खान, अजय देवगन और टाइगर श्रॉफ के मामले में यही बात जांच के केंद्र में है. FDA ने नोटिस देकर अपना सवाल सामने रख दिया है. अब तीनों कलाकारों और संबंधित कंपनी को अपने दस्तावेज और जवाब देने हैं. उसके बाद ही यह तय होगा कि मामला सिर्फ एक कानूनी विज्ञापन का है या प्रतिबंधित प्रोडक्ट के अप्रत्यक्ष प्रचार का.

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By गौतम कुमार

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