आर्थिक आधार पर रिजर्वेशन नहीं चाहता केंद्र! SC-ST आरक्षण में क्रीमी लेयर पर क्यों हो रही बहस?

मान लीजिए, किसी आरक्षित वर्ग के एक परिवार के पास अच्छी नौकरी, बेहतर आय और बच्चों के लिए अच्छी शिक्षा की सुविधा है. वहीं उसी वर्ग का दूसरा परिवार आर्थिक और सामाजिक रूप से पिछड़ा हुआ है. ऐसे में क्या दोनों परिवारों को आरक्षण का लाभ समान रूप से मिलता रहना चाहिए? यह सवाल अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया है.

सुप्रीम कोर्ट में दायर एक जनहित याचिका में SC/ST में OBC की तरह क्रीमी लेयर लागू करने की मांग की गई है, ताकि आर्थिक और सामाजिक रूप से आगे बढ़ चुके लोगों को आरक्षण के लाभ से बाहर किया जा सके.हालांकि, केंद्र सरकार इसका विरोध कर रही है. सरकार का कहना है कि SC/ST का पिछड़ापन सिर्फ आर्थिक नहीं, बल्कि लंबे समय से चले आ रहे छुआछूत और सामाजिक भेदभाव से भी जुड़ा है.

क्या है ये पूरा मामला? याचिकाकर्ता की दलील क्या है? केंद्र सरकार इसका विरोध क्यों कर रही है? और अगर आरक्षण का लाभ सबसे जरूरतमंद लोगों तक पहुंचाना है, तो इसका रास्ता क्या हो सकता है? जानेंगे इस लेख में.

पहले समझिए ये मुद्दा सुप्रीम कोर्ट तक कैसे पहुंचा?

मामला बीजेपी नेता और अधिवक्ता अश्विनी कुमार उपाध्याय की ओर से दायर एक जनहित याचिका से जुड़ा है.

याचिका में सवाल उठाया गया है कि अगर आरक्षित वर्ग के कुछ परिवार पहले से ही काफी आगे बढ़ चुके हैं और वे बार-बार आरक्षण का लाभ लेते रहें, तो क्या उसी वर्ग के सबसे पिछड़े और जरूरतमंद लोगों तक आरक्षण का फायदा पर्याप्त रूप से पहुंच पाएगा? आसान भाषा में इसका मतलब है

अगर किसी आरक्षित वर्ग के जो परिवार पहले से आगे बढ़ चुके हैं, उन्हें भी लगातार आरक्षण का लाभ मिलता रहे, तो संभव है कि उसी समुदाय के ज्यादा जरूरतमंद परिवारों के लिए अवसर कम रह जाएं. इसी वजह से याचिका में मांग की गई है कि आरक्षण का लाभ तय करते समय सामाजिक और आर्थिक स्थिति को भी ध्यान में रखा जाए.

लेकिन यहां एक सवाल और है कि क्रीमी लेयर क्या होती है?

क्रीमी लेयर क्या होती है?

क्रीमी लेयर का मतलब हुआ कि आरक्षित वर्ग के भीतर ऐसे लोगों की पहचान करना जो एक तय स्तर तक सामाजिक और आर्थिक रूप से आगे बढ़ चुके हैं और इसलिए उन्हें आरक्षण का लाभ न दिया जाए.

OBC आरक्षण में ऐसी व्यवस्था पहले से लागू है. हालांकि OBC में क्रीमी लेयर केवल परिवार की आय के आधार पर तय नहीं होती. इसमें माता-पिता की नौकरी या पद और कुछ सामाजिक-आर्थिक मानदंड भी महत्वपूर्ण होते हैं.

इसे उदाहरण से समझिए....

मान लीजिए किसी आरक्षित वर्ग में दो परिवार हैं. एक परिवार आर्थिक रूप से कमजोर है और उसके बच्चों को अच्छी शिक्षा और रोजगार के अवसर हासिल करने में लगातार मुश्किल होती है. दूसरा परिवार उच्च शिक्षा, अच्छी नौकरी और मजबूत आर्थिक स्थिति के कारण काफी आगे निकल चुका है. क्रीमी लेयर की अवधारणा का सवाल यही है कि क्या दोनों परिवारों को आरक्षण का लाभ समान रूप से मिलता रहना चाहिए, या ज्यादा वंचित परिवार को प्राथमिकता मिलनी चाहिए?

फिर 2024 का सुप्रीम कोर्ट का फैसला इस मामले में कैसे महत्वपूर्ण है?

इस पूरे विवाद को समझने के लिए अगस्त 2024 के सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले को समझना जरूरी है. जिसमें सुप्रीम कोर्ट की सात जजों की संविधान पीठ ने SC और ST के भीतर सब-क्लासिफिकेशन यानी उप-वर्गीकरण की अनुमति दी थी.

कोर्ट ने कहा था कि SC और ST के भीतर भी सभी समुदायों की स्थिति एक जैसी नहीं है. कुछ समूह दूसरे समूहों की तुलना में ज्यादा पिछड़े हो सकते हैं. ऐसे में राज्यों को आरक्षण के भीतर ज्यादा वंचित समूहों को प्राथमिकता देने की व्यवस्था करने की अनुमति दी जा सकती है. इस दौरान चार जजों ने SC और ST के संदर्भ में क्रीमी लेयर पर विचार करने की बात भी कही थी.

याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट की इन्हीं टिप्पणियों को अपनी मांग के समर्थन में आधार बनाया है. उसका तर्क है कि अगर SC और ST के भीतर ज्यादा पिछड़े समूहों की पहचान की जा सकती है, तो उन लोगों की भी पहचान की जा सकती है जो सामाजिक और आर्थिक रूप से काफी आगे बढ़ चुके हैं.

लेकिन यहां एक बात समझना बहुत जरूरी है कि सब-क्लासिफिकेशन और क्रीमी लेयर एक ही चीज नहीं हैं.

सब-क्लासिफिकेशन का मतलब है कि आरक्षित वर्ग के भीतर जो समूह ज्यादा पिछड़े हैं, उन्हें आरक्षण में ज्यादा प्राथमिकता दी जाए.
वहीं क्रीमी लेयर का मतलब है कि आरक्षित वर्ग के भीतर जो लोग एक तय स्तर तक आगे बढ़ चुके हैं, उन्हें आरक्षण के लाभ से बाहर रखा जाए.

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अब समझिए, केंद्र सरकार इसको लेकर क्या कह रही है?

  • केंद्र सरकार का सबसे बड़ा तर्क है कि SC और ST को सिर्फ इस आधार पर नहीं देखा जा सकता कि कोई परिवार गरीब है या अमीर. सरकार का कहना है कि SC समुदायों का पिछड़ापन लंबे समय से छुआछूत और जातिगत भेदभाव से जुड़ा रहा है.
  • यानी सरकार के मुताबिक SC और ST के लिए आरक्षण का मकसद सिर्फ गरीब परिवारों को आर्थिक मदद देना नहीं है. इसका उद्देश्य सामाजिक बराबरी लाना, पुराने भेदभाव को कम करना और सरकारी नौकरियों तथा दूसरी सार्वजनिक संस्थाओं में इन समुदायों की भागीदारी बढ़ाना भी है.

OBC और SC/ST में फर्क क्यों बताया जा रहा है?

  • OBC आरक्षण में सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन की पहचान के साथ यह भी देखा जाता है कि परिवार एक निश्चित सामाजिक-आर्थिक स्तर तक आगे बढ़ चुका है या नहीं.
  • इसी आधार पर क्रीमी लेयर की व्यवस्था बनाई गई.
  • लेकिन SC/ST आरक्षण का संवैधानिक आधार अलग है. यहां सालों से चले आ रहे छुआछूत, भेदभाव और समाज में बराबरी का हक न मिलना जैसे प्वांट ज्यादा महत्वपूर्ण हैं.
  • इसलिए सरकार का कहना है कि सिर्फ आर्थिक उन्नति को आधार बनाकर SC/ST के कुछ लोगों को आरक्षण से बाहर करना उस आरक्षण के मूल उद्देश्य को कमजोर कर सकता है.

सरकार ने अपने तर्क में कोर्ट के पुराने फैसलों का भी हवाला दिया है.

केंद्र ने अपने जवाब में सुप्रीम कोर्ट के कई पुराने फैसलों को भी कोट किया है.

इंद्रा साहनी मामला, 1992
यह फैसला मंडल आयोग और OBC आरक्षण की बहस में बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है. इसी मामले में क्रीमी लेयर का सिद्धांत सामने आया. केंद्र का कहना है कि इस फैसले में क्रीमी लेयर का सिद्धांत OBC तक सीमित रखा गया था और इसे SC तथा ST पर लागू नहीं किया गया.
अशोक कुमार ठाकुर मामला, 2008
केंद्र ने इस फैसले का उल्लेख करते हुए कहा कि SC और ST पर क्रीमी लेयर सिद्धांत लागू न होने की न्यायिक स्थिति पहले भी स्पष्ट की जा चुकी है.
ई.वी. चिन्नैया मामला, 2005
सरकार ने इस फैसले से जुड़े उस सिद्धांत का भी हवाला दिया है, जिसके अनुसार अगर SC के भीतर किसी तरह की क्रीमी लेयर को बाहर करने की जरूरत महसूस होती है, तो इसके लिए आवश्यक कानूनी कदम उठाना संसद का विषय होगा.

केंद्र अपने तर्क को सिर्फ प्रशासनिक या राजनीतिक आधार पर नहीं, बल्कि पुराने न्यायिक फैसलों से भी जोड़ रहा है. इसके अलावा सरकार ये भी कह रही कि SC और ST आरक्षण की व्यवस्था में बदलाव की जरूरत है या नहीं इसका फैसला कौन करेगा?

आरक्षण में बदलाव का अधिकार किसके पास है?

यहां संविधान के अनुच्छेद 341 और 342 महत्वपूर्ण हो जाते हैं.अनुच्छेद 341 अनुसूचित जातियों और अनुच्छेद 342 अनुसूचित जनजातियों की संवैधानिक सूची से संबंधित है.

इन सूचियों को राष्ट्रपति अधिसूचित करते हैं और सूची में किसी समुदाय को जोड़ने या हटाने का अधिकार संसद द्वारा बनाए गए कानून से जुड़ा है.

केंद्र का तर्क है कि अदालत अपनी तरफ से इन संवैधानिक सूचियों या उनसे जुड़ी आरक्षण व्यवस्था में ऐसा बदलाव नहीं कर सकती जो मूल रूप से नीतिगत निर्णय हो. सरकार के मुताबिक ऐसे बदलाव के लिए सामाजिक परिस्थितियों का अध्ययन, पर्याप्त आंकड़े और व्यापक नीतिगत समीक्षा जरूरी हो सकती है.

मामले को लेकर याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट से मैण्डमस् भी जारी करने की मांग की है. मैण्डमस् ऐसा न्यायिक आदेश है, जिसके जरिए अदालत किसी सरकारी संस्था या अधिकारी को उसका कानूनी दायित्व पूरा करने का निर्देश दे सकती है. लेकिन केंद्र सरकार की आपत्ति यह है कि याचिकाकर्ता अदालत से एक खास तरह की आरक्षण नीति लागू कराने की मांग कर रहा है.

जिस पर सरकार का कहना है कि अदालत किसी नीति को बेहतर या ज्यादा न्यायपूर्ण मानकर सरकार को उसे लागू करने का आदेश नहीं दे सकती. नीति बनाना मुख्य रूप से सरकार और विधायिका का काम है. यानी केंद्र चाहता है कि अदालत अपनी भूमिका संवैधानिक समीक्षा तक रखे और खुद आरक्षण की नई नीति तय करने की भूमिका में न आए.

Article 32 को लेकर केंद्र की आपत्ति क्या है?

  • केंद्र ने इस याचिका के सुनवाई योग्य होने पर भी सवाल उठाया है.
  • याचिका संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत सुप्रीम कोर्ट में दायर की गई है. यह अनुच्छेद नागरिकों को मौलिक अधिकारों के उल्लंघन की स्थिति में सीधे सुप्रीम कोर्ट जाने का अधिकार देता है.
  • केंद्र का कहना है कि इस मामले में याचिका यह स्पष्ट रूप से नहीं बताती कि किसी मौलिक अधिकार का उल्लंघन कैसे हुआ है.
  • सरकार के मुताबिक यह मामला मूल रूप से आरक्षण की मौजूदा नीति को बदलने की मांग से जुड़ा है.
  • इसी आधार पर केंद्र ने कहा है कि ऐसी मांग को Article 32 के तहत सुनवाई योग्य नहीं माना जाना चाहिए और याचिका खारिज की जानी चाहिए.

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दोनों पक्षों की दलील को एक लाइन में समझिए

याचिकाकर्ता

SC/ST के भीतर जो लोग पहले से काफी आगे बढ़ चुके हैं, उन्हें लगातार आरक्षण का लाभ देने के बजाय सबसे वंचित लोगों तक आरक्षण का फायदा ज्यादा पहुंचना चाहिए.

केंद्र सरकार

SC/ST आरक्षण गरीबी हटाने की योजना नहीं है, इसका आधार सालों से चले आ रहे छुआछूत, भेदभाव और समाज में बराबरी का हक न मिलना भी है, इसलिए केवल आर्थिक-सामाजिक तरक्की के आधार पर कुछ लोगों को आरक्षण से बाहर करना उचित नहीं होगा.

और इसके ऊपर एक तीसरा संवैधानिक सवाल खड़ा होता है कि अगर व्यवस्था बदलनी भी हो, तो उसका फैसला अदालत करेगी या संसद और सरकार की नीतिगत प्रक्रिया के जरिए होगा?

तो रास्ता क्या हो सकता है?

इस बहस को सिर्फ ‘क्रीमी लेयर हो या न हो’ के सवाल तक सीमित करना ठीक नहीं होगा. अगर उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि आरक्षण का लाभ SC/ST के भीतर सबसे ज्यादा वंचित लोगों तक पहुंचे, तो कम-से-कम तीन अलग रास्तों पर बहस हो सकती है.

  • SC/ST के भीतर ज्यादा वंचित समूहों की पहचान कर उन्हें आरक्षण के भीतर प्राथमिकता देना.
  • यह पता लगाना कि अलग-अलग समुदायों को आरक्षण का लाभ शिक्षा, सरकारी नौकरियों और दूसरी संस्थाओं में किस स्तर तक मिला है और कौन से समूह अभी भी पीछे हैं.
  • अगर SC/ST के भीतर आर्थिक और सामाजिक रूप से आगे बढ़ चुके लोगों को आरक्षण से बाहर करने का विचार लागू करना है, तो उसके संवैधानिक आधार, मानदंड और अधिकार-क्षेत्र पर स्पष्ट व्यवस्था की जरूरत होगी.

इनमें से कौन सा रास्ता अपनाया जाए, यह सिर्फ इस सवाल से तय नहीं होगा कि कौन आर्थिक रूप से मजबूत है. यानी, इस पूरे विवाद को सिर्फ इस सवाल में समेटना कि क्या अमीर SC/ST परिवारों को आरक्षण मिलना चाहिए? बहस को बहुत छोटा कर देगा, क्योंकि असल में यहां तीन सवाल एक साथ हैं.

  • क्या SC/ST आरक्षण का लाभ उन्हीं समुदायों के भीतर सबसे ज्यादा वंचित लोगों तक पर्याप्त रूप से पहुंच रहा है?
  • क्या आर्थिक और सामाजिक रूप से आगे बढ़ चुके लोगों को बाहर करने का कोई ऐसा तरीका बनाया जा सकता है जो ऐतिहासिक सामाजिक भेदभाव के आधार को कमजोर न करे?
  • अगर आरक्षण की मौजूदा व्यवस्था में बदलाव जरूरी माना जाता है, तो उस बदलाव की सीमा और प्रक्रिया कौन तय करेगा, सुप्रीम कोर्ट, केंद्र सरकार या संसद?

इसलिए SC/ST में क्रीमी लेयर की बहस सिर्फ आरक्षण के लाभार्थियों को छांटने की बहस नहीं है. यह इस बड़े सवाल की बहस है कि सामाजिक न्याय की संवैधानिक व्यवस्था में सबसे वंचित की पहचान कैसे होगी और उस पहचान के आधार पर आरक्षण की नीति बदलने का अधिकार किस संस्था के पास होगा.

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By गौतम कुमार

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