28 जून को जंतर-मंतर पर शुरू हुआ छात्रों और युवाओं का आंदोलन अब नए स्वरूप में दिख रहा है. नीट पेपर लीक, शिक्षा व्यवस्था में सुधार और केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर शुरू हुआ यह आंदोलन अब राजनीतिक मुद्दा बन गया है. सोमवार को हुए प्रदर्शन के दौरान हुई पुलिस कार्रवाई से इस आंदोलन को और व्यापक चर्चा मिली है. मंगलवार को जंतर-मंतर पर प्रदर्शनकारियों की भीड़ जस की तस बनी रही, वहीं इस मुद्दे को लेकर विपक्षी दल भी सड़कों पर उतर आए.
संसद में विपक्ष द्वारा इस मुद्दे को उठाने और राहुल गांधी के नेतृत्व में प्रधानमंत्री आवास पर मंगलवार को हुए प्रदर्शन के चलते इसकी तस्वीर अब बदलती दिखाई दे रही है. ऐसे में इस सवाल का होना लाजमी है कि कैसे यह आंदोलन अब केवल छात्रों और युवाओं तक सीमित नहीं रहकर, राष्ट्रीय राजनीति का बड़ा मुद्दा बनता जा रहा है. इस लेख में हम पांच अहम सवालों के जरिए इसे समझने की कोशिश करेंगे कि आखिर इस आंदोलन का स्वरूप कैसे बदला और आने वाले दिनों में इसका असर कितना व्यापक हो सकता है.
पुलिस कार्रवाई के बाद कैसे और बड़ा दिखने लगा आंदोलन?
दरअसल, पहले से तय कार्यक्रम के अनुसार CJP ने मानसून सत्र के पहले दिन, यानी 20 जुलाई को 'संसद चलो मार्च' का ऐलान किया था. सोनम वांगचुक के नेतृत्व में होने वाले इस मार्च से पहले सरकार ने उन्हें जंतर-मंतर से सफदरगंज अस्पताल में भर्ती कर दिया. सरकार के इस फैसले के चलते देश भर ऐसे छात्र और युवा जो अब तक इस आंदोलन से अलग थे, वो भी जुड़ गए. दरअसल यह भीड़ उस कैंपेन का हिस्सा थी. जिसकी शूरुआत काफी पहले हो गया थी. मीडिया रिपोर्ट में दावा किया गया कि यह भीड़ महीनों से सोशल मीडिया पर चल रहे एक बहुत ही सोचे-समझे और व्यवस्थित डिजिटल कैंपेन का परिणाम थी और जब CJP ने दिल्ली में 'चलो संसद' मार्च के लिए 20 जुलाई 2026 की तारीख का ऐलान किया, तो उन्होंने इसी डेटाबेस का उपयोग किया.
दरअसल मई 2026 में जब अभिजीत दीपके ने एक्स और इंस्टाग्राम पर एक सैटायर (व्यंग्य) के रूप में कॉकरोच जनता पार्टी का पेज बनाया तो भले ही यह सिर्फ एक इंटरनेट मीम जैसा लग रहा हो, लेकिन अभिजीत और उनकी कोर टीम इसे एक संगठित डेटाबेस में बदलने की तैयारी कर रहे थे.
डिजिटल कैंपेन के दौरान CJP के फाउंडर अभिजित दीपके ने एक गूगल फॉर्म भरवाए थे, जिसके जरिए उनके पास सारी जानकारी आई थी. जो बाद में पुलिस की कार्रवाई के बाद और बड़ा हो गया. प्रदर्शन में शामिल होने के लिए, दिल्ली के जंतर-मंतर और आसपास के इलाकों में देश के अलग-अलग राज्यों से छात्र और युवा पहुंच गए. आंदोलन में शामिल लोगों की वास्तविक संख्या को लेकर अलग-अलग दावे किए गए. आयोजकों ने बड़ी भीड़ का दावा किया,हालांकि प्रशासन की ओर से कोई आधिकारिक आंकड़ा जारी नहीं किया गया.
प्रदर्शन को संसद की ओर बढ़ने से रोकने के लिए दिल्ली पुलिस ने व्यापक सुरक्षा व्यवस्था की थी. कई जगह बैरिकेडिंग के साथ-साथ अतिरिक्त पुलिस बल और रैपिड एक्शन फोर्स (RAF) तैनात की गई थी. मार्च के दौरान पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़प हुई, जिसके बाद आंसू गैस के गोले छोड़े गए और पुलिस के तरफ से लाठीचार्ज भी की गई. घटना के बाद दोनों पक्षों ने एक-दूसरे पर हिंसा शुरू करने का आरोप लगाया. प्रदर्शनकारियों का आरोप था कि शांतिपूर्ण मार्च को बल प्रयोग से रोका गया, जबकि दिल्ली पुलिस का कहना था कि प्रदर्शनकारियों ने बैरिकेड तोड़ने और सुरक्षा व्यवस्था भंग करने की कोशिश की. इसलिए स्थिति को नियंत्रित करने के लिए कार्रवाई की गई. भारी संख्या में जुटी भीड़ को लेकर पुलिस और सरकार के हवाले से मीडिया रिपोर्ट में दावा किया गया उन्हें इसकी उम्मीद नहीं थी.
सोशल मीडिया ने CJP आंदोलन को कैसे बनाया राष्ट्रीय चर्चा का विषय?
अब जानते है कि कैसे यह आंदोलन राष्ट्रीय चर्चा का विषय बना दरअसल, CJP आंदोलन की सबसे बड़ी ताकत उसकी डिजिटल मौजूदगी है. यह उसे सीधे उन लोगों से जोड़ता है जो इस आंदोलन के केंद्र में हैं. इसलिए भी कुछ ही हफ्तों में यह अभियान सोशल मीडिया के जरिए एक ऑनलाइन मुहिम से निकलकर राष्ट्रीय बहस का हिस्सा बन गया. इंस्टाग्राम, एक्स और यूट्यूब जैसे प्लेटफॉर्म पर लगातार वायरल हो रहे वीडियो और पोस्ट ने इस आंदोलन को उन लोगों तक पहुंचा दिया, जो पहले इससे जुड़े नहीं थे.
आंदोलन की शुरुआत में इसकी पहचान व्यंग्य और मीम कंटेंट से जरूर थी, लेकिन 'कॉकरोच' शब्द को प्रतीक बनाकर तैयार किए गए पोस्ट और वीडियो युवाओं के बीच तेजी से वायरल होने लगा.इसका नतीजा हुआ कि आंदोलन का फोकस केवल डिजिटल कैंपेन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह परीक्षा सुधार, कथित पेपर लीक, बेरोजगारी और शिक्षा व्यवस्था जैसे मुद्दों को लेकर सरकार को धेरने का नया हथियार बन गया और यही वह कारण है जिसके चलते बड़ी संख्या में प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे छात्र और उनके परिवार इससे आंदोलन से जुड़ने लगे. 'चलो संसद' मार्च के दौरान पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच जो झड़प हुई, उसका वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल होने लगा, इसका नतीजा हुआ कि इन वायरल क्लिप्स ने आंदोलन को राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बना दिया.
मांग क्या है और लोग क्यों जुड़ रहे हैं?
सरकार और प्रशासन ऐसा मानकर चल रहे थे कि इस आंदोलन में ज्यादा लोग नहीं आएंगे. लेकिन 20 जुलाई को संसद पथ पर जुटी भीड़ ने उनके अनुमान को गलत साबित कर दिया. हालांकि मानसून सत्र के चलते पुलिस ने सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत रखा था. लेकिन फिर भी यह उस भीड़ के सामने कम लग रही थी, इसलिए पुलिस ने भीड़ को काबू करने करने के लिए कार्रवाई की, जो बैकफायर कर गया. सोमवार को पुलिस कार्रवाई के बावजूद आंदोलन की रफ्तार धीमी नहीं हुई.
अगले दिन 21 जुलाई को भी जंतर-मंतर पर बड़ी संख्या में छात्र और युवा पहुंच गए. इस दौरान कई प्रदर्शनकारियों ने बताया कि वे संसद मार्च के दौरान हुई पुलिस कार्रवाई के वीडियो सोशल मीडिया पर देखने के बाद आए. वहीं कुछ ऐसे युवा भी धरना स्थल पर नजर आए, जो सोमवार की झड़प में घायल होने के बावजूद दोबारा प्रदर्शन में शामिल होना चाहते थे. मतलब की पुलिस कार्रवाई आंदोलन को रोकने के बजाय उसे और अधिक चर्चा का विषय बना गई. आंदोलन की एक और खास बात यह थी कि इसमें अलग लोग शामिल. धरना स्थल पर केवल छात्र ही नहीं, बल्कि प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे अभ्यर्थी, उनके अभिभावक, नौकरी की तैयारी कर रहे युवा और अलग-अलग सामाजिक पृष्ठभूमि के लोग भी मौजूद थे. शुरुआती दिनों में जहां सामाजिक कार्यकर्ताओं की मौजूदगी अधिक थी, वहीं बाद के दिनों में आंदोलन का केंद्र छात्रों और युवाओं की भागीदारी बन गया.
आंदोलन की सबसे बड़ी ताकत है, इसकी मांगें. प्रदर्शनकारी केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे, परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता और सुधार, पेपर लीक की घटनाओं पर सख्त कार्रवाई तथा भर्ती और प्रवेश परीक्षाओं में जवाबदेही की मांग कर रहे हैं.
ये ऐसे मुद्दे हैं जिनका सीधा संबंध करोड़ों छात्रों और उनके परिवारों से है. यही वजह है कि आंदोलन को केवल किसी एक संगठन तक सीमित होकर, व्यापक छात्र असंतोष की अभिव्यक्ति के रूप में भी देखा जा रहा है. हालांकि, यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि यह कितना सामाजिक या राजनीतिक तौर पर व्यापक स्वरूप ले पाएगा. लेकिन फिलहाल इतना स्पष्ट है कि परीक्षा व्यवस्था और रोजगार से जुड़े मुद्दों ने बड़ी संख्या में युवाओं को एक साझा मंच पर लाने का काम किया है.
छात्रों की समस्या कैसे बनी राजनीतिक मुद्दा?
शुरुआत में CJP आंदोलन की छवि एक छात्र और युवा आंदोलन के तौर पर थी। इसकी मुख्य मांगें उन विषयों से जुड़े थे जो सीधे तौर पर छात्र और युवा के मुद्दे थे. लेकिन जैसे-जैसे आंदोलन का विस्तार होता गया, यह सड़क से निकलकर संसद और फिर राष्ट्रीय राजनीति तक पहुंच गया. हालंकि जानकार इसकी एक बड़ी वजह संसद का मानसून सत्र को भी मानते हैं. कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस समेत कई विपक्षी दलों ने सरकार से इस मुद्दों को लेकर सदन में चर्चा की मांग की.
20 जुलाई को 'चलो संसद' मार्च के दौरान पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच हुई झड़प को लेकर विपक्षी सरकार को कटघरे में ला कार्रवाई की मांग करने लगे. अगले दिन (21 जुलाई) राहुल गांधी, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और प्रियंका गांधी समेत कई विपक्षी नेताओं ने प्रधानमंत्री आवास के सामने प्रदर्शन किया.
इस दौरान दिल्ली पुलिस द्वारा विपक्षी नेताओं को हिरासत में लिए जाने की घटनाओं ने भी इस मुद्दे को राष्ट्रीय सुर्खियों में बनाए रखा. आम आदमी पार्टी सहित कई अन्य विपक्षी दलों के नेताओं ने भी आंदोलन के प्रति समर्थन जताया और कुछ नेता जंतर-मंतर पहुंचे, जबकि कई ने सोशल मीडिया और प्रेस कॉन्फ्रेंस के जरिए प्रदर्शनकारियों के पक्ष में बयान दिए. कुल मिलाकर छात्रों और युवाओं के इस आंदोलन को विपक्ष का राजनीतिक समर्थन मिलने लगा और विपक्षी पार्टी अपना हित साधने लगी. इन घटनाक्रमों के बाद यह आंदोलन केवल परीक्षा सुधार तक सीमित नहीं रहा, बल्कि शिक्षा, रोजगार, युवाओं की नाराजगी और सरकार की प्रतिक्रिया जैसे व्यापक राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बन गया.
फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि यह आंदोलन कितना लंबा चलेगा या सरकार पर कितना दबाव बना पाएगा.लेकिन इतना साफ है कि परीक्षा सुधार से शुरू हुआ यह आंदोलन अब शिक्षा, रोजगार और युवाओं की राजनीति से जुड़े बड़े विमर्श में बदल चुका है. आने वाले दिनों में सरकार की रणनीति और विपक्ष की सक्रियता तय करेगी कि यह आंदोलन केवल एक विरोध प्रदर्शन बनकर रह जाता है या राष्ट्रीय राजनीति का स्थायी मुद्दा बनता है.
ये भी पढ़ें : सत्ता को ललकारने की पुरानी राह पर CJP, जानिए कब-कब सड़क के शोर से गूंजी संसद?
