Gen Z Special: Idea of Shiva ही है भारत की सबसे पुरानी कल्चरल यूनिटी का आधार

प्राचीन भारत को अगर किसी एक विचार ने सबसे अधिक जोड़ा, तो वह राजनीतिक सत्ता नहीं, बल्कि पवित्र भूगोल (Sacred Geography) था. और उस Sacred Geography का सबसे जीवंत प्रतीक Lord Shiva और बारह ज्योतिर्लिंग हैं.

India को सबसे पहले किसने जोडा?

यह सवाल सुनते ही हमारे दिमाग में कुछ नाम आते हैं. चंद्रगुप्त मौर्य, सम्राट अशोक, अकबर या फिर सरदार पटेल. इतिहास की किताबों ने हमें यही सिखाया है कि देश राजाओं, युद्धों और सीमाओं से बनते हैं. लेकिन अगर हम प्राचीन भारत को उसकी अपनी नजर से देखें, तो तस्वीर कुछ और दिखाई देती है.

प्राचीन भारत की सबसे बडी पहचान कोई साम्राज्य नहीं था. न कोई राजधानी, न कोई राजा और न ही कोई स्थायी सीमा. एक राजा जाता था, दूसरा आ जाता था. साम्राज्य बनते थे, बिखर जाते थे.

लेकिन एक चीज थी, जो हजारों वर्षों तक नहीं बदली. वह थी इस भूमि की साझा सांस्कृतिक चेतना. एक ऐसी चेतना, जिसने अलग-अलग भाषाएं बोलने वाले, अलग-अलग भोजन करने वाले और अलग-अलग परंपराओं में जीने वाले लोगों को एक अदृश्य सूत्र में बांध दिया.

अगर उस सूत्र का कोई सबसे सशक्त प्रतीक खोजा जाए, तो वह शायद भगवान शिव हैं.

शिव केवल एक देवता नहीं हैं. वह एक विचार हैं. वह भारत की सांस्कृतिक स्मृति हैं.

वह हिमालय की बर्फ में भी हैं, काशी की गलियों में भी.
वह समुद्र किनारे बसे सोमनाथ में भी हैं और दक्षिण के रामेश्वरम में भी.
वह जंगल के आदिवासी के भी भगवान हैं और वेद पढने वाले ऋषि के भी.

यही कारण है कि शिव का विस्तार किसी एक क्षेत्र, भाषा या समुदाय तक सीमित नहीं रहा. उन्होंने पूरे भारतीय भूगोल को एक जीवित आध्यात्मिक मानचित्र में बदल दिया.

कल सावन का महीना शुरू होने वाला है. लाखों लोग शिव मंदिरों में जल चढाएंगे. कांवड यात्रा निकलेगी. हर हर महादेव की गूंज गांव से लेकर महानगर तक सुनाई देगी. लेकिन क्या हमने कभी रुककर यह सोचा कि आखिर शिव ही क्यों? भारत के सांस्कृतिक मानस में ऐसा क्या है कि हजारों वर्षों बाद भी सावन आते ही पूरा देश जैसे एक ही भाव में बहने लगता है?

इस सवाल का जवाब केवल धर्म में नहीं, बल्कि दर्शन, भूगोल, समाज और मनोविज्ञान में छिपा है.

जब दर्शन नक्शे पर उतर आया

पुराणों में एक प्रसिद्ध कथा आती है.

एक बार ब्रह्मा और विष्णु के बीच यह विवाद छिड गया कि दोनों में श्रेष्ठ कौन है. तभी अचानक उनके सामने अग्नि का एक अनंत स्तंभ प्रकट हुआ. वह इतना विशाल था कि उसका न आदि दिखाई देता था और न अंत.

ब्रह्मा ऊपर की ओर चले कि शायद उसका सिरा मिल जाए. विष्णु नीचे की ओर गए कि शायद उसका आधार मिल जाए. दोनों लौट आए, लेकिन किसी को उसका अंत नहीं मिला. तब उन्हें समझ आया कि यह अग्नि स्तंभ स्वयं शिव हैं, जो अनंत हैं, असीम हैं और किसी सीमा में बंध नहीं सकते.

अगर इस कथा को केवल चमत्कार समझकर पढेंगे, तो उसका आधा अर्थ ही समझ पाएंगे.

असल में यह कहानी हमें एक बहुत गहरी बात बताती है.

मनुष्य हर चीज को मापना चाहता है. वह हर सत्य की सीमा तय करना चाहता है. लेकिन जीवन का अंतिम सत्य सीमाओं से परे है. उपनिषद इसे "ब्रह्म" कहते हैं. वही अनंत चेतना, जिसका न आरंभ है और न अंत.

शिव उसी अनंत का प्रतीक बन जाते हैं.

यही कारण है कि शिव की पूजा किसी मानव आकृति से अधिक लिंग के रूप में होती है. लिंग यहां किसी व्यक्ति का चित्र नहीं, बल्कि उस अनंत चेतना का प्रतीक है, जिसे पूरी तरह देखा या बांधा नहीं जा सकता.

यहीं से ज्योतिर्लिंग की अवधारणा जन्म लेती है.

बारह ज्योतिर्लिंग क्यों?

अगर शिव अनंत हैं, तो फिर उन्हें बारह स्थानों पर क्यों स्थापित किया गया?

यह सवाल बहुत महत्वपूर्ण है.

हमारे पूर्वज केवल मंदिर नहीं बना रहे थे. वे एक सभ्यता का नक्शा तैयार कर रहे थे.

सोचिए...

पश्चिम में सोमनाथ.
उत्तर में केदारनाथ.
मध्य भारत में महाकाल.
पूर्व में वैद्यनाथ.
दक्षिण में रामेश्वरम.

इन मंदिरों को अगर भारत के नक्शे पर देखें, तो वे किसी संयोग से नहीं बने दिखाई देते. वे पूरे उपमहाद्वीप को एक सांस्कृतिक वृत्त में बांध देते हैं.

आज हम कहते हैं कि देश सडकों, रेल और इंटरनेट से जुडता है.

लेकिन हजारों साल पहले भारत तीर्थयात्राओं से जुडता था.

तमिलनाडु का श्रद्धालु केदारनाथ जाता था.
काशी का साधु सोमनाथ पहुंचता था.
गुजरात का व्यापारी रामेश्वरम जाता था.
महाराष्ट्र का संत श्रीशैलम की यात्रा करता था.

इन यात्राओं ने केवल लोगों को मंदिरों तक नहीं पहुंचाया. उन्होंने लोगों को एक-दूसरे तक पहुंचाया.

यही भारत का सबसे पुराना सांस्कृतिक नेटवर्क था.

मंदिर केवल पूजा की जगह नहीं थे

आज जब हम किसी मंदिर में जाते हैं, तो अक्सर उसे केवल पूजा का स्थान मानते हैं.

लेकिन प्राचीन भारत में मंदिर उससे कहीं अधिक थे.

वे विश्वविद्यालय थे.
वे कला केंद्र थे.
वे संगीत के विद्यालय थे.
वे समाज को जोडने वाले सार्वजनिक स्थल थे.
वे यात्रियों के विश्राम स्थल थे.
वे व्यापारिक मार्गों के केंद्र थे.
और सबसे महत्वपूर्ण...
वे दर्शन को आम लोगों तक पहुंचाने का माध्यम थे.

उपनिषदों का दर्शन हर व्यक्ति नहीं पढ सकता था.

लेकिन हर व्यक्ति मंदिर जा सकता था.

हर व्यक्ति कथा सुन सकता था.

हर व्यक्ति जल चढा सकता था.

हर व्यक्ति ॐ नमः शिवाय बोल सकता था.

यही भारतीय सभ्यता की सबसे बडी ताकत थी.

उसने सबसे गहरे दर्शन को सबसे सरल अनुभव में बदल दिया.

ज्ञान केवल ग्रंथों में नहीं रहा.

वह यात्रा बन गया.
वह पर्व बन गया.
वह मंदिर बन गया.
वह लोकगीत बन गया.

और धीरे-धीरे वह लोगों के जीवन का हिस्सा बन गया.

जब मंदिर, भारत की पहली यूनिवर्सिटी बने

बारह ज्योतिर्लिंगों को केवल बारह मंदिर मान लेना, शायद उनकी सबसे छोटी पहचान है. असल में वे बारह अलग-अलग जीवन दर्शन हैं. भारत के प्राचीन मनीषियों ने दर्शन को केवल ग्रंथों तक सीमित नहीं रखा. उन्होंने उसे धरती पर उतार दिया. पहाड़, नदियां, जंगल, समुद्र और नगर, सबको आध्यात्मिक अर्थ दे दिया. यही कारण है कि भारत में तीर्थ केवल किसी भवन का नाम नहीं है, बल्कि एक पूरी यात्रा का नाम है.

आज हम किसी जगह तक पहुंचने के लिए गूगल मैप खोलते हैं. लेकिन हजारों साल पहले भारत का नक्शा तीर्थयात्राओं ने बनाया था. एक यात्री जब अपने गांव से निकलता था, तो वह केवल मंदिर देखने नहीं जाता था. वह भारत को देखने निकलता था. रास्ते में नई भाषा सुनता, अलग भोजन चखता, दूसरी परंपराओं को समझता और फिर अपने गांव लौटकर वह केवल यात्री नहीं रहता था, बल्कि एक चलता-फिरता सांस्कृतिक सेतु बन जाता था.

शायद इसी कारण भारत में तीर्थयात्रा को 'यात्रा' नहीं, 'तीर्थ' कहा गया. क्योंकि वहां पहुंचने से पहले ही मनुष्य बदलना शुरू हो जाता है.

सोमनाथ जाने वाला व्यक्ति समुद्र की अनंत लहरों के सामने खड़ा होकर समझता था कि समय कितना विशाल है. केदारनाथ पहुंचने वाला यात्री हिमालय की नीरवता में अपने अहंकार को पिघलता हुआ महसूस करता था. काशी में खड़ा व्यक्ति मृत्यु को जीवन का अंत नहीं, बल्कि एक और यात्रा की शुरुआत मानना सीखता था. रामेश्वरम यह याद दिलाता था कि भगवान राम जैसे आदर्श भी शिव के सामने झुकते हैं. यह झुकना हार नहीं, बल्कि विनम्रता का सबसे ऊंचा रूप है.

यही कारण है कि हर ज्योतिर्लिंग केवल पूजा का स्थान नहीं, बल्कि जीवन का एक अध्याय है.

शिव केवल देवता नहीं, भारतीय मन के सबसे बड़े प्रतीक हैं

अगर विष्णु व्यवस्था का प्रतीक हैं और ब्रह्मा सृजन का, तो शिव विरोधाभासों के बीच संतुलन का प्रतीक हैं. शायद दुनिया के किसी भी देवता का व्यक्तित्व इतना बहुआयामी नहीं है.

भारत की सबसे बड़ी खोज थी - पवित्र भूगोल

हम अक्सर कहते हैं कि भारत विविधताओं का देश है. लेकिन शायद उससे भी बड़ा सत्य यह है कि भारत विविधताओं को जोड़ने वाली सभ्यता है.

जरा सोचिए...

कश्मीर का एक साधु रामेश्वरम जाता है. तमिलनाडु का एक श्रद्धालु केदारनाथ जाता है. महाराष्ट्र का वर्करी काशी जाता है. गुजरात का व्यापारी उज्जैन जाता है. रास्ते अलग हैं, भाषाएं अलग हैं, लेकिन अंतिम पुकार एक ही है - 'हर हर महादेव.'

यहीं भारत की सबसे बड़ी सांस्कृतिक कल्पना दिखाई देती है.

प्राचीन भारत ने कभी यह नहीं कहा कि एक भाषा बोलो, तभी एक रहोगे. उसने यह भी नहीं कहा कि एक राजा के अधीन रहो, तभी एक राष्ट्र बनोगे. उसने लोगों को यात्राओं से जोड़ा, स्मृतियों से जोड़ा और साझा आस्था से जोड़ा.

यही "Sacred Geography" है, जिसे आधुनिक विद्वान पवित्र भूगोल कहते हैं.

इस पवित्र भूगोल में पहाड़ केवल पत्थर नहीं हैं. वे तपस्या हैं. नदियां केवल जलधारा नहीं हैं. वे मां हैं. जंगल केवल पेड़ों का समूह नहीं हैं. वे ऋषियों की प्रयोगशाला हैं. समुद्र केवल पानी नहीं है. वह अनंत का अनुभव है.

और इन सबके बीच शिव हैं, जो हर जगह एक अलग रूप में उपस्थित हैं.

इसलिए कैलाश आज भी भारत की आत्मा का हिस्सा है

एक रोचक बात है.

हिंदू परंपरा का सबसे पवित्र पर्वत कैलाश आज भारत की राजनीतिक सीमा में नहीं है.

फिर भी हर शिवभक्त उसे अपना मानता है.

क्यों?

क्योंकि प्राचीन भारत की कल्पना आधुनिक राष्ट्र-राज्य जैसी नहीं थी. उसकी सीमाएं केवल राजनीतिक नहीं थीं. जहां-जहां उसकी स्मृतियां थीं, जहां-जहां उसके ऋषियों की कथाएं थीं, जहां-जहां उसकी यात्राएं जाती थीं, वहीं तक उसका सांस्कृतिक संसार फैला हुआ था.

इसीलिए नेपाल का पशुपतिनाथ, पाकिस्तान का कटासराज, तिब्बत का कैलाश और श्रीलंका का रामायण परंपरा से जुड़ा भूभाग, सब भारतीय सांस्कृतिक स्मृति का हिस्सा बने रहे.

यह विस्तार किसी सेना ने नहीं किया था.
यह विस्तार किसी साम्राज्य ने नहीं किया था.
यह विस्तार यात्रियों, संतों, कथाकारों, व्यापारियों और भक्तों ने किया था.
सभ्यताएं अक्सर तलवार से फैलती हैं.
भारतीय सभ्यता कथा से फैली.

आज के युवा को शिव की सबसे ज्यादा जरूरत क्यों है?

अगर आज का कोई युवा भगवान शिव को केवल एक धार्मिक प्रतीक मानता है, तो शायद वह शिव की सबसे बडी पहचान से अभी परिचित नहीं हुआ है. शिव केवल पूजा के देवता नहीं हैं. वह जीवन को देखने का एक नजरिया हैं. शायद इसी कारण हजारों साल बाद भी शिव उतने ही प्रासंगिक हैं, जितने वैदिक काल में थे.

आज का समय अभाव का नहीं, बल्कि अधिकता का समय है. जानकारी बहुत है, लेकिन शांति कम है. दोस्त बहुत हैं, लेकिन संवाद कम है. सोशल मीडिया पर हजारों चेहरे हैं, लेकिन अपने भीतर झांकने का समय नहीं है. हर दिन तुलना है, प्रतियोगिता है, खुद को साबित करने की बेचैनी है. ऐसे समय में शिव का व्यक्तित्व हमें एक बिल्कुल अलग रास्ता दिखाता है.

शिव कैलाश पर बैठे हैं. उनके पास न महल है, न सिंहासन, न सोने का मुकुट. वह प्रकृति के बीच रहते हैं. उनका वैभव बाहरी नहीं, भीतरी है. वह बताते हैं कि जीवन की सबसे बडी शक्ति संग्रह में नहीं, बल्कि संतुलन में है. आधुनिक भाषा में कहें, तो शिव हमें यह सिखाते हैं कि व्यक्ति की पहचान उसके पास क्या है, इससे नहीं, बल्कि वह भीतर से कितना स्थिर है, इससे बनती है.

शिव के पूरे स्वरूप को ध्यान से देखिए.

उनके शरीर पर भस्म है. इसका अर्थ केवल वैराग्य नहीं है. यह हमें हर दिन याद दिलाती है कि शरीर, पद, धन, प्रसिद्धि और अहंकार सब एक दिन मिट जाने वाले हैं. इसलिए सफलता का आनंद लीजिए, लेकिन उसके अहंकार में मत डूबिए. असफलता से सीखिए, लेकिन उससे टूटिए मत. भस्म जीवन की नश्वरता का प्रतीक है और यही बोध मनुष्य को विनम्र बनाता है.

उनके गले में सांप है.

सामान्य मनुष्य सांप को देखकर डर जाता है, लेकिन शिव उसे आभूषण की तरह धारण करते हैं. यह संदेश है कि भय को समाप्त करना जरूरी नहीं, बल्कि उस पर नियंत्रण पाना जरूरी है. जीवन में डर हमेशा रहेगा, लेकिन जो अपने डर को नियंत्रित कर लेता है, वही आगे बढ़ता है.

उनके मस्तक पर चंद्रमा है.

चंद्रमा भारतीय दर्शन में मन का प्रतीक माना गया है. शिव उसे अपने सिर पर धारण करते हैं. मानो कह रहे हों कि मन आपका स्वामी नहीं होना चाहिए. मन को अपने ऊपर मत बैठने दीजिए, उसे अपने नियंत्रण में रखिए. आज जब मानसिक तनाव, चिंता और अवसाद तेजी से बढ़ रहे हैं, तब शिव का यह प्रतीक पहले से कहीं अधिक अर्थपूर्ण हो जाता है.

फिर आती है समुद्र मंथन की कथा. जब देवताओं और असुरों ने समुद्र मथा, तो सबसे पहले विष निकला. कोई उसे स्वीकार करने को तैयार नहीं था. तब शिव ने वह विष पी लिया और उसे अपने कंठ में रोक लिया। इसी कारण वह नीलकंठ कहलाए.

इस कथा का अर्थ केवल धार्मिक नहीं है.

यह समाज और व्यक्ति, दोनों के लिए गहरा संदेश है. जीवन में कटुता आएगी... आलोचना होगी... अन्याय होगा... क्रोध भी आएगा... लेकिन हर विष को समाज में फैला देना समाधान नहीं है. शिव सिखाते हैं कि नकारात्मकता को अपने विवेक से रोकना भी तपस्या है. आज जब सोशल मीडिया पर एक कटु शब्द हजारों लोगों तक पहुंच जाता है, तब नीलकंठ का यह संदेश पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हो जाता है.

सावन केवल पूजा का महीना नहीं, आत्ममंथन का समय है

शायद यही कारण है कि सावन का महीना भारतीय जीवन में केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं रहा. बारिश के साथ धरती हरी हो जाती है. नदियां भर जाती हैं. खेतों में नई फसल की उम्मीद जागती है. प्रकृति जैसे नया जीवन लेती है.

इसी समय मनुष्य भी अपने भीतर झांकने का प्रयास करता है.

सावन हमें रुकना सिखाता है. यह महीना केवल जल चढाने का नहीं, बल्कि अपने भीतर के अहंकार, क्रोध, ईर्ष्या और अशांति को धोने का भी है. कांवड़ यात्रा केवल पैदल चलने की यात्रा नहीं है. यह धैर्य, अनुशासन और सामूहिकता का अभ्यास भी है. हजारों लोग बिना किसी पहचान के एक ही उद्देश्य से चलते हैं. वहां न जाति पूछी जाती है, न भाषा. केवल एक उद्घोष सुनाई देता है - बोल बम.

यही भारतीय सभ्यता की सबसे बडी विशेषता रही है. उसने आध्यात्मिक अनुभव को सामूहिक अनुभव बना दिया.

भारत की सबसे बडी खोज क्या थी?

अगर कोई पूछे कि प्राचीन भारत ने दुनिया को सबसे अनोखी क्या चीज दी, तो उत्तर केवल योग, आयुर्वेद या शून्य नहीं होगा. उसने एक और अद्भुत काम किया.

उसने दर्शन को भूगोल में बदल दिया.

उसने नदियों को केवल जलधारा नहीं रहने दिया, बल्कि मां बना दिया. पहाड़ों को केवल चट्टान नहीं रहने दिया, बल्कि तपस्या का प्रतीक बना दिया. जंगलों को आश्रम बना दिया. यात्राओं को साधना बना दिया. और मंदिरों को केवल पूजा का स्थान नहीं, बल्कि समाज, संस्कृति, कला, शिक्षा और दर्शन का केंद्र बना दिया.

बारह ज्योतिर्लिंग इसी अद्भुत कल्पना का सबसे सुंदर उदाहरण हैं.

वे भारत के अलग-अलग हिस्सों में बने बारह मंदिर भर नहीं हैं. वे बारह दीपस्तंभ हैं, जिन्होंने सदियों तक इस भूमि को एक साझा सांस्कृतिक चेतना में बांधे रखा. कोई राजा इतना लंबा नहीं चला, जितनी लंबी यह परंपरा चली. कोई साम्राज्य इतना स्थायी नहीं रहा, जितनी स्थायी यह स्मृति रही.

शिव और प्राचीन भारत की सबसे बडी विरासत

आज जब हम सावन में किसी शिव मंदिर के सामने खड़े होते हैं, तो हम केवल एक धार्मिक परंपरा का हिस्सा नहीं बनते. हम अनजाने में हजारों वर्षों पुरानी उस सभ्यतागत यात्रा से जुड़ जाते हैं, जिसने भारत को एक साझा सांस्कृतिक परिवार बनाया.

सोमनाथ से केदारनाथ तक, महाकाल से काशी तक, रामेश्वरम से वैद्यनाथ तक, हर ज्योतिर्लिंग एक ही संदेश देता है - सत्य सीमाओं में नहीं बंधता, चेतना का कोई भूगोल नहीं होता, लेकिन भूगोल को चेतना से जोड़ा जा सकता है.

शायद यही कारण है कि भारत को समझना केवल उसके इतिहास को समझना नहीं है. भारत को समझना उसकी यात्राओं, उसकी नदियों, उसके पर्वों, उसके मंदिरों और उसकी स्मृतियों को समझना है.

सावन हर वर्ष आता है और चला जाता है. लेकिन वह हर बार एक प्रश्न छोड़ जाता है.

क्या शिव केवल मंदिर में हैं?

या फिर वह हर उस व्यक्ति में हैं, जो अपने भीतर के अहंकार को जीतने का प्रयास कर रहा है...
हर उस यात्री में, जो स्वयं को खोजने निकला है...
और हर उस समाज में, जो विविधताओं के बीच भी एकता का मार्ग खोज लेता है.
शायद इसी प्रश्न का उत्तर प्राचीन भारत ने हजारों वर्ष पहले दे दिया था.

भारत की सबसे बडी शक्ति उसके साम्राज्य नहीं थे. उसकी सबसे बडी शक्ति उसकी सभ्यता थी। और उस सभ्यता की सबसे उज्ज्वल ज्योति, भगवान शिव और उनके ज्योतिर्लिंग थे.

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लेखक के बारे में

By अचल प्रियदर्शी

अचल प्रियदर्शी (Achal Priyadarshy) अंतरराष्ट्रीय संबंधों, इंडिक एवं इंडीजीनस अध्ययन के जानकार, शिक्षाविद् और 32 पुस्तकों के लेखक हैं.

उन्होंने केंद्रीय मंत्री के राजनीतिक सहायक के तौर पर काम किया है, तथा ट्राइबल रिसर्च इंस्टीट्यूट (TRI)- रांची और झारखंड सरकार के वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन विभाग (DoFECC) के साथ भी कार्य किया है.

उन्होंने सैकड़ों UPSC अभ्यर्थियों का मार्गदर्शन किया है, और अंतरराष्ट्रीय संबंधों व समसामयिक विषयों पर उनके विश्लेषणात्मक लेख नियमित रूप से UPSC-केंद्रित पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहे हैं.

साहित्य और जनजातीय इतिहास में उनके योगदान को मान्यता देते हुए उन्हें वर्ष 2025 में आयोजित जमशेदपुर लिटरेचर फेस्टिवल के उद्घाटन संस्करण में उनकी पुस्तक Tribal Bravehearts के लिए शब्द-शिल्पी सम्मान से सम्मानित किया गया. शैक्षणिक रूप से, उन्होंने हार्वर्ड डिविनिटी स्कूल से Religion, Peace and Conflict विषय में अध्ययन किया है.

ये उनकी कुछ लोकप्रिय किताबें हैं;

  1. Pakistan State, Armed Influenconomy (प्रभात प्रकाशन) (2026)

  2. बिहार जनादेश 2025 (प्रभात प्रकाशन) (2026)

  3. International Relations: UPSC & State Civil Services Examinations (Oakbridge Publishing) (2026)

  4. ब्रांड हेमंत (स्वतंत्र प्रकाशन) (2025)

  5. झारखण्ड की जनजाति समाज और समय का संकट (प्रकाशन संसथान) (2026)

  6. जनजातीय शूरवीर (प्रभात प्रकाशन) (2026)

  7. Know Your State: Jharkhand (अरिहंत प्रकाशन) (2025)

  8. उत्तर प्रदेश सामान्य ज्ञान (क्राउन पुब्लिकेशन्स) (2024)

  9. बिहार सामान्य ज्ञान (उपकार प्रकाशन) (2024)

  10. International Relations for UPSC Mains (Pratiyogita Darpan) (2024)

  11. Internal Security & Disaster Management for UPSC Mains (Pratiyogita Darpan) (2024)

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