दिल्ली के जंतर-मंतर पर 21 अगस्त को रिजर्वेशन हटाओ आंदोलन के बैनर तले बड़ी संख्या में लोगों ने जाति आधारित आरक्षण के खिलाफ प्रदर्शन किया. प्रदर्शनकारियों ने जाति के आधार पर मिलने वाले आरक्षण में बदलाव की मांग की. उनका कहना है कि सरकारी मदद और आरक्षण का आधार जाति नहीं, बल्कि किसी व्यक्ति की आर्थिक स्थिति होनी चाहिए. यह प्रदर्शन सोशल मीडिया पर सक्रिय रिजर्वेशन हटाओ आंदोलन के जरिए लामबंद किया गया था.
इस प्रदर्शन ने एक एक बार फिर से पुरानी लेकिन बेहद संवेदनशील बहस को सामने ला दिया है,सवाल ये है कि क्या भारत में आरक्षण का आधार जाति और सामाजिक पिछड़ापन होना चाहिए या फिर किसी के आर्थिक स्थिति यह तय किया जाना चाहिए कि उसे यह सुविधा मिले ?
पहले समझिए क्या है आरक्षण हटाओ आंदोलन
- नीट पेपर लीक आंदोलन की तरह, आरक्षण हटाओ आंदोलन एक ऐसा अभियान है जो मौजूदा जाति आधारित आरक्षण व्यवस्था में बदलाव की मांग कर रहा है.
- CJP आंदोलन की तरह यह भी सोशल मीडिया, खासकर इंस्टाग्राम के जरिए उन लोगों तक पहुंचा, जो इस विचार का समर्थन करते हैं.
- रिजर्वेशन व्यवस्था का विरोध आरक्षण हटाओ आंदोलन के बैनर के तले किया जा रहा है. दरअसल ये इंस्टाग्राम पर एक पेज है, जहां 56 लाख फॉलोअर्स हैं. 21 अगस्त को दिल्ली में इसका जमीनी प्रदर्शन हुआ.
- हालांकि यहां अंतर ये है कि आंदोलन का नाम आरक्षण हटाओ है, लेकिन प्रदर्शन से जुड़ी मांगों में पूरी व्यवस्था को तुरंत खत्म करने के साथ-साथ उसके व्यापक सुधार की मांग भी शामिल है.
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क्या है प्रदर्शनकारियों की मांग ?
- प्रदर्शनकारियों का तर्क है कि सरकारी सहायता और आरक्षण जैसी सुविधा किसी को इसलिए नहीं दी जाए क्योंकि वो किसी खास जाती से आता है.बल्कि इसके लिए उसके आर्थिक स्थिति को आधार बनाया जाए.
- आंदोलन से जुड़ी मांगों में एक परिवार, एक आरक्षण, आरक्षित वर्गों के लिए न्यूनतम योग्यता अंक, खाली रह गई आरक्षित सीटों को सामान्य श्रेणी में भरने और आरक्षण नीति की समय-समय पर समीक्षा जैसी बातें भी शामिल हैं.
- हालांकि, ये प्रदर्शनकारियों की मांगों से इतर, मौजूदा संवैधानिक व्यवस्था में अलग-अलग सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों तथा अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए विशेष प्रावधान मौजूद हैं.
भारत में आरक्षण की व्यवस्था जरूरत क्यों पड़ी
- भारत में आरक्षण की व्यवस्था इसलिए शुरू की गई क्योंकि समाज के कुछ वर्गों को लंबे समय तक भेदभाव और असमानता का सामना करना पड़ा. उन्हें शिक्षा, सरकारी नौकरियों और समाज में आगे बढ़ने के बराबर मौके नहीं मिल पाए.
- आरक्षण का मतलब सिर्फ गरीब लोगों की मदद करना नहीं है. इसका मुख्य उद्देश्य उन सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों, अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) को आगे बढ़ने का मौका देना है, जो लंबे समय से पीछे रहे हैं.
- संविधान का अनुच्छेद 15 सरकार को इन वर्गों के लिए विशेष प्रावधान करने की अनुमति देता है. वहीं अनुच्छेद 16 सरकारी नौकरियों में पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण से जुड़ा प्रावधान करता है.
- इसलिए आरक्षण का सवाल सिर्फ यह नहीं है कि कोई व्यक्ति गरीब है या अमीर. इसका संबंध इस बात से भी है कि समाज में उसे शिक्षा, नौकरी और दूसरे अवसर कितने बराबर मिले हैं और अलग-अलग वर्गों को सरकारी संस्थानों में कितना प्रतिनिधित्व मिला है.
- इसी वजह से जाति आधारित आरक्षण और गरीबी दूर करने वाली सरकारी योजनाओं को एक ही चीज समझना सही नहीं है.
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क्या आरक्षण का मतलब गरीबी दूर करना है
नहीं, आरक्षण का मकसद सिर्फ गरीब लोगों की मदद करना नहीं है.
- पारंपरिक आरक्षण उन लोगों के लिए है जिन्हें लंबे समय से सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन की वजह से शिक्षा, नौकरी और दूसरे अवसरों में बराबर मौका नहीं मिल पाया. जो आरक्षण हटाओ आंदोलन की मांग से अलग है.
- प्रदर्शनकारियों का कहना है कि गरीबी किसी भी जाति के व्यक्ति को हो सकती है, इसलिए सरकारी मदद का आधार आर्थिक स्थिति होना चाहिए.
- वहीं आरक्षण व्यवस्था का मानना है कि सिर्फ गरीबी नहीं, बल्कि सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ापन भी अवसरों की कमी का एक बड़ा कारण है.
क्या आर्थिक आधार पर संभव है आरक्षण
इसका जबाव ये है कि आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों यानी EWS के लिए संविधान में आरक्षण का प्रावधान पहले से मौजूद है
- 103वें संविधान संशोधन के बाद अनुच्छेद 15(6) और 16(6) के तहत EWS के लिए शिक्षा और सरकारी नौकरियों में 10 प्रतिशत तक आरक्षण दिया जा सकता है.
- 2022 में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने इस व्यवस्था को संवैधानिक माना. यानी आर्थिक कमजोरी को भी आरक्षण का एक आधार माना जा सकता है.
- लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि EWS आरक्षण ने जाति और सामाजिक पिछड़ेपन पर आधारित आरक्षण को खत्म कर दिया है. दोनों अलग-अलग आधारों पर काम करते हैं.
आरक्षण को लेकर क्या है संविधान और सुप्रीम कोर्ट की राय
आरक्षण को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने समय-समय पर कई महत्वपूर्ण फैसले लिए हैं,
- इंद्रा साहनी मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सामान्य तौर पर आरक्षण की सीमा 50 प्रतिशत रखने की बात कही थी. हालांकि, कुछ असाधारण परिस्थितियों में इससे अलग स्थिति की संभावना पर भी चर्चा की गई थी.
- 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने यह भी माना कि अनुसूचित जातियों के भीतर जरूरत के हिसाब से उप-वर्गीकरण किया जा सकता है. लेकिन इसके लिए राज्य को ठोस आंकड़ों और तथ्यों का आधार देना होगा.
- इससे साफ है कि आरक्षण कोई बिल्कुल स्थिर व्यवस्था नहीं है. समय के साथ इसकी व्यवस्था और नियमों में बदलाव पर भी विचार किया जा सकता है, लेकिन ऐसा संविधान और अदालत द्वारा तय सीमाओं के भीतर ही होना चाहिए.
मौजूदा व्यवस्था को लेकर क्या है तर्क
- मौजूदा व्यवस्था के विरोध में सबसे बड़ा तर्क यह है कि गरीबी जाति देखकर नहीं आती. विरोध करने वालों का कहना है कि अगर कोई व्यक्ति आर्थिक रूप से कमजोर है, तो उसे उसकी जाति के बजाय उसकी आर्थिक स्थिति के आधार पर सरकारी मदद और अवसर मिलने चाहिए.
- वहीं इसके समर्थन में कहा जाता है कि सिर्फ गरीबी से सामाजिक भेदभाव और लंबे समय से चली आ रही असमानता खत्म नहीं होती. किसी परिवार की आर्थिक स्थिति बेहतर हो जाने के बाद भी उसकी सामाजिक पहचान के कारण उसे भेदभाव या अवसरों की कमी का सामना करना पड़ सकता है.
इसलिए इस बहस का असली सवाल यह है कि क्या बराबरी का मौका देने के लिए सिर्फ आर्थिक स्थिति देखना काफी है, या सामाजिक पिछड़ेपन और प्रतिनिधित्व को भी ध्यान में रखना जरूरी है?
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