Shubhanshu Shukla : क्या है अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन, जहां 18 दिन गुजार कर लौटे हैं शुभांशु शुक्ला?

Shubhanshu Shukla : भारतीय अंतरिक्ष यात्री शुभांशु शुक्ला पूरे 18 दिन बाद धरती पर लौट आए हैं. उन्होंने कुल 18 दिन अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन पर गुजारा. वे पहले भारतीय हैं, जो अंतरिक्ष स्टेशन पर गए. अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन वैश्विक सहयोग की मिसाल है, जिसके जरिए अंतरिक्ष के रहस्यों को जानने के लिए प्रयोग किए जाते हैं. इस स्टेशन को बनाने में भारतीयों की प्रत्यक्ष भूमिका तो नहीं है, लेकिन नासा और यूरोपियन स्पेस एजेंसी में का करने वाले वैज्ञानिकों ने अहम भूमिका निभाई है.

Shubhanshu Shukla : एक्सिओम-4 मिशन पर गए भारत के अंतरिक्ष यात्री शुभांशु शुक्ला मंगलवार को लौट आए. उनका ड्रैगन कैप्सूल अमेरिका के कैलिफोर्निया में सैन डिएगो समुद्र तट पर सफलतापूर्वक लैंड हुआ. शुभांशु शुक्ला की वापसी से देश में खुशी है. उनके परिजन तो खुशी से रो पड़े हैं. शुभांशु शुक्ला पूरे 18 दिन अंतरिक्ष में गुजारने के बाद पृथ्वी पर वापस लौटे है. शुभांशु शुक्ला और उनके साथी अंतरिक्ष यात्रियों ने अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन पर समय गुजारा और कई परीक्षण भी किए. क्या आप जानते हैं कि अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (International Space Station) क्या है?

क्या है अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन

अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन वैश्विक सहयोग का एक जीता जागता उदाहरण है, जहां विज्ञान और अंतरराष्ट्रीय से जुड़ी जानकारियों को एकत्र करने के लिए विश्व एक साथ खड़ा है. इसकी शुरुआत के बीज वर्ष 1984 में पड़े थे जब अमेरिका के राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन ने नासा (NASA) को निर्देश दिया कि वह एक स्थायी मानवयुक्त अंतरिक्ष स्टेशन बनाने की की योजना बनाए. हालांकि उस वक्त यह संभव नहीं हो पाया था, लेकिन अंतरिक्ष में शोध और तकनीकी प्रयोग करना के लिए ऐसा स्टेशन हो इसकी सोच पनप चुकी थी. 1998 में वैश्विक सहयोग से अंतरिक्ष स्टेशन की स्थापना हुई. अमेरिका के नासा,रूस के Roscosmos, यूरोपियन स्पेस एजेंसी के ESA, जापान के JAXA और कनाडा के CSA के सहयोग से अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन की स्थापना हुई है.अंतरिक्ष स्टेशन के निर्माण की शुरुआत 20 नवंबर 1998 तब हुई जब रूस ने पहला मॉड्यूल Zarya (Sunrise) को कक्षा में भेजा. उसके बाद अमेरिका ने अपना मॉड्यूल Unity भेजा, जिससे ISS का ढांचा बनना शुरू हुआ.

अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन के निर्माण में प्रमुख भागीदार देश

देशस्पेस एजेंसी
अमेरिकाNASA
रूसRoscosmos
जापानJAXA
कनाडाCSA
यूरोपीय देशESA

कैसा है अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन


अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन 400 टन से अधिक वजन का है. यह 109 मीटर लंबा है. यह स्टेशन पृथ्वी की निचली कक्षा में स्थित एक विशाल अंतरिक्ष यान है. इसका उपयोग अनुसंधान प्रयोगशाला के रूप में किया जाता है. यह पृथ्वी से लगभग 400 किलोमीटर ऊपर स्थित है और हर 90 मिनट में पृथ्वी की एक परिक्रमा करता है. अबतक इस स्टेशन से कई लैबोरेटरी और डॉकिंग स्टेशन जोड़े गए हैं और परीक्षण किए जा रहे हैं. निर्माण के बाद से अबतक यहां 250 से अधिक अंतरिक्ष यात्री रह चुके हैं. अंतरिक्ष स्टेशन के जरिए पृथ्वी, सूर्य और अन्य खगोलीय पिंडों का निरीक्षण करने के लिए उपकरण भी प्रदान किया जाता है.

अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन में कितने लोग रहते हैं?

अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन में रहने वाले यात्री हमेशा बदलते रहते हैं और इन्हें अधिकतम छह तक की अवधि के लिए वहां रखा जाता है. अमूमन यहां सात लोग रहते हैं. अभी जैसे शुभांशु शुक्ला का एक्सिओम-4 मिशन हुआ, तो उस वक्त स्टेशन में 10-11 लोग भी हो जाते हैं. कहने का अर्थ यह है कि अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन में हर छह महीने बाद अंतरिक्ष यात्री बदल जाते हैं. अबतक Expedition 73 हो चुके हैं, यानी 73 बार यात्री बदले जा चुके हैं. Expedition 73 यानी अभियान 73 की अवधि दिसंबर 2025 तक है, उसके बाद अंतरिक्ष यात्री बदल जाएंगे.

अंतरिक्ष स्टेशन पर यात्री पहली बार कब गए थे

Expedition 1 यानी अभियान 1 की शुरुआत के साथ ही International Space Station में स्थायी तौर पर मानव निवास की शुरुआत हुई थी. पहली बार 31 अक्टूबर 2000 को अंतरिक्ष यान Soyuz TM‑31 के जरिए तीन अंतरिक्ष यात्री स्टेशन की ओर रवाना हुए और 2 नवंबर 2000 को उन्होंने ISS में प्रवेश किया. तब से यह स्टेशन मानव के साथ चालू है और अबतक बंद नहीं हुआ है. संभव है कि 2030 तक यह स्टेशन काम करेगा और उसके बाद इसे प्रशांत महासागर में गिरा दिया जाएगा.

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लेखक के बारे में

Author: Rajneesh Anand

रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है.पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव रखती हैं. झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाली रजनीश ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की और वर्ष 2000-01 में पत्रकारिता की शुरुआत की. इन्होंने पहली नौकरी झारखंड जागरण दैनिक अखबार में की. उसके बाद इन्होंने प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस तथा दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य संस्करणों में काम करने के बाद वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. रजनीश आनंद की पहचान तथ्यपरक रिपोर्टिंग, गहन शोध और विश्लेषणात्मक लेखन के लिए है. उनकी रुचि राजनीति, सामाजिक सरोकारों, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों में रही है। उन्होंने हमेशा उन मुद्दों को प्राथमिकता दी है जो समाज के हाशिये पर खड़े लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की चर्चा में अपेक्षाकृत कम स्थान पाते हैं. वे कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर विस्तृत अध्ययन और रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान उन्होंने महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर कार्य किया. इसके अतिरिक्त सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत उन्होंने बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की. आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है. हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में भविष्य की चुनौतियों, रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं. उनका मानना है कि ऊर्जा परिवर्तन की प्रक्रिया तभी सफल होगी जब उसमें प्रभावित समुदायों की भागीदारी और हितों को केंद्र में रखा जाए.पत्रकारिता उनके लिए केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने का माध्यम है. जमीनी रिपोर्टिंग, तथ्यों की पड़ताल और जनसरोकारों को केंद्र में रखकर लिखना उनकी कार्यशैली की विशेषता रही है. इसके अतिरिक्त रजनीश आनंद कहानियां और कविताएं लिखने का शौक भी रखती है.

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